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एम्यूजमेंट पार्क घोटाले में यूनिटेक डायरेक्टर को पेश न करने का पूछा कारण
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चंडीगढ़। सारंगपुर के थीम-कम-एम्यूजमेंट पार्क घोटाले में सोमवार को सीबीआई अदालत में सुनवाई के दौरान यूनिटेक कंपनी के डायरेक्टर अजय चंद्रा के दोबारा प्रोडक्शन वारंट जारी किए गए हैं। अदालत ने तिहाड़ जेल के सुपरिंटेंडेंट से यूनिटेक के डायरेक्टर को अदालत में पेश न करने का कारण पूछा है। दरअसल, अजय चंद्रा दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद है। पिछली सुनवाई पर अदालत ने आरोपी के नए सिरे से प्रोडक्शन वारंट जारी किए थे, लेकिन उसके बाद भी जेल अथॉरिटी ने पेश नहीं किया। इस मामले में यूनिटेक कंपनी के अलावा यूटी प्रशासक के पूर्व एडवाइजर ललित शर्मा, पूर्व होम सेक्रेटरी कृष्ण मोहन और टूरिज्म के पूर्व डायरेक्टर विवेक अत्रे आरोपी हैं। तीनों पर नियमों के खिलाफ यूनिटेक कंपनी को फायदा पहुंचाने का आरोप है। हालांकि, तीनों को एक-एक लाख की गारंटी पर जमानत मिल चुकी है। अब मामले की अगली सुनवाई 24 फरवरी को होगी।
सारंगपुर में 73.65 एकड़ में प्रस्तावित थीम-कम-एम्यूजमेंट पार्क मामले में 2010 में सीबीआई ने एफआईआर दर्ज की थी। यह जमीन मेसर्स यूनिटेक लिमिटेड को महज 5.5 करोड़ (फिक्सड एनुअल लाइसेंस फीस) के अलावा 1.1 फीसदी वार्षिक रेवेन्यू शेयरिंग पर अलॉटमेंट हुई। आरोप था कि जमीन की कीमत कम आंकी गई थी, जिसका फायदा संबंधित बिल्डर को देने की कोशिश की गई। इससे जुड़े दस्तावेज जान बूझकर नष्ट किए जाने का भी एफआईआर में जिक्र किया गया था। प्रशासनिक अधिकारियों पर वित्तीय नियमों को ताक पर रखकर कम रेट पर बोली लगाने वाले को जमीन अलॉट करने सहित रेवेन्यू शेयरिंग के मामले में भी डीएलएफ की ओर से 13 गुना अधिक रेट कोट किए जाने की बात लिखी गई थी। जांच के बाद सीबीआई ने 4 अक्तूबर 2010 को इन तीनों अफसरों के खिलाफ आईपीसी की धारा 420, 201 और 120बी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13 (1)(डी)और 13 (2) के तहत केस दर्ज किया था।
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सारंगपुर में 73.65 एकड़ में प्रस्तावित थीम-कम-एम्यूजमेंट पार्क मामले में 2010 में सीबीआई ने एफआईआर दर्ज की थी। यह जमीन मेसर्स यूनिटेक लिमिटेड को महज 5.5 करोड़ (फिक्सड एनुअल लाइसेंस फीस) के अलावा 1.1 फीसदी वार्षिक रेवेन्यू शेयरिंग पर अलॉटमेंट हुई। आरोप था कि जमीन की कीमत कम आंकी गई थी, जिसका फायदा संबंधित बिल्डर को देने की कोशिश की गई। इससे जुड़े दस्तावेज जान बूझकर नष्ट किए जाने का भी एफआईआर में जिक्र किया गया था। प्रशासनिक अधिकारियों पर वित्तीय नियमों को ताक पर रखकर कम रेट पर बोली लगाने वाले को जमीन अलॉट करने सहित रेवेन्यू शेयरिंग के मामले में भी डीएलएफ की ओर से 13 गुना अधिक रेट कोट किए जाने की बात लिखी गई थी। जांच के बाद सीबीआई ने 4 अक्तूबर 2010 को इन तीनों अफसरों के खिलाफ आईपीसी की धारा 420, 201 और 120बी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13 (1)(डी)और 13 (2) के तहत केस दर्ज किया था।
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