The Night Manager Review: तिलोत्तमा, शोभिता के तेवरों से चमका ‘नाइट मैनेजर’, अनिल ने दोहराया घोस्ट प्रोटोकॉल
जॉन ल करे के दुनिया भर में चर्चित उपन्यास ‘द नाइट मैनेजर’ पर पहले पहल वेब सीरीज कोई सात साल पहले बनी। बीबीसी वन पर प्रसारण के साथ ही इसने धूम मचा दी। दर्जनों पुरस्कार जीते। और, फिर शुरू हुआ इसे दुनिया भर की अलग अलग भाषाओं में इसके निर्माण का सिलसिला। तकरीबन तीन चौथाई दुनिया घूमकर ये सीरीज अब भारत पहुंची है। डिज्नी+ हॉटस्टार की छवि ही इस देश में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित कार्यक्रमों को हिंदी में बनाने की होती जा रही है, वेब सीरीज ‘द नाइट मैनेजर’ इसी को छटांक भर और आगे बढ़ाती है। पसंघे के तौर पर इसमें अनिल कपूर हैं, श्रीधर राघवन हैं और हैं लगातार विचलित करने वाले किरदार में शाश्वत चटर्जी। इस सीरीज को देखने के यही तीन प्रमुख कारण हैं लेकिन सीरीज देखने के बाद जिन दो कलाकारों की सबसे ज्यादा तारीफ करने का आपका मन करेगा, वह हैं तिलोत्तमा शोम और शोभिता धूलिपाला।
ढाका से दिल्ली लेकिन वाया वाया
कहानी का सिरा भी हम तिलोत्तमा शोम के किरदार से ही पकड़ते हैं। वह रॉ (सीरीज में इसका पूरा नाम रिसर्च एंड एडमिनिस्ट्रेशन बताया गया है) में बांग्लादेश डेस्क पर काम करने वाली एक जुझारू खुफिया अफसर है। उसके पास वाया वाया होती हुई एक जानकारी पहुंचती है और ये जानकारी फिर वाया वाया होते हुए उसी शख्स के पास जा पहुंचती है जिसके बारे में अपनी जान पर खेलकर एक होटल के नाइट मैनेजर ने ये जानकारी पहुंचाई थी। अब दोनों की जिंदगी दांव पर है। वेब सीरीज ‘द नाइट मैनेजर’ एक ऐसे होटल मैनेजर की कहानी है जो नाइट शिफ्ट में काम करता है। होटल में ही संयोग ऐसा बनता है कि उसे एक किशोरी की मदद करनी पड़ जाती है और ये किशोरी जिस शख्स की पत्नी होती है, उसका संपर्क दुनिया भर में अपना कारोबार फैलाए बैठे एक ऐसे शख्स से होता है जिसके पीछे खुफिया विभाग बरसों से लगा है। नाइट मैनेजर का अपना भी एक अतीत है जिससे वह दूर भागना चाहता है। लेकिन, खुफिया विभाग उसे ऐसी घुट्टी पिलाता है कि वह तमाम कोशिशों के बाद भी फिर पूरे मकड़जाल से बाहर आ नहीं पाता है।
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विदेशी कहानी का अच्छा अनुकूलन
वेब सीरीज ‘द नाइट मैनेजर’ का डीएनए ऐसा है जिस पर हर देश, संस्कृति और सियासत का मुलम्मा चढ़ाया जा सकता है। ये काम सीरीज की पटकथा लिखने वाले श्रीधर राघवन ने कमाल तरीके से किया है। बांग्लादेश से शुरू हुई ये कहानी देश देश घूमती है। दूसरा सिरा इसका दिल्ली में बंधा हुआ है। खाद की फैक्ट्री के बहाने हथियारों की तस्करी की इस कहानी को देसी बनाने में इसके संवाद लेखकों अक्षय घिल्डियाल और शांतनु श्रीवास्तव ने भी खासी मेहनत की है। ऊपर से देखने मे ये सीरीज एक्शन थ्रिलर लगती है लेकिन इसकी अंतर्धारा ड्रामा और सस्पेंस की है। और, धीरे धीरे परत दर परत खुलती इसकी कहानी की यही खासियत इसे आखिर तक देखने का चाव बनाए रखती है। दूसरे देशों में सीरीज की पूरी कहानी एक साथ दिखाई गई। यहां हॉटस्टार के हुक्मरान ने इसे दो हिस्सों में बांट दिया है। ओरीजनल सीरीज के पहले तीन एपिसोड की कहानी हिंदी में चार एपीसोड में दिखाने के बाद सीरीज का ढप्पा है। बाकी एपिसोड अब गर्मियों में आएंगे। एहसास ऐसे मौके पर कुछ ऐसा होता है कि किसी उपन्यास का कवर देखकर आप उसे पढ़ना शुरू करें और बीच में ही आधी किताब कोई फाड़कर अपने पास रख ले।
परम सुंदरी वाला परम कारोबारी
खैर, पहले सीजन के चार एपिसोड्स की रंगत देखें तो इसमें इश्क, मोहब्बत के गुब्बारे भी खूब फूटे हैं। अनिल कपूर एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय हथियार तस्कर की भूमिका में हैं जिसकी नब्ज कर्ज के सहारे चल रही है। किसी सौंदर्य प्रतियोगिता में दिखी सबसे खूबसूरत लड़की अब उसकी रखैल है। बीवी से उसका तलाक हो चुका है। लेकिन, बेटे को छुट्टी होने पर वह अपने पास बुला लेता है। और, ये बेटा ही नाइट मैनेजर को ये मौका देता है कि वह इस किले में सेंध लगा सके। नाइट मैनेजर अब सिर्फ नाइट मैनेजर नहीं है। वह जासूस बन चुका है। रॉ की तफ्तीश का हिस्सा भी वह बन चुका है। और, ये सब करने के लिए उसको बार बार सीरीज के लेखक याद दिलाते रहते हैं बांग्लादेश का वह हादसा, जो उसकी दिल्ली भेजी सूचना के वापस ढाका लौट आने के चलते होता है। और, इस सबके दौरान अनिल कपूर के तेवर, हावभाव सब 12 साल पहले रिलीज हुई फिल्म ‘मिशन इंपॉसिबल घोस्ट प्रोटोकॉल’ के ब्रिजनाथ की याद दिलाते रहते हैं।
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और, वेब सीरीज ‘द नाइट मैनेजर’ में नाइट मैनेजर के किरदार में हैं आदित्य रॉय कपूर। बीच पर बिकिनी में परम सुंदरी को देखकर भी उसका इमान नहीं डोलता। अतीत उसका फौज का है, वर्तमान उसका बदले का है और भविष्य उसका क्या होगा ये जून में पता चलेगा। आदित्य रॉय कपूर की कद काठी वाकई एक नाइट मैनेजर जैसी ही है। किरदार के लिए उनका शरीर सौष्ठव भी बिल्कुल फिट है। लेकिन अगर मूल सीरीज में इसी किरदार के लिए टॉम हिडलस्टन के अभिनय के पैमाने पर उन्हें देखें तो उनका अभिनय काफी कमजोर दिखता है। सीरीज को आधे में ही रोक देने के अलावा जो बात इस सीरीज को देखते हुए खटकती है वह आदित्य का अभिनय ही है। यहां गौर करने लायक बात ये भी है कि पहले ये रोल ऋतिक रोशन को ऑफर होने की अरसे तक चर्चा रही है और ऋतिक रोशन जैसे कलाकार की कमी आदित्य रॉय कपूर पूरी कर सकेंगे, ये बात सोचने के स्तर पर ही सही नहीं दिखती। हालांकि निर्देशन की इसे चतुराई ही कहेंगे कि आदित्य के साथ शाश्वत चटर्जी को बार बार फ्रेम में लाकर इस कमी की तरफ इसे बनाने वाले दर्शकों का ध्यान जाने नहीं देते।
तिलोत्तमा और शोभिता के दमदार तेवर
सीरीज की असल धड़कनें हैं इसकी दो मुख्य महिला किरदार जिन्हें निभाया है शोभिता धूलिपाला और तिलोत्तमा शोम ने। परम सुंदरी के किरदार में शोभिता का अभिनय अपनी जगह बिल्कुल सटीक है। उनका देह प्रदर्शन ठीक वहीं पर होता है जहां इसकी जरूरत होती है। वह एक अंतर्राष्ट्रीय कारोबारी की असल पहचान से अनभिज्ञ है। उसका काम स्वागत में मुस्कुराना और जरूरत पर बिछ जाना है। अकेले में वह किसी से बात करके रोती भी है और ये रोना जमाने के सामने आ न जाए, इसकी उसे बेचैनी भी है। दूसरी तरफ तिलोत्तमा का किरदार पानी सा पारदर्शी है। उसकी सहजता ही विभाग में उसके वरिष्ठों को खटकती है लेकिन देश के लिए जान की बाजी लगाने को तैयार इस खुफिया अफसर के मददगार भी हैं। अपने नाइट मैनेजर से मछली मार्केट में बहाने से बातें करने वाला उनका दृश्य काफी प्रभावी बन पड़ा है और जब पेट में पल रहे बच्चे को संभाले वह दूरबीन की तरफ भागती है तो देखने वाले का कलेजा मुंह को आता है।
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तीन घंटे का अच्छा बिंज वॉच
वेब सीरीज ‘द नाइट मैनेजर’ बहुत ही नयनाभिराम स्थलों पर शूट की गई वेब सीरीज है। लुक एंड फील इसका इंटरनेशनल है। सीरीज का संगीत दर्शकों की धड़कनों की रफ्तार तेज करने के लिए बिल्कुल मुफीद है। संपादन में भी निर्देशन की पकड़ पूरी है। संदीप मोदी और प्रियंका घोष ने मिलकर एक ठीक ठाक सीरीज बनाई है। हालांकि, कहानी उधार की है और पटकथा के रंग भी जाने पहचाने से लगते हैं, पर इस सबके बावजूद चार एपीसोड तक ये सीरीज अपना आकर्षण बनाए रखती है और यही इस ‘नाइट मैनेजर’ की सूरज की लालिमा के साथ दिखने वाली सुबह है।