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कुल्लू दशहरा: नल के नहीं, पहाड़ों के पवित्र जल से होता है देवी-देवताओं का स्नान, देव परंपराओं का कड़ाई से पालन

Sun, 25 Oct 2026 11:18 AM IST
Ankesh Dogra रोशन ठाकुर, संवाद न्यूज एजेंसी, कुल्लू।
रोशन ठाकुर, संवाद न्यूज एजेंसी, कुल्लू। Published by: Ankesh Dogra Updated Sun, 25 Oct 2026 11:18 AM IST
सार

अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा में देवी-देवताओं की दिनचर्या सदियों पुरानी देव परंपराओं के अनुसार चलती है। भोर होते ही पुजारी प्राकृतिक जलस्रोतों से चांदी की झारी में पवित्र जल लेकर आते हैं और इसी से देवी-देवताओं का स्नान करवाया जाता है।

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Kullu Dussehra Deities Sacred Natural Water Bathing Tradition
अस्थायी शिविर में भौर के बाद प्राकृतिक स्त्रोत के जल से स्नान करते देवता के पुजारी। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा में देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना और सेवा से जुड़ी परंपराएं विशेष महत्व रखती हैं। ढालपुर मैदान में सात दिनों तक अस्थायी शिविरों में विराजमान सैकड़ों देवी-देवताओं की दिनचर्या निर्धारित देव नियमों के अनुसार चलती है। भोर होते ही देवताओं के स्नान की तैयारी शुरू हो जाती है। स्नान के लिए नल के पानी के बजाय पहाड़ों के प्राकृतिक जलस्रोतों से लाया गया जल इस्तेमाल किया जाता है।
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देवताओं के स्नान के लिए पवित्र जल लाने की जिम्मेदारी पुजारियों की होती है। पुजारी सुबह प्राकृतिक जलस्रोतों तक जाते हैं और वहां से जल चांदी की विशेष झारी में भरकर देवता के शिविर में लाते हैं। इस दौरान धोती पहनकर नंगे पांव जल लाने की परंपरा का पालन किया जाता है। शिविर में पहुंचने के बाद इसी जल से देवता का स्नान करवाया जाता है। पूरी प्रक्रिया संबंधित देवता की मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार संपन्न होती है।

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देव नियमों के अनुसार तय होती है दिनचर्या
कुल्लू दशहरा के दौरान घाटी के विभिन्न क्षेत्रों से देवी-देवता अपने देवलुओं और कारकूनों के साथ ढालपुर पहुंचते हैं। उत्सव के दौरान उनकी पूजा-अर्चना, सेवा और अन्य धार्मिक अनुष्ठान निर्धारित देव नियमों के अनुसार किए जाते हैं। प्राकृतिक जलस्रोतों से जल लाकर स्नान करवाने की परंपरा भी इसी धार्मिक व्यवस्था का हिस्सा है।
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देव परंपरा के अनुसार, स्नान के लिए प्राकृतिक स्रोतों के जल का इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए पुजारियों को सुबह ही आवश्यक जल की व्यवस्था करनी पड़ती है। जल लाने से लेकर देवता का स्नान करवाने तक हर चरण में परंपरागत विधि का ध्यान रखा जाता है।

खराहल घाटी के प्राकृतिक स्रोतों से लाते हैं जल
देवताओं के पुजारी भोर होते ही स्नान के लिए प्राकृतिक जलस्रोतों से पानी लाते हैं। यह जल चांदी की झारी में भरकर देवता के शिविर तक पहुंचाया जाता है। जानकारी के अनुसार, पुजारी खराहल घाटी की देव डोभी में स्थित हरगण बाई, लंकाबेकर और हनुमानी बाग स्थित जलस्रोतों से पानी लेकर आते हैं।

देव संस्कृति की पहचान हैं सदियों पुरानी परंपराएं
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा की पहचान यहां जुटने वाले देवी-देवताओं और उनसे जुड़ी पुरानी मान्यताओं से है। उत्सव में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ देव समाज की परंपराएं भी देखने को मिलती हैं। प्राकृतिक जलस्रोत से पवित्र जल लाना, उसे चांदी की झारी में लाना और निर्धारित विधि से स्नान करवाना इसी देव संस्कृति का हिस्सा है।

जिला देवी-देवता कारदार संघ के अध्यक्ष दोत राम ठाकुर ने बताया कि कुल्लू दशहरा में देवी-देवताओं से जुड़ी परंपराओं का विशेष महत्व है। प्राकृतिक जलस्रोत से जल लाकर स्नान करवाने जैसी परंपराएं देव संस्कृति की विशिष्ट पहचान हैं।
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