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100 एमएम बरसात ने सरकार के बचाए करीब 20 करोड़ तो किसानों को भी करोड़ों की बचत
Updated Wed, 28 Jun 2017 11:55 PM IST
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100 एमएम बारिश ने सरकार के बचाए करीब 20 करोड़ तो किसानों को भी करोड़ों की बचत
नसीब सैनी
कैथल। बुधवार को हुई करीब 100 एमएम से अधिक बारिश ने धान उत्पादक क्षेत्रों में बिजली की मांग में आई कमी से सरकार को करीब 20 करोड़ रुपये की सीधी बचत हुई है। वहीं किसानों को सिंचाई पर लेबर खर्च के अलावा खाद की भी बचत हुई है। सबसे बड़ी बचत भू-जल की हुई है। इस समय धान उत्पादक 7 जिलों में धान के लिए भू-जल का दोहन चरम पर था। बुधवार को अचानक हुई बारिश से ट्यूबवेल बंद हो गए। अगले तीन दिनों तक किसानों को सिंचाई की आवश्यकता नहीं रहेगी।
चरम पर थी बिजली की मांग, लगातार चल रहे थे ट्यूबवेल
पिछले सप्ताह भर से धान की रोपाई का काम चरम पर है। इसके लिए लगातार ट्यूबवेल चल रहे थे। जो करोड़ों लीटर पानी धरती की कोख से बाहर फेंक रहे थे। बिजली की मांग भी लगातार बढ़ती जा रही थी। अकेले कैथल में मंगलवार को सवा करोड़ बिजली यूनिट की मांग थी। जिसमें से अकेले कृषि क्षेत्र के लिए 70 लाख यूनिट की मांग थी। बुधवार को हुई लगभग 100 एमएम से अधिक बारिश से कृषि क्षेत्र में बिजली की मांग लगभग खत्म हो गई और सभी ट्यूबवेल बंद हो गए। कृषि वैज्ञानिकों की मानें तो अगले 3 से 5 दिन तक किसानों को ट्यूबवेल चलाने की आवश्यकता नहीं है। बल्कि जो किसान धान की रोपाई कर चुके हैं, वे खेतों से पानी निकाल रहे हैं।
7 धान उत्पादक जिलों में बिजली की कमी से सरकार को करीब 20 करोड़ की बचत
कृषि क्षेत्र में बिजली यूनिट पर सरकार बिजली विभाग को सब्सिडी देती है। सालाना करीब 6 हजार करोड़ रुपया सरकार किसानों को दी जाने वाली बिजली के लिए बिजली विभाग को अदा करती है। इस तरह से यदि 7 जिलों में औसत 70 लाख यूनिट बिजली की बचत का हिसाब लगाया जाए तो 4 से 5 रुपये प्रति यूनिट की दर से एक दिन में लगभग 5 करोड़ बिजली यूनिट की बचत हुई है। जिससे सरकार का लगभग 20 करोड़ रुपया बचा है। इसके अलावा यदि बारिश न होती तो किसानों को सिंचाई के लिए लेबर पर करोड़ों रुपया खर्च करना पड़ता। अब इसकी भी बचत हुई है। साथ ही बारिश के पानी में वातावरण में मौजूद प्राकृतिक तौर पर नाइट्रोजन मिक्स हो जाता है। जिससे किसानों की खाद पर भी भारी बचत हुई है।
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बेशकीमती भू-जल की बचत
सरकार व किसानों की बचत का तो आंकलन किया जा सकता है। लेकिन एक दिन की बारिश से जो असली बचत हुई है। वह भू-जल की है। धान उत्पादक जिलों कैथल, कुरुक्षेत्र, करनाल, अंबाला, पानीपत का क्षेत्र, यमुनानगर, जींद का इलाका, सिरसा, फतेहाबाद क्षेत्र में धान के लिए इस समय धड़ल्ले से चल रहे ट्यूबवेल व सबमर्सीबलों के माध्यम से करोड़ों लीटर पानी बाहर निकाला जा रहा था। अब बारिश से 3 से 5 दिन तक सिंचाई की आवश्यकता नहीं रहेगी। जिससे भू-जल की बड़ी बचत हुई है।
कृषि वैज्ञानिक डा. रमेश वर्मा ने कहा कि बुधवार को अनुमानित 100 एमएम बारिश हुई है। जिससे किसानों को अगले 3 से 5 दिन तक सिंचाई की जरूरत नहीं रहेगी। बल्कि किसानों की सिंचाई के लिए लेबर खर्च व खाद की भी काफी बचत होगी।
बिजली विभाग के अधीक्षक अभियंता आरके तेवतिया का कहना है कि मंगलवार को कैथल में कृषि क्षेत्र के लिए करीब 70 लाख यूनिट की मांग थी। बारिश से स्वाभाविक है कि मांग में कमी आ जाती है।
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नसीब सैनी
कैथल। बुधवार को हुई करीब 100 एमएम से अधिक बारिश ने धान उत्पादक क्षेत्रों में बिजली की मांग में आई कमी से सरकार को करीब 20 करोड़ रुपये की सीधी बचत हुई है। वहीं किसानों को सिंचाई पर लेबर खर्च के अलावा खाद की भी बचत हुई है। सबसे बड़ी बचत भू-जल की हुई है। इस समय धान उत्पादक 7 जिलों में धान के लिए भू-जल का दोहन चरम पर था। बुधवार को अचानक हुई बारिश से ट्यूबवेल बंद हो गए। अगले तीन दिनों तक किसानों को सिंचाई की आवश्यकता नहीं रहेगी।
चरम पर थी बिजली की मांग, लगातार चल रहे थे ट्यूबवेल
पिछले सप्ताह भर से धान की रोपाई का काम चरम पर है। इसके लिए लगातार ट्यूबवेल चल रहे थे। जो करोड़ों लीटर पानी धरती की कोख से बाहर फेंक रहे थे। बिजली की मांग भी लगातार बढ़ती जा रही थी। अकेले कैथल में मंगलवार को सवा करोड़ बिजली यूनिट की मांग थी। जिसमें से अकेले कृषि क्षेत्र के लिए 70 लाख यूनिट की मांग थी। बुधवार को हुई लगभग 100 एमएम से अधिक बारिश से कृषि क्षेत्र में बिजली की मांग लगभग खत्म हो गई और सभी ट्यूबवेल बंद हो गए। कृषि वैज्ञानिकों की मानें तो अगले 3 से 5 दिन तक किसानों को ट्यूबवेल चलाने की आवश्यकता नहीं है। बल्कि जो किसान धान की रोपाई कर चुके हैं, वे खेतों से पानी निकाल रहे हैं।
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7 धान उत्पादक जिलों में बिजली की कमी से सरकार को करीब 20 करोड़ की बचत
कृषि क्षेत्र में बिजली यूनिट पर सरकार बिजली विभाग को सब्सिडी देती है। सालाना करीब 6 हजार करोड़ रुपया सरकार किसानों को दी जाने वाली बिजली के लिए बिजली विभाग को अदा करती है। इस तरह से यदि 7 जिलों में औसत 70 लाख यूनिट बिजली की बचत का हिसाब लगाया जाए तो 4 से 5 रुपये प्रति यूनिट की दर से एक दिन में लगभग 5 करोड़ बिजली यूनिट की बचत हुई है। जिससे सरकार का लगभग 20 करोड़ रुपया बचा है। इसके अलावा यदि बारिश न होती तो किसानों को सिंचाई के लिए लेबर पर करोड़ों रुपया खर्च करना पड़ता। अब इसकी भी बचत हुई है। साथ ही बारिश के पानी में वातावरण में मौजूद प्राकृतिक तौर पर नाइट्रोजन मिक्स हो जाता है। जिससे किसानों की खाद पर भी भारी बचत हुई है।
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बेशकीमती भू-जल की बचत
सरकार व किसानों की बचत का तो आंकलन किया जा सकता है। लेकिन एक दिन की बारिश से जो असली बचत हुई है। वह भू-जल की है। धान उत्पादक जिलों कैथल, कुरुक्षेत्र, करनाल, अंबाला, पानीपत का क्षेत्र, यमुनानगर, जींद का इलाका, सिरसा, फतेहाबाद क्षेत्र में धान के लिए इस समय धड़ल्ले से चल रहे ट्यूबवेल व सबमर्सीबलों के माध्यम से करोड़ों लीटर पानी बाहर निकाला जा रहा था। अब बारिश से 3 से 5 दिन तक सिंचाई की आवश्यकता नहीं रहेगी। जिससे भू-जल की बड़ी बचत हुई है।
कृषि वैज्ञानिक डा. रमेश वर्मा ने कहा कि बुधवार को अनुमानित 100 एमएम बारिश हुई है। जिससे किसानों को अगले 3 से 5 दिन तक सिंचाई की जरूरत नहीं रहेगी। बल्कि किसानों की सिंचाई के लिए लेबर खर्च व खाद की भी काफी बचत होगी।
बिजली विभाग के अधीक्षक अभियंता आरके तेवतिया का कहना है कि मंगलवार को कैथल में कृषि क्षेत्र के लिए करीब 70 लाख यूनिट की मांग थी। बारिश से स्वाभाविक है कि मांग में कमी आ जाती है।