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हिमाचल हाईकोर्ट बड़े फैसले: परवाणू हाईवे पर अब नहीं सड़ेगा सेब, पत्नी और बेटे को मिलेगा 20 हजार गुजारा भत्ता

Sat, 10 Oct 2026 05:15 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Sat, 10 Oct 2026 05:15 AM IST
सार

 कोर्ट ने कहा कि एक स्वस्थ और कम उम्र का पति अपनी नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी से सिर्फ इसलिए पीछे नहीं हट सकता कि वह सेना से रिटायर हो चुका है। जानिए हाईकोर्ट के बड़े फैसले

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Himachal High Court Major rulings: Apples will no longer rot on Parwanoo; wife and son to receive 20,000
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि एक स्वस्थ और कम उम्र का पति अपनी नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी से सिर्फ इसलिए पीछे नहीं हट सकता कि वह सेना से रिटायर हो चुका है। अदालत ने भारतीय नौसेना से रिटायर 34 साल के पति की याचिका खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराया। कोर्ट ने साफ कहा कि पति को अपनी पत्नी और सात साल के बेटे को दस-दस रुपये (कुल बीस हजार रुपये प्रति माह) का गुजारा भत्ता देना ही होगा, और यह रकम केस दर्ज करवाने की तारीख पांच सितंबर 2019 से लागू होगी। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल और न्यायाधीश रोमेश वर्मा की अदालत ने ऊना फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। पति का कहना था कि गुजारा भत्ता कोर्ट का फैसला आने की तारीख से मिलना चाहिए, न कि 2019 से जब केस दर्ज हुआ था। हाईकोर्ट ने दलील को खारिज करते हुए कहा कि गुजारा भत्ता केस दर्ज कराने की तारीख से ही लागू होता है, ताकि बेसहारा पत्नी और बच्चे को अदालत की देरी का नुकसान न उठाना पड़े। पति ने दलील दी कि वह नौसेना से रिटायर हो चुका है और उस पर बुजुर्ग माता-पिता की जिम्मेदारी है। कोर्ट ने कहा कि पति की उम्र अभी केवल 34 साल है, वह पूरी तरह स्वस्थ है और उसे पेंशन के साथ रिटायरमेंट के वित्तीय लाभ भी मिले हैं। इसलिए वह अपनी पत्नी और मासूम बच्चे का खर्चा उठाने के लिए पूरी तरह सक्षम है।

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परवाणू हाईवे पर अब नहीं सड़ेगा सेब, बदबू-कचरे पर हाईकोर्ट की सुनवाई बंद
प्रदेश हाईकोर्ट ने पिंजौर-परवाणू राष्ट्रीय राजमार्ग पर सेब सीजन के दौरान सड़ते सेब की डंपिंग और उससे फैलने वाली बदबू को लेकर चल रही जनहित याचिका पर सुनवाई बंद कर दी है। खंडपीठ ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और बागवानी उत्पाद विपणन एवं प्रसंस्करण निगम को सख्त आदेश दिए हैं कि वे पर्यावरण नियमों का पालन सुनिश्चित रखें, ताकि भविष्य में हाईवे पर किसी प्रकार का प्रदूषण न फैले। जनहित याचिका की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने की। कोर्ट ने कहा कि एचपीएमसी और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अपने हलफनामों में किए गए वादों के प्रति पूरी तरह जवाबदेह रहेंगे। बोर्ड सेब सीजन के दौरान नियमित रूप से साइट का निरीक्षण करना जारी रखेगा, ताकि कोई भी लापरवाही से कचरा न फेंके और वैज्ञानिक तरीकों से ही इसका निस्तारण किया जाए। इन आदेशों के साथ अदालत ने मामले को पूरी तरह निपटा दिया। अदालत ने यह संज्ञान साल 2022 में छपी एक रिपोर्ट का स्वतः संज्ञान लेते हुए दर्ज की गई थी। रिपोर्ट में परवाणू हाईवे किनारे सेब से लदे ट्रकों से उठने वाली भारी दुर्गंध और गंदगी का मुद्दा उठाया गया था। पिछले चार वर्षों में कोर्ट के कड़े रुख के बाद इस समस्या के समाधान के लिए कई ठोस कदम उठाए गए। सुनवाई के दौरान कोर्ट को अवगत करवाया गया कि कचरे के वैज्ञानिक निपटान के लिए परवाणू में एक पेक्टिन निष्कर्षण इकाई चालू की गई है, इससे सेब के कचरे की मात्रा में कमी आएगी। इसके अलावा एचपीएमसी ने मार्केट इंटरवेंशन स्कीम के तहत मेसर्स आदित्य सोलर लिमिटेड, जयपुर के सहयोग से एक खास ड्राइंग यूनिट (सुखाने वाली इकाई) भी स्थापित की है।

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भरमौर में गर्ल्स स्कूल का विलय सही, हाईकोर्ट ने लगाई शौचालयों की शर्त
प्रदेश हाईकोर्ट ने चंबा जिले के भरमौर में स्थित सरकारी गर्ल्स सीनियर सेकेंडरी स्कूल को पास के ही बॉयज को-एड स्कूल में विलय करने के सरकार के फैसले को सही ठहराया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि को-एजुकेशन स्कूल में पढ़ने से लड़कियों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होता, बल्कि यह उनके समग्र विकास और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए जरूरी है। अदालत ने सरकार के 18 फरवरी 2026 के स्कूल विलय के नोटिफिकेशन को रद्द करने से इन्कार कर दिया, लेकिन छात्राओं और महिला स्टाफ की सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए स्कूल परिसर में पर्याप्त संख्या में अलग-अलग शौचालय बनाने के सख्त निर्देश दिए हैं। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल और न्यायाधीश योगेश जसवाल की खंडपीठ ने यह फैसला अनिल कुमार की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए दिया। खंडपीठ ने स्कूल को विलय करने की 18 फरवरी 2026 की सरकारी अधिसूचना में दखल देने से इन्कार कर दिया। अदालत ने कहा कि महज 10 मीटर की दूरी पर चल रहे दो अलग-अलग स्कूलों को मिलाकर एक बड़ा और बेहतर स्कूल बनाना प्रशासन और बच्चों दोनों के हित में है। छात्राओं की सुविधा को लेकर कोर्ट ने शिक्षा विभाग को स्पष्ट आदेश दिए हैं कि स्कूल में लड़कियों के लिए कम से कम 20 और लड़कों के लिए भी 20 अलग-अलग शौचालय बनाए जाएं। महिला और पुरूष स्टाफ के लिए अलग शौचालय बनाए जाएं। अदालत ने माना कि सह-शिक्षा (को- एजुकेशन) से बच्चों में भेदभाव खत्म होता है, आपसी सम्मान बढ़ता है।

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