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Kurukshetra News: लोक परंपरा के रंगों से सजे घर-आंगन
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कुरुक्षेत्र। नवरात्र से पहले हरियाणा के गांवों और कस्बों में पारंपरिक सांझी उत्सव की तैयारियां शुरू हो गई हैं। महिलाएं और बच्चियां मिट्टी से देवी सांझी का चेहरा, नथ, कुंडल, पोशाक और पैर तैयार करने में जुटी हैं। अमावस्या के दिन शनिवार को जिलेभर में सांझी स्थापित की जाएगी।
सांझी उत्सव को प्रदेश की समृद्ध लोक परंपराओं का प्रतीक माना जाता है। इसे नवरात्र से पहले देवी के आगमन का शुभ संकेत भी मानते हैं। सांझी के साथ उसके भाई गोधू, चिड़िया, बत्तख और सितारों की आकृतियां भी बनाई जाती हैं। ये आकृतियां प्रकृति और मनुष्य के आपसी संबंध को दर्शाती हैं। बुजुर्ग महिला शारदा रानी के अनुसार, यह उत्सव नई पीढ़ी को हरियाणा की पारंपरिक विरासत से जोड़ता है। आधुनिकता के दौर में भी सांझी लोक संस्कृति और पारिवारिक परंपराओं से जुड़ाव का माध्यम बनी हुई है।
चावल के घोल से रंगाई और भोग पंडित ओम प्रकाश और शांति देवी ने बताया कि सांझी को आकर्षक बनाने के लिए चावल के घोल से रंगाई की जाती है। मिट्टी की आकृतियों को बोरी-कट्टों और खाट के सहारे सुखाया जाता है। सूखने के बाद इन्हें दीवार पर सजाया जाता है और देवी रूप के चेहरे को कपड़े से ढका जाता है। सांझी स्थापित होने के बाद रोजाना सुबह-शाम पूजा कर भोग लगाया जाता है। घरों में महिलाएं और युवतियां मिलकर इस परंपरा को उत्साह से आगे बढ़ाती हैं।
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सांझी उत्सव को प्रदेश की समृद्ध लोक परंपराओं का प्रतीक माना जाता है। इसे नवरात्र से पहले देवी के आगमन का शुभ संकेत भी मानते हैं। सांझी के साथ उसके भाई गोधू, चिड़िया, बत्तख और सितारों की आकृतियां भी बनाई जाती हैं। ये आकृतियां प्रकृति और मनुष्य के आपसी संबंध को दर्शाती हैं। बुजुर्ग महिला शारदा रानी के अनुसार, यह उत्सव नई पीढ़ी को हरियाणा की पारंपरिक विरासत से जोड़ता है। आधुनिकता के दौर में भी सांझी लोक संस्कृति और पारिवारिक परंपराओं से जुड़ाव का माध्यम बनी हुई है।
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चावल के घोल से रंगाई और भोग पंडित ओम प्रकाश और शांति देवी ने बताया कि सांझी को आकर्षक बनाने के लिए चावल के घोल से रंगाई की जाती है। मिट्टी की आकृतियों को बोरी-कट्टों और खाट के सहारे सुखाया जाता है। सूखने के बाद इन्हें दीवार पर सजाया जाता है और देवी रूप के चेहरे को कपड़े से ढका जाता है। सांझी स्थापित होने के बाद रोजाना सुबह-शाम पूजा कर भोग लगाया जाता है। घरों में महिलाएं और युवतियां मिलकर इस परंपरा को उत्साह से आगे बढ़ाती हैं।
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