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डिपोर्ट युवकों की पीड़ा : 10 दिनों तक गाजर, गोभी व टमाटर पर छिड़ककर खाया नमक

Wed, 29 Oct 2025 01:52 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल Updated Wed, 29 Oct 2025 01:52 AM IST
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The suffering of deported youth: For 10 days they ate salt sprinkled on carrots, cabbage and tomatoes.
सोनू थुआ
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कैथल। डंकी रूट से डॉलर कमाने की चाह में अमेरिका पहुंचे लोगों का जीवन वहां की अस्थायी जेलों में नारकीय बन गया है। सैकड़ों लोगों को पीने का पानी और भरपेट भोजन तक नहीं मिल पा रहा है। जीवन बचाने के लिए शाकाहारी लोगों को दस दिन तक कच्ची गोभी, टमाटर और गाजर जैसी मौसमी सब्जियों पर नमक छिड़ककर पेट भरना पड़ा। यह दर्दभरी सच्चाई अमेरिका से डिपोर्ट होकर लौटे लोगों ने नाम न छापने की शर्त पर साझा की।



अमेरिका में रह चुके राजेश, बिट्टू और नरेंद्र का कहना है कि वे परिवार को बेहतर जिंदगी देने के लिए डॉलर कमाने की चाह में अमेरिका गए थे, लेकिन ट्रंप सरकार आने के बाद हालात पूरी तरह बदल गए। पैसा कमाने गए लोग अब खुलकर काम भी नहीं कर पा रहे हैं। अंग्रेज़ी न बोल पाने वाले भारतीयों को पकड़-पकड़कर जेलों में डाला जा रहा है।
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अमेरिकी इमिग्रेशन एंड कस्टम इंफोर्समेंट एजेंसी के कर्मचारी जगह-जगह नाके लगाकर विदेशी नागरिकों के कागजों की जांच कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि डर के माहौल में घर से बाहर निकलना तक मुश्किल हो गया है। खाने-पीने का सामान लाने के लिए भी लोग डरते हैं कि कहीं अमेरिकी सैनिक पकड़कर जेल में न डाल दें।
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कैथल जिले की बात करें तो यहां से करीब एक हजार लोग अमेरिका के शहरों—कैलिफोर्निया, शिकागो, न्यूयॉर्क, डेलस, फ्रेस्नो और एरिज़ोना आदि—में काम करने गए हुए हैं। सभी को अपने देश डिपोर्ट किए जाने का खतरा बना हुआ है।



बॉक्स — अपनी पुश्तैनी जमीन बेचकर गए अमेरिका



हरियाणा और पंजाब के अधिकांश लोग अपनी जमीन-जायदाद, दुकानें और गहने बेचकर या गिरवी रखकर विदेश गए हैं। परिजनों के चेहरों पर मायूसी छाई हुई है, क्योंकि उन्हें डर है कि कहीं उनके लाल खाली हाथ वापस न लौट आएं।



बॉक्स — मौसमी कच्ची सब्जियों पर नमक छिड़ककर भरा पेट



नाम न छापने की शर्त पर डिपोर्ट होकर लौटे एक व्यक्ति ने भावुक होकर बताया, “मैं मार्च महीने में अमेरिका की दीवार फांदकर दाखिल हुआ था। पांच महीने जंगलों में छिपकर गुजारे। डोकरों को 20 लाख रुपये देकर वहां से निकला। सात दिन भूखा-प्यासा पैदल चला।”



उसने बताया कि अमेरिका की अस्थायी जेल में दो दिन तक उसके सामने मुर्गे का मांस रखा गया, लेकिन शाकाहारी होने के कारण वह खा नहीं सका। “दो दिन सिर्फ पानी पर गुज़ारा किया। फिर गाजर, गोभी और टमाटर जैसी कच्ची सब्जियों पर नमक छिड़ककर खाना शुरू किया। दस दिन तक यही खाया-पिया। बाद में एक-आधी रोटी मिलनी शुरू हुई।”



उसने बताया कि उसके पास सिर्फ एक एकड़ जमीन थी, जिसे बेचकर गया था। एजेंट से 75 लाख रुपये में सौदा हुआ था। उसका कहना है — “अगर विदेश जाना ही है तो कानूनी रास्ते से जाएं। डंकी रूट मौत को दावत देने जैसा है।”



बॉक्स — पानी मांगने पर सेना के जवान देते थे गालियां



शहर निवासी एक युवक ने बताया कि वह सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा था, लेकिन सफलता न मिलने पर विदेश जाने का निर्णय लिया। नवंबर में वह स्पेन गया और वहां से तीन बार मेक्सिको जाने की कोशिश की, लेकिन हर बार हवाई अड्डे से वापस भेज दिया गया। चौथी बार में वह मेक्सिको पहुंचा, जहां से अमेरिका गया।



अमेरिका की अस्थायी जेल में उसे दिन में दो बार पानी मिलता था—वह भी रेतीला और खारा। पानी और खाना खाते समय अमेरिकी सैनिक ऊपर खड़े रहते और अंग्रेज़ी में गालियां देते थे। एक सेंटर में 40 से 60 लोगों को कबूतरों की तरह जाल में ठूंसा गया था। सोने के लिए सिर्फ़ पॉलिथीन दी जाती थी।



उसने बताया कि वह 50 लाख रुपये खर्च करके गया था, जो उसने अपनी मां के गहने बेचकर जुटाए थे। अब लौटकर कहता है- “देश में रहकर ही मेहनत करें, विदेश जाकर जान जोखिम में न डालें।”



बॉक्स — फरवरी से पहले लोकेशन लगाकर छोड़ दिया जाता था



अमेरिका में रहने वाले रामजी और सुखदेव ने बताया कि पहले अमेरिका के नियम इतने सख्त नहीं थे। फरवरी से पहले डंकी रूट से पकड़े गए लोगों को अस्थायी जेल में रखकर बाद में अदालत में पेश किया जाता था। फिर उनके हाथ-पैर में लोकेशन डिवाइस लगाकर छोड़ दिया जाता था। वे उसी लोकेशन सीमा में रहकर काम कर सकते थे।



इमिग्रेशन एंड कस्टम इंफोर्समेंट एजेंसी के अधिकारी हफ्ते में एक बार स्थिति की जांच करते थे। वर्क परमिट भी जारी हो जाता था और ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने की अनुमति भी मिल जाती थी। लेकिन अब नियम बेहद सख्त कर दिए गए हैं।



बॉक्स — सरकारी नौकरी छोड़कर गया था युवक



गांव जाडौला निवासी सुखबीर तीन साल पहले इटली गया था और वहां एक वर्ष रहा। परिजनों ने उसे भेजने में 17 लाख रुपये खर्च किए थे। बाद में उसने मेक्सिको की दीवार पार करने की कोशिश की, लेकिन पकड़ा गया।



छह महीने पहले उसकी मां का निधन हो गया। सुखबीर करनाल में फायर ब्रिगेड विभाग में कर्मचारी था, लेकिन बेहतर भविष्य के लिए उसने नौकरी छोड़ दी। उसके दो छोटे बेटे हैं। दो वर्ष से वह शिविर में रह रहा था, अब उसे डिपोर्ट कर भारत भेज दिया गया है।



बॉक्स — ये काम कर रहे लोग



अमेरिका में रहने वाले अधिकांश भारतीय ड्राइवरी, माली, शोरूम हेल्पर, लकड़ी और बिजली का काम करते हैं। वाहन चालकों के लिए हालात सबसे ज्यादा कठिन हैं क्योंकि उनसे अंग्रेजी में बातचीत की जाती है।



अनुमान है कि करीब 50 हजार भारतीय डंकी रूट से अमेरिका पहुंचे हैं। कैथल जिले के 26 लोग डिपोर्ट हो चुके हैं। बताया जा रहा है कि दो और तीन फरवरी को एक और जहाज डिपोर्टियों को लेकर आ सकता है।




वर्जन — एजेंट की वैधता अवश्य जांच लें : एसपी



एसपी उपासना यादव ने आमजन से अपील की है कि विदेश भेजने के नाम पर किसी भी एजेंट या व्यक्ति को पैसे देने से पहले उसकी वैधता अवश्य जांच लें। ऐसे किसी भी संदिग्ध मामले की जानकारी तुरंत पुलिस को दें।
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