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विधायकों के लिए टीचर बन गए प्रणब दा
शिमला/मृत्युंजय कुमार
Updated Sat, 25 May 2013 01:38 AM IST
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हिमाचल विधानसभा में संबोधन के दौरान प्रणब दा राष्ट्रपति से अधिक विधायकों के लिए अभिभावक, टीचर की भूमिका में नजर आए।
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उनके संबोधन में विद्वता दिखी, तो संसदीय प्रणाली के क्षरण पर चिंता भी। इसका हल भी उन्होंने सुझाया।
लिखित भाषण को एक तरफ रखकर जब उन्होंने धाराप्रवाह हिमाचल के इतिहास को पहले के वक्ताओं से ज्यादा बारीकी से बताना शुरू किया तो सभी हैरत में आ गए।
इसके बाद उन्होंने संसद विधानसभाओं में होने वाले हंगामे पर चिंता जताते हुए विधायकों को डी फार्मूला दिया।
अपने लंबे संसदीय अनुभव के आधार पर उन्होंने समझाया कि सदन में ट्रिपल डी यानी डिबेट, डिसेंट और डिसीजन बड़े महत्वपूर्ण हैं पर आजकल पर चौथा डी डिसरप्शन आ गया है।
उन्होंने विधायकों को सदन में सार्थक बहस के लिए प्रेरित कहते कहा कि बेहतर बहस के बाद लिया गया डिसीजन भी बेहतर होता है। इसके बाद प्रणब मुखर्जी ने विधायकों को उनकी ताकत का अहसास कराया।
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विधायकों की ओर इशारा करते हुए कहा - आप यहां विधायक हो। एक फर्स्ट टाइमर विधायक से लेकर मुख्यमंत्री तक सदन के सदस्य के रूप में आपकी बराबर शक्ति है। आपकी मंजूरी के बिना न तो अफसर शाही एक पैसा खर्च सकती है, न ही सरकारी खजाने से बजट जारी हो सकता है।
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यदि हो रहा है? तो इसका हिसाब लीजिए। कहां और कैसे खर्च हो रहा है? उन्हें बताया कि यहां प्रशासनिक प्रणाली बड़ी पेचीदा है। इसलिए भी जरूरी है कि विधायिका से जुड़े लोग कानून बनाने और उनका अमल करवाने पर समय लगाएं।
मुझे याद है 60 के दशक तक भी संसद में अधिकांश समय मनी और फाइनांस के बिजनेस पर निकलता था। लेकिन आज 30 से 35 फीसदी समय भी इन जरूरी मसलों के लिए नहीं मिल रहा।
प्रणब मुखर्जी ने कहा कि हिमाचल के पहले मुख्यमंत्री डा. वाईएस परमार ने जब पहला बजट पेश किया था तो यह 89 करोड़ रुपए था। इस साल यह 27 हजार करोड़ है। यदि पैसा बढ़ा है तो जिम्मेदारियां भी बढ़ी हैं।
सांसदों और विधायकों को सदन के भीतर समय लगाना चाहिए कि सरकार का खर्च क्यों बढ़ रहा है? फाइनांस बिल और अनुदान मांगों पर खुली चर्चा होनी चाहिए। विधायक इस पर यदि जोर देंगे तो कार्यपालिका खुद जिम्मेदार होगी।