आईआईटी मंडी ने खोजी नई तकनीक: पुलों और सुरंगों की निगरानी आसान करेगा ड्रोन, आठ महीने में पूरा हुआ शोध
आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं ने क्वाडरोटर ड्रोन को दीवार जैसी सतह पर स्थिर रखने की तकनीक विकसित की है। शोधपत्र साइंटिफिक रिपोर्ट्स में 12 फरवरी 2026 को ऑनलाइन प्रकाशित हुआ।
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कल्पना कीजिए कि कोई ड्रोन दीवार के पास पहुंचकर उस पर टिक जाए और बिना लगातार उड़ते हुए लंबे समय तक निगरानी करता रहे। इससे न केवल ऊर्जा की बचत हो सकती है, बल्कि पुलों, इमारतों और सुरंगों जैसे ढांचों का निरीक्षण भी आसान हो सकता है। इसी दिशा में आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं ने क्वाडरोटर ड्रोन को दीवार जैसी सतह पर स्थिर रखने की तकनीक विकसित की है। शोधपत्र साइंटिफिक रिपोर्ट्स में 12 फरवरी 2026 को ऑनलाइन प्रकाशित हुआ। शोध टीम में आईआईटी मंडी के प्रो. लक्ष्मीधर बेहरा और डॉ. नरेंद्र कुमार धर के साथ आईआईटी मंडी आईहब एवं एचसीआई फाउंडेशन से जुड़े डॉ. अनुज नंदनवार भी शामिल हैं।
इस तकनीक को एडैप्टिव सेकंड-ऑर्डर कंटीन्यूअस कंट्रोल (एएसओसीसी) नाम दिया गया है। इसका उद्देश्य ड्रोन को दीवार के पास पहुंचने, उससे संपर्क बनाने और फिर स्थिर रहने के दौरान संतुलन बनाए रखने में मदद करना है। हवा के झोंके, सेंसर से मिलने वाले संकेतों में शोर और ड्रोन के गणितीय मॉडल में मौजूद अनिश्चितताएं इस प्रक्रिया को मुश्किल बनाती हैं। नई नियंत्रण प्रणाली इन प्रभावों का अनुमान लगाकर अपने नियंत्रण को समायोजित करती है, ताकि ड्रोन सतह से संपर्क के बाद अस्थिर न हो।
शोध टीम के अनुसार यह काम जनवरी 2025 में शुरू हुआ और अगस्त 2025 में पूरा हुआ। शोध को पूरा करने में आठ महीने लगे। जबकि एएसओसीसी तकनीक विकसित करने में चार से पांच महीने का समय लगा। सबसे पहले छोटे क्वाडरोटर का डिजाइन तैयार किया गया। इसमें दीवार पर टिकने के लिए सहायक बाजू, उड़ान नियंत्रक और सेंसर लगाए गए। इसके बाद ड्रोन का गणितीय मॉडल बनाकर नियंत्रण प्रणाली तैयार की गई और उसकी स्थिरता का विश्लेषण किया गया।
अगले चरण में मैटलैब, सिमुलिंक पर अलग-अलग परिस्थितियों में तकनीक की जांच की गई। इसके बाद इसे वास्तविक ड्रोन पर लागू कर उड़ान और दीवार पर टिकने के प्रयोग किए गए। इस तरह शोध को सैद्धांतिक मॉडल से वास्तविक परीक्षण तक पहुंचाया गया। तकनीक की सटीकता और स्थिरता परखने के लिए शोधकर्ताओं ने 100 स्वतंत्र मोंटे कार्लो सिमुलेशन किए। इनमें बाहरी गड़बड़ियों, सेंसर के शोर और ड्रोन के मॉडल के मापदंडों में बदलाव जैसी परिस्थितियां शामिल थीं। शोध टीम के मुताबिक, इन परीक्षणों में ड्रोन ने सटीक ट्रैकिंग और स्थिरता बनाए रखी। वास्तविक प्रयोगों में भी क्वाडरोटर माइनस 20 डिग्री के कोण पर झुकी दीवार पर सफलतापूर्वक टिक सका।
शोध टीम अब एएसओसीसी को फिक्स्ड-टाइम और प्रिस्क्राइब्ड-टाइम नियंत्रण तक विकसित करने, फोर्स और विजन आधारित तकनीकों को जोड़ने तथा छोटे ड्रोन के समूहों से समन्वित निरीक्षण करने की दिशा में काम आगे बढ़ा रही है। भविष्य में ऐसी तकनीक का इस्तेमाल पुलों, इमारतों और सुरंगों की निगरानी, सतहों की जांच, सेंसर लगाने तथा कंपन और नमी मापने में हो सकता है। हालांकि इन सभी परिस्थितियों में पूरी तरह स्वायत्त संचालन के लिए अभी और विकास एवं परीक्षण की जरूरत है। -डॉ. नरेंद्र कुमार धर, सहायक प्रोफेसर, आईआईटी मंडी