{"_id":"68055ef36e3961f1ea0f0ca1","slug":"great-men-make-us-meet-the-ultimate-truth-sadhvi-bharti-kaithal-news-c-245-1-kht1001-130880-2025-04-21","type":"story","status":"publish","title_hn":"महापुरुष परम सत्य से कराते हैं साक्षात्कार : साध्वी भारती","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
महापुरुष परम सत्य से कराते हैं साक्षात्कार : साध्वी भारती
Mon, 21 Apr 2025 02:31 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
Updated Mon, 21 Apr 2025 02:31 AM IST
विज्ञापन
कैथल। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के तत्वावधान में रविवार को आश्रम में दिव्य सत्संग कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें काफी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया। इस अवसर पर संस्थान की प्रचारिका एवं आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी कुलदेवी भारती ने गूढ़ आध्यात्मिक विषयों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जब भी इस धरती पर कोई महापुरुष अवतरित होते हैं, तो उनका उद्देश्य समाज के प्रत्येक व्यक्ति को परम सत्य का साक्षात्कार कराना होता है। वे मानव को परमात्मा के अंश की पहचान कराते हैं।
ये कार्य वे ब्रह्मज्ञान या ब्रह्मविद्या के माध्यम से करते हैं। इस ब्रह्मज्ञान से व्यक्ति को आत्मबोध होता है। वह जान पाता है कि उसका सच्चा स्वरूप क्या है। यही ज्ञान मनुष्य को भटकाव से मुक्ति दिलाकर उसे सच्चे धर्म के पथ पर अग्रसर करता है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब समाज ब्रह्मज्ञान के मूल तत्वों को छोड़ केवल महापुरुषों के नाम पर बाहरी आडंबरों और उपदेशों तक सीमित रह जाता है। जब आत्म साक्षात्कार नहीं होता, तब धर्म केवल एक परंपरा बन कर रह जाता है। उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति बिना ब्रह्मज्ञान के केवल धार्मिक आडंबरों का पालन करता है, तो उसका आचरण धीरे-धीरे दिखावे और अहंकार में डूबने लगता है। फिर समाज में दूसरों को नीचा दिखाने और स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने की प्रवृत्तियां जन्म लेने लगती हैं।केवल धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना पर्याप्त नहीं है, जब तक कि हम उनके भीतर छिपे आत्मतत्त्व को न समझें। उन्होंने इसे एक करछी की उपमा से समझाया जो रोज दाल-सब्जी में जाती है पर उसका स्वाद नहीं जानती। इसी प्रकार हम परमात्मा के बारे में बहुत कुछ सुनते-पढ़ते हैं लेकिन जब तक उसका साक्षात्कार नहीं होता, तब तक वह केवल जानकारी बनकर रह जाता है, अनुभव नहीं बनता।
विज्ञापन
ये कार्य वे ब्रह्मज्ञान या ब्रह्मविद्या के माध्यम से करते हैं। इस ब्रह्मज्ञान से व्यक्ति को आत्मबोध होता है। वह जान पाता है कि उसका सच्चा स्वरूप क्या है। यही ज्ञान मनुष्य को भटकाव से मुक्ति दिलाकर उसे सच्चे धर्म के पथ पर अग्रसर करता है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब समाज ब्रह्मज्ञान के मूल तत्वों को छोड़ केवल महापुरुषों के नाम पर बाहरी आडंबरों और उपदेशों तक सीमित रह जाता है। जब आत्म साक्षात्कार नहीं होता, तब धर्म केवल एक परंपरा बन कर रह जाता है। उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति बिना ब्रह्मज्ञान के केवल धार्मिक आडंबरों का पालन करता है, तो उसका आचरण धीरे-धीरे दिखावे और अहंकार में डूबने लगता है। फिर समाज में दूसरों को नीचा दिखाने और स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने की प्रवृत्तियां जन्म लेने लगती हैं।केवल धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना पर्याप्त नहीं है, जब तक कि हम उनके भीतर छिपे आत्मतत्त्व को न समझें। उन्होंने इसे एक करछी की उपमा से समझाया जो रोज दाल-सब्जी में जाती है पर उसका स्वाद नहीं जानती। इसी प्रकार हम परमात्मा के बारे में बहुत कुछ सुनते-पढ़ते हैं लेकिन जब तक उसका साक्षात्कार नहीं होता, तब तक वह केवल जानकारी बनकर रह जाता है, अनुभव नहीं बनता।
विज्ञापन