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Hindi News ›   Haryana ›   Kaithal News ›   Ladli Murder Case: Death sentence commuted to life imprisonment; convict will not be released from jail before 50 years.

लाडली हत्याकांड: फांसी की सजा उम्रकैद में बदली, 50 साल से पहले जेल से नहीं छूटेगा दोषी

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 12 Aug 2026 01:52 AM IST
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Ladli Murder Case: Death sentence commuted to life imprisonment; convict will not be released from jail before 50 years.
अमर उजाला ब्यूरोकैथल, चंडीगढ़। हरियाणा के कैथल में सात साल की बच्ची से दुष्कर्म के बाद उसकी हत्या करने के मामले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने दोषी पवन उर्फ मोनी की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया है। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि उम्रकैद का अर्थ यहां सामान्य रूप से 14 या 20 साल बाद रिहाई नहीं है। दोषी को कम से कम 50 वर्ष की वास्तविक कैद भुगतनी होगी। इसके बाद ही उसकी रिहाई पर विचार किया जा सकेगा।
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हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दोषी पर कुल 73 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। इसमें हत्या के अपराध में 50 लाख और बाल यौन अपराध संरक्षण कानून के तहत 23 लाख रुपये का जुर्माना शामिल है। अदालत ने निर्देश दिया है कि जुर्माने की राशि पीड़ित बच्ची के परिवार को मुआवजे के रूप में दी जाए।
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हाईकोर्ट ने फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलते हुए दोषी को समाज से लंबे समय तक दूर रखने का आदेश दिया है। अदालत ने निर्देश दिया है कि जुर्माने से प्राप्त राशि पीड़ित बच्ची के माता-पिता और भाई-बहनों को बराबर हिस्से में दी जाए। यदि दोषी जुर्माने की राशि जमा नहीं करता है तो उसकी रिहाई केवल इस आधार पर नहीं हो पाएगी। उसे अदालत द्वारा निर्धारित वास्तविक कैद की अवधि पूरी करनी होगी और जुर्माने की वसूली भी कानून के अनुसार की जाएगी।
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खेलते समय लापता हो गई थी बच्ची
मामला कैथल जिले के एक गांव का है। 8 अक्तूबर 2022 को सात साल की बच्ची खेलते समय अचानक लापता हो गई थी। परिजनों ने उसकी तलाश शुरू की, लेकिन उसका पता नहीं चला। अगले दिन बच्ची का आधा जला हुआ शव बरामद हुआ। घटना के बाद इलाके में सनसनी फैल गई थी। जांच के दौरान पुलिस ने पवन उर्फ मोनी को मामले में आरोपी बनाया। निचली अदालत के फैसले के खिलाफ दोषी ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी। हाईकोर्ट ने मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया, लेकिन साथ ही 50 वर्ष की वास्तविक कैद की शर्त लगा दी। इस तरह दोषी को राहत मिलने के बावजूद वह लंबे समय तक जेल से बाहर नहीं आ सकेगा। अदालत ने आर्थिक दंड के जरिए पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता सुनिश्चित करने का भी प्रावधान किया है।
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