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Yamuna Nagar News: श्रद्धालुओं को बताया गुरु की सेवा का महत्व
Mon, 20 Jul 2026 12:29 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Mon, 20 Jul 2026 12:29 AM IST
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दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम हनुमान गेट में सत्संग सुनते श्रद्धालु। प्रवक्ता
संवाद न्यूज जऐंसी
जगाधरी। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम हनुमान गेट में रविवार को साप्ताहिक सत्संग का आयोजन किया गया। सत्संग सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। साध्वी नीलम भारती ने श्रद्धालुओं को गुरु की सेवा का महत्व समझाया।
उन्होंने कहा कि गुरु वह शक्ति है जो साधारण से दिखने वाले नरेंद्र को स्वामी विवेकानंद, मुकुंद लाल घोष को योगानंद परम हंस और एक दासी पुत्र को चंद्रगुप्त मौर्य बनाने का सामर्थ्य रखती है। परंतु मनुष्य को अपना मिथ्या अहंकार त्याग कर गुरु की शरण में जाने से ही उनके महत्व का ज्ञान होता है।
उन्होंने बताया कि गुरुदेव स्वयं वे कल्पवृक्ष हैं जो अपनी शरण में आने वाले की लौकिक अलौकिक सभी इच्छाओं की पूर्ति कर देते हैं किंतु इसके लिए शिष्य को निरंतर सत्संग सेवा साधना सुमिरन को जीवन में उतारना होगा। गुरु सेवा केवल बाहरी कार्यों तक सीमित नहीं है अपितु यह शिष्य के अंतःकरण को निर्मल बनाने और उसके अहंकार का क्षय करने का दिव्य साधन है।
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उन्होंने कहा कि शास्त्रों में गुरु को साक्षात् परमात्मा का स्वरूप माना गया है। गुरु ही वह दिव्य शक्ति हैं जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाती है किंतु गुरु की वास्तविक सेवा केवल उनके आश्रम या कार्यों में सहयोग देना ही नहीं अपितु उनके द्वारा प्रदत्त दिव्य ब्रह्म ज्ञान को अपने जीवन में धारण करना, उनके आदर्श के अनुकूल आचरण करना तथा मानवता की सेवा में स्वयं को समर्पित करना ही गुरु की वास्तविक सेवा है।
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जगाधरी। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम हनुमान गेट में रविवार को साप्ताहिक सत्संग का आयोजन किया गया। सत्संग सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। साध्वी नीलम भारती ने श्रद्धालुओं को गुरु की सेवा का महत्व समझाया।
उन्होंने कहा कि गुरु वह शक्ति है जो साधारण से दिखने वाले नरेंद्र को स्वामी विवेकानंद, मुकुंद लाल घोष को योगानंद परम हंस और एक दासी पुत्र को चंद्रगुप्त मौर्य बनाने का सामर्थ्य रखती है। परंतु मनुष्य को अपना मिथ्या अहंकार त्याग कर गुरु की शरण में जाने से ही उनके महत्व का ज्ञान होता है।
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उन्होंने बताया कि गुरुदेव स्वयं वे कल्पवृक्ष हैं जो अपनी शरण में आने वाले की लौकिक अलौकिक सभी इच्छाओं की पूर्ति कर देते हैं किंतु इसके लिए शिष्य को निरंतर सत्संग सेवा साधना सुमिरन को जीवन में उतारना होगा। गुरु सेवा केवल बाहरी कार्यों तक सीमित नहीं है अपितु यह शिष्य के अंतःकरण को निर्मल बनाने और उसके अहंकार का क्षय करने का दिव्य साधन है।
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उन्होंने कहा कि शास्त्रों में गुरु को साक्षात् परमात्मा का स्वरूप माना गया है। गुरु ही वह दिव्य शक्ति हैं जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाती है किंतु गुरु की वास्तविक सेवा केवल उनके आश्रम या कार्यों में सहयोग देना ही नहीं अपितु उनके द्वारा प्रदत्त दिव्य ब्रह्म ज्ञान को अपने जीवन में धारण करना, उनके आदर्श के अनुकूल आचरण करना तथा मानवता की सेवा में स्वयं को समर्पित करना ही गुरु की वास्तविक सेवा है।