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Kaithal News: जिसे करने से दुख प्राप्त हो, वह पाप ः रेखा
Thu, 07 Mar 2024 12:48 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
Updated Thu, 07 Mar 2024 12:48 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
कलायत। ब्रह्मकुमारी आश्रम में महाशिव रात्रि पर्व धूमधाम से मनाया। कार्यक्रम में चंडीगढ़ व पंजाब से भी मेहमान शामिल रहे। आश्रम संचालक बहन रेखा ने कहा जिस काम को करने से स्वयं व दूसरों को दुख हो वह पाप है।
उन्होंने कहा कि हमारी 10 इंद्रियां हैं जिनमें पांच कर्मेंद्रियां पांच ज्ञानेंद्रिय है। पाप दोनों से होता है अर्थात पाप हाथ से भी होता है और कानों से भी होता है। पाप से छूटने के लिए क्या करना है यह किसी को पता नहीं, इसलिए गलती होती रहती हैं। अपने गुरुजी के लिए गलत सोचना व बोलना भी पाप है।
बहन राजेंद्र ने शिवरात्रि के वास्तविक अर्थ पर प्रकाश डाला और बताया कि मनुष्य बड़ी श्रद्धा व उत्साह से शिवरात्रि मनाते हैं। अर्धरात्रि से ही लाइन में लग जाते हैं। शिवजी पर जल व दूध के साथ-साथ अर्क के फूल, धतूरा, बेलपत्र आदि चढ़ाते हैं, जो कि सामान्यत: देवी देवताओं पर नहीं चढ़ाए जाते, क्या कभी सोचा है क्यों।
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देवी देवताओं पर खुशबूदार फूल व मिठाई एवं शिव पर भागं, धतूरा इत्यादि, बेर अर्थात अन्दर की ईष्या बैर-भाव को चढ़ाना, धतूरा विषय-विकारों के अर्पण का प्रतीक है। भांग का अर्थ है कि परमात्मा के प्यार का नशा करना है।
उन्होंेने समझाते हुए कहा कि स्थूल भांग का नहीं, तभी हमारे भंडारे भरपूर होंगे। बेल पत्र तीनों कालों को दर्शाते हैं कि आदि में हम ही देवी-देवता थे और हमने फिर से उस देव पद को प्राप्त करना है। इस समय चारों ओर अंधेरा है व परमात्मा शिव का धरा पर अवतरण अज्ञानता के अन्धकार को मिटाने शिवरात्रि पर होता है।
बुडलाढ़ा पंजाब से आए ब्रह्मकुमार भाई चंद्रप्रकाश ने कहा कि फाल्गुन मास वर्ष का 12वां अर्थात् अंतिम मास है। अत: फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चौदहवीं रात्रि तो महारात्रि है । वह कल्प के अन्त में होने वाली घोर अज्ञानता और अपवित्रता की द्योतक है। शिवरात्रि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अंतिम रात्रि से एक दिन पहले मनाई जाती है क्योंकि परमपिता परमात्मा शिव का अवतरण इस लोक में कलियुग के पूर्णान्त से कुछ ही वर्ष पहले हुआ था जबकि सारी सृष्टि अज्ञान अंधकार में थी।
ज्योतिस्वरूप परमपिता परमात्मा शिव प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा सतयुगी सतोप्रधान सृष्टि की स्थापना और शंकर द्वारा कलियुगी तमोप्रधान सृष्टि का महाविनाश कराते हैं। वे कलियुग के अन्त में ब्रह्मा के तन में प्रवेश करके उसके मुख द्वारा ज्ञान- गंगा बहाते हैं। कार्यक्रम की समाप्ति पर आयोजन में मौजूद सभी ने सहभोज का आनंद लिया।
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कलायत। ब्रह्मकुमारी आश्रम में महाशिव रात्रि पर्व धूमधाम से मनाया। कार्यक्रम में चंडीगढ़ व पंजाब से भी मेहमान शामिल रहे। आश्रम संचालक बहन रेखा ने कहा जिस काम को करने से स्वयं व दूसरों को दुख हो वह पाप है।
उन्होंने कहा कि हमारी 10 इंद्रियां हैं जिनमें पांच कर्मेंद्रियां पांच ज्ञानेंद्रिय है। पाप दोनों से होता है अर्थात पाप हाथ से भी होता है और कानों से भी होता है। पाप से छूटने के लिए क्या करना है यह किसी को पता नहीं, इसलिए गलती होती रहती हैं। अपने गुरुजी के लिए गलत सोचना व बोलना भी पाप है।
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बहन राजेंद्र ने शिवरात्रि के वास्तविक अर्थ पर प्रकाश डाला और बताया कि मनुष्य बड़ी श्रद्धा व उत्साह से शिवरात्रि मनाते हैं। अर्धरात्रि से ही लाइन में लग जाते हैं। शिवजी पर जल व दूध के साथ-साथ अर्क के फूल, धतूरा, बेलपत्र आदि चढ़ाते हैं, जो कि सामान्यत: देवी देवताओं पर नहीं चढ़ाए जाते, क्या कभी सोचा है क्यों।
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देवी देवताओं पर खुशबूदार फूल व मिठाई एवं शिव पर भागं, धतूरा इत्यादि, बेर अर्थात अन्दर की ईष्या बैर-भाव को चढ़ाना, धतूरा विषय-विकारों के अर्पण का प्रतीक है। भांग का अर्थ है कि परमात्मा के प्यार का नशा करना है।
उन्होंेने समझाते हुए कहा कि स्थूल भांग का नहीं, तभी हमारे भंडारे भरपूर होंगे। बेल पत्र तीनों कालों को दर्शाते हैं कि आदि में हम ही देवी-देवता थे और हमने फिर से उस देव पद को प्राप्त करना है। इस समय चारों ओर अंधेरा है व परमात्मा शिव का धरा पर अवतरण अज्ञानता के अन्धकार को मिटाने शिवरात्रि पर होता है।
बुडलाढ़ा पंजाब से आए ब्रह्मकुमार भाई चंद्रप्रकाश ने कहा कि फाल्गुन मास वर्ष का 12वां अर्थात् अंतिम मास है। अत: फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चौदहवीं रात्रि तो महारात्रि है । वह कल्प के अन्त में होने वाली घोर अज्ञानता और अपवित्रता की द्योतक है। शिवरात्रि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अंतिम रात्रि से एक दिन पहले मनाई जाती है क्योंकि परमपिता परमात्मा शिव का अवतरण इस लोक में कलियुग के पूर्णान्त से कुछ ही वर्ष पहले हुआ था जबकि सारी सृष्टि अज्ञान अंधकार में थी।
ज्योतिस्वरूप परमपिता परमात्मा शिव प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा सतयुगी सतोप्रधान सृष्टि की स्थापना और शंकर द्वारा कलियुगी तमोप्रधान सृष्टि का महाविनाश कराते हैं। वे कलियुग के अन्त में ब्रह्मा के तन में प्रवेश करके उसके मुख द्वारा ज्ञान- गंगा बहाते हैं। कार्यक्रम की समाप्ति पर आयोजन में मौजूद सभी ने सहभोज का आनंद लिया।