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Panchkula: पिंजौर प्रजनन केंद्र में बढ़ रहा गिद्दों का कुनबा, जीएसएम बांध मार्च में छोड़े जाएंगे 25 गिद्ध

Sat, 13 Jan 2024 05:08 PM IST
निवेदिता वर्मा चंदन मिश्र, संवाद न्यूज एजेंसी, पंचकूला
चंदन मिश्र, संवाद न्यूज एजेंसी, पंचकूला Published by: निवेदिता वर्मा Updated Sat, 13 Jan 2024 05:08 PM IST
सार

गिद्धों को स्वच्छता का दूत कहा जाता है, लेकिन 1990 के बाद से भारत में इनकी प्रजाति लुप्त होती गई। पक्षियों की इस प्रजाति को बचाने के लिए ही पिंजौर में 2004 में सरंक्षण एवं प्रजनन केंद्र खोला गया था। अब 20 वर्षों में गिद्धों की संख्या 405 तक पहुंच गई है।

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Number of vultures increasing in Pinjore breeding center
गिद्ध

विस्तार

पिंजौर के प्रजनन केंद्र में गिद्दों का कुनबा बढ़ना पर्यावरण संरक्षण के लिए शुभ संकेत है। पिंजौर में 2004 में गिद्धों का प्रजनन केंद्र स्थापित किया गया था। 

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सबसे पहले केंद्र में दो अंडे लाकर इंक्यूवेटर में रख उनमें से बच्चे निकाले गए थे। अब 20 वर्षों में गिद्धों की संख्या 405 तक पहुंच गई है। यह जानकारी डीएफओ वाइल्ड लाइफ विशाल कौशिक ने दी है। उन्होंने बताया कि आठ गिद्धों को जीपीएस लगाकर 2020 में एशिया के पहले जिप्सवल्चर रिइंट्रोडक्शन प्रोग्राम के तहत रिहा कर प्राकृतिक माहौल में छोड़ा गया था।
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मार्च के आखिरी तक 25 गिद्धों को छोड़ने की तैयारी
उन्होंने बताया कि मार्च के आखिरी सप्ताह तक 25 गिद्धों को छोड़ने की तैयारी है। जिसमें सफेद दुम वाले गिद्ध शामिल हैं। उन्होंने बताया कि गिद्धों को छोड़ने से पहले उनके पैरों में जीएसएम (ग्लोबल सिस्टम ऑफ मोबाइल कम्युनिकेशन) बांधा जाएगा। जिससे गिद्धों की लोकेशन की जानकारी मिलती रहे। 
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कौशिक ने बताया कि इसके लिए टेलीकॉम विभाग की अनुमति की जरूरत है। उसके बाद गिद्धों को छोड़ा जाएगा। इससे पहले 2020 में छोड़े गिद्धों के पैरों में जीपीएस बांधकर मॉनिटरिंग सैटेलाइट के जरिये की जा रही है। प्रजनन केंद्र से छोड़ सभी गिद्ध स्वस्थ हैं। इनमें तीन से चार गिद्ध तो खाना खाने के लिए पिंजौर के प्रजनन केंद्र पहुंच जाते हैं।  

तीन कालोनियों में रहते हैं
मादा गिद्ध साल में केवल एक ही अंडा देती है, लेकिन उन्होंने अपने केंद्र में उनसे दो अंडे प्राप्त करने में सफलता हासिल की है। केंद्र में गिद्धों की तीन कॉलोनियां बनाई गई हैं। प्रत्येक में 15 से 20 घौंसले हैं, जिनमें रखे गिद्धों के जोड़े वर्ष में एक बार अंडा देते हैं, जिन्हें डॉक्टर व रिसर्च टीम उठा लेती है और 15 दिन में मादा गिद्ध दूसरा अंडा दे देती है। 

उठाए अंडों को सबसे पहले इंक्यूवेटर (उष्मा यंत्र) में लगभग 60 दिनों तक रखा जाता है, जिसमें से चूजे निकल आते हैं। जबकि गिद्ध प्राकृतिक तौर पर अंडों को सेने का कार्य 2-3 सप्ताह में पूरा कर लेती है, जिससे चूजों के बचने की संभावना अधिक होती है, बल्कि उनकी संख्या में भी तेजी से वृद्धि हो रही है। 


अंडे इसलिए चुराते हैं जिससे गिद्ध को लगता है कि उसका बच्चा नहीं रहा। इसलिए वह दोबारा प्रजनन की स्थिति में आ जाते हैं और इनकी संख्या वृद्धि में मदद मिलती है। चूजा निकलने के बाद वहीं पर कुछ दिनों के लिए चूजों को बकरी का नरम मीट दिया जाता है, बाद में होल्डिंग वे में पंख विकसित होने तक लगभग तीन माह तक रखा जाता है।

 

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