The Jengaburu Curse Review: 70 करोड़ की सीरीज में गिनाने लायक सात बातें भी नहीं, सोनी लिव का अभिशाप बनी सीरीज
सोनी एंटरटेनमेंट जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनी को भारत जैसे चर्चित देश के पर्यावरण में साजिश की कहानी दिखे तो उसकी दिलचस्पी तो जागेगी ही। जाहिर है कि ऐसे किसी विषय को बातचीत में ही बेच देना किसी भी फिल्मकार के लिए बाएं हाथ का खेल है। मुंबई में चर्चा तो यही है कि इस सीरीज के सात एपिसोड के लिए नील को सोनी लिव से कोई 70 करोड़ रुपये मिले हैं, ये चर्चा अली अब्बास जफर की फिल्म ‘ब्लडी डैडी’ का बजट 170 करोड़ रुपये होने जैसी हवा हवाई भी हो सकती है। लेकिन, अगर इसमें वाकई कुछ दम है तो फिर ये ओटीटी कारोबार को लगनी शुरू हो चुकी दीमक की शुरुआत भी हो सकती है। औसतन 45 मिनट के हर एपिसोड की सात एपिसोड वाली ये सीरीज उत्सुकता जगाती है लेकिन सीरीज देखना शुरू करते ही ये सारा जोश पहले एपिसोड के आखिर तक आते आते सुस्त पड़ने लगता है।
नील माधव पांडा बेहतरीन निर्देशक हैं, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन, किसी भी कहानी को रुचिकर तरीके से कहने के लिए एक थ्रिलर में जो बातें जरूरी होती हैं, वे वेब सीरीज ‘द जेंगाबुरु कर्स’ में मिसिंग हैं। नक्सल प्रभावित एक इलाके में एक पर्यावरणविद के मारे जाने की खबर उसकी लंदन में काम कर रही बेटी को मिलती है। बेटी भागकर आती है। पता चलता है कि जो शव मिला है वह किसी और का है। उसके पिता के दोस्त बेटी की मदद के लिए आगे आते हैं। दोनों मिलकर खोजबीन शुरू करते हैं तो बताया जाता है कि उसका नक्सलियों के नेता ने अपहरण कर लिया है। कहानी के बीच में एक चिकित्सक है जो सपत्नीक नक्सलियों के सेवा में लगा हुआ है। कहने को वह एक क्लीनिक भी चलाता है जिसका नाम ही है, एक रुपये वाला अस्पताल। पानी में वहां के जहर घुल रहा है और पानी के टैंकर लेकर जाने वाले वाहनों को लूटने की कोशिश में पता चलता है कि इलाके में चल रही खनन कंपनी के इरादे ठीक नहीं है।
छत्तीसगढ़ के अपने प्रवास के दौरान मैंने दंतेवाड़ा और बस्तर खूब घूमा है। वहां की लोहा खदानों को भी नजदीक से देखा। ‘द जेंगाबुरु कर्स’ ऐसे किसी भी इलाके की कहानी हो सकती है जहां कोई खनन कंपनी अपना एकाधिकार जताना चाहती है। कहानी में रस भी बनता दिखता है। लेकिन फिर एकाएक चूहे बिल्ली सा खेल शुरू हो जाता है। फिरंगियों की कहानी में एंट्री होती है और कोरिया तक पहुंच जाती है कहानी! पर्यावरण के मुलम्मे में बेची गई एक कहानी एकदम से एक अंतरराष्ट्रीय साजिश बनने लगती है और दर्शक समझ नहीं पाता है कि उसने क्या देखना शुरू किया था, और उसे अब क्या देखना पड़ रहा है। नील माधव पांडा के नाम का ग्लैमर उनके इस लेखन और निर्देशन से एकदम से छितर जाता है।
‘द जेंगाबुरु कर्स’ का लेखन और निर्देशन तो औसत दर्जे का है ही, इसकी तकनीकी टीम का काम भी बहुत दोयम दर्जे का है। पॉलो पेरेज की सिनेमैटोग्राफी ऐसी है कि इससे अच्छा काम फिल्म स्कूल से निकले बच्चे कर सकते हैं। कहानी के हिसाब से कैमरे का कोई कन्विक्शन ही नहीं है। कहीं भी कुछ भी दिख सकता है। जो छिपे हैं, वे दिख रहे हैं। जो पानी पीने की कोशिश कर रहे हैं, उनको उसी समय बताना क्यों जरूरी है कि ये पानी पीने लायक नहीं है। वे तो वहीं के वासी हैं। जब एक को पता है तो सबको पता होनी चाहिए ये बात। ऊपर से अलोकानंदा दासगुप्ता का संगीत बार बार ये याद दिलाने की कोशिश करता रहता है कि देखो, ये आदिवासी इलाके की ही कहानी है। परमजीत सिंह पम्मा के फिल्माए गए एक्शन दृश्य भी बहुत बचकाने हैं।
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वेब सीरीज ‘द जेंगाबुरु कर्स’ देखने के दो बड़े आकर्षण थे। एक तो ये नील माधव पांडा की बनाई हुई है। और, दूसरे इसमें नासर और मकरंद देशपांडे जैसे कलाकार हैं। हैदराबाद की फारिया अब्दुल्ला हालांकि कहानी का केंद्र बिंदु हैं लेकिन विदेश में पढ़कर लौटी बोंड्रिया समुदाय की एक लड़की अपनी मातृभाषा भूल चुकी है, और इसके चलते लोकल मीडिया के उपहास का पात्र बनती है, ये बात बहुत अटपटी है। कहानी के शुरू में ही हालांकि इशारा पाताल में सो रहे नाग देवता को न जगाने का रहता है लेकिन इस सूत्र को इतने हल्के तरीके से नील अपनी पहली वेब सीरीज में प्रस्तुत करेंगे, इसका अंदाजा शायद उनके कट्टर प्रशंसकों को भी न लगे।
अभिनय के मामले में पूरी सीरीज का एक भी कलाकार अपना असर नहीं छोड़ पाया है। फारिया अब्दुल्ला को लेकर भी काफी रुचि दर्शकों को रही होगी, लेकिन एक आदिवासी समुदाय की विदेश में नौकरी कर सकने वाली लड़की के किरदार में वह भरोसा जीतने में नाकाम रही हैं। नासर भी थाली सजाने भर को ही हैं यहां। वह जो बोल रहे होते हैं, उनके होंठों का उनसे साम्य नहीं नजर आता। मकरंद देशपांडे अब जैसे किरदार कर रहे हैं, वे उनकी अभिनय क्षमता पर धब्बा ही लगाने लगे हैं। बाकी कलाकारों का काम भी यहां बस भर्ती का ही है।