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Panchkula News: 27 साल सेवा के बाद दिवंगत वार्डर को नियमित करने का आदेश
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चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने करीब 27 वर्ष तक जेल विभाग में वार्डर के पद पर सेवा देने के बावजूद नियमित न किए गए दिवंगत कर्मचारी के परिवार को बड़ी राहत दी है। जस्टिस संदीप मौदगिल ने पंजाब सरकार को दिवंगत शिंगारा सिंह की सेवाओं को उनके साथ नियमित किए गए समान पद के कर्मचारियों की तिथि से नियमित मानते हुए उनकी पत्नी को पारिवारिक पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित जारी करने का निर्देश दिया है।
शिंगारा सिंह को 7 नवंबर 1989 को वार्डर के पद पर तदर्थ नियुक्ति मिली थी। उन्होंने 2 दिसंबर 1989 को सेवा ज्वाइन की और करीब 27 वर्षों तक जेल विभाग में सेवा दी। 11 नवंबर 2016 को उनका निधन हो गया। उनकी पत्नी कश्मीर कौर ने नियमितीकरण और पेंशन लाभ खारिज करने वाले आदेशों को चुनौती दी। याचिकाकर्ता ने बताया कि 7 मई 1993 की सरकारी हिदायतों के तहत कई कनिष्ठ वार्डरों को नियमित किया गया था लेकिन शिंगारा सिंह को बिना किसी गलती के नियमित नहीं किया गया।
सरकार ने शिंगारा सिंह की सेवा के दौरान नियमितीकरण का कोई आदेश न होने का तर्क दिया। उसने सेवा रिकॉर्ड में अनधिकृत अनुपस्थिति और दंड का भी हवाला दिया। सरकार का कहना था कि मृत्यु के बाद नियमितीकरण नहीं हो सकता। हाईकोर्ट ने सरकार के तर्क को अस्वीकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि समान कर्मचारियों को लाभ देने के बाद एक को वंचित करने का कोई कानूनी आधार नहीं था।
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शिंगारा सिंह को 7 नवंबर 1989 को वार्डर के पद पर तदर्थ नियुक्ति मिली थी। उन्होंने 2 दिसंबर 1989 को सेवा ज्वाइन की और करीब 27 वर्षों तक जेल विभाग में सेवा दी। 11 नवंबर 2016 को उनका निधन हो गया। उनकी पत्नी कश्मीर कौर ने नियमितीकरण और पेंशन लाभ खारिज करने वाले आदेशों को चुनौती दी। याचिकाकर्ता ने बताया कि 7 मई 1993 की सरकारी हिदायतों के तहत कई कनिष्ठ वार्डरों को नियमित किया गया था लेकिन शिंगारा सिंह को बिना किसी गलती के नियमित नहीं किया गया।
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सरकार ने शिंगारा सिंह की सेवा के दौरान नियमितीकरण का कोई आदेश न होने का तर्क दिया। उसने सेवा रिकॉर्ड में अनधिकृत अनुपस्थिति और दंड का भी हवाला दिया। सरकार का कहना था कि मृत्यु के बाद नियमितीकरण नहीं हो सकता। हाईकोर्ट ने सरकार के तर्क को अस्वीकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि समान कर्मचारियों को लाभ देने के बाद एक को वंचित करने का कोई कानूनी आधार नहीं था।
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