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Squad Review: डैनी के बेटे की पहली फिल्म में कहानी बनी चक्रव्यूह, मालविका राज का भी नहीं चला तिलिस्म

Sat, 13 Nov 2021 04:41 PM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Sat, 13 Nov 2021 04:41 PM IST
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Squad Review in Hindi Rinzing Degzongpa malvika raaj Pooja batra mohan Kapoor nilesh zaheeda sahay
स्क्वॉड - फोटो : अमर उजाला मुंबई
Movie Review
स्क्वॉड
कलाकार
रिनजिंग डेंजोगपा , मालविका राज , पूजा बत्रा और मोहन कपूर
लेखक
नीलेश जहीदा सहाय
निर्देशक
नीलेश जहीदा सहाय
निर्माता
नीलेश जहीदा सहाय , ब्रजेश सहाय , मोहन गोपीनाथ और जी स्टूडियोज
ओटीटी
जी5
रेटिंग
1/5

हिंदी सिनेमा के कद्दावर कलाकार डैनी के बेटे रिनजिंग का डेब्यू हो गया है। उनको किसी नामी निर्माता निर्देशक ने लॉन्च नहीं किया है। उनको बतौर हीरो लेकर उनकी पहली फिल्म बनाई है न्यूकमर नीलेश जहीदा सहाय ने जिनकी मां जहीदा हिंदी सिनेमा में बतौर हीरोइन काम कर चुकी हैं। अगर आपको 50 साल पहले साल 1971 में रिलीज हुई फिल्म ‘गैम्बर’ याद हो तो आपको इसका गाना ‘चूड़ी नहीं ये मेरा दिल है’ भी याद जरूर होगा। इस गाने में दिखीं जहीदा ने कुछ और फिल्मों में भी काम किया है। सिनेमा नीलेश को विरासत में मिला तो है लेकिन फिल्म जगत से अपने पुश्तैनी रिश्ते का कोई अनुभव नीलेश ने फिल्म ‘स्क्वॉड’ में इस्तेमाल भी किया हो लगता नहीं है। फिल्म को पहले ज्योति कपूर दास निर्देशित करने वाली थीं लेकिन वह प्रोजेक्ट से अलग हुईं तो नीलेश ने फिल्म के निर्माण के साथ साथ इसके निर्देशन की जिम्मेदारी भी संभाल ली। फिल्म सीधे ओटीटी पर रिलीज हुई है।

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Squad Review in Hindi Rinzing Degzongpa malvika raaj Pooja batra mohan Kapoor nilesh zaheeda sahay
स्क्वॉड - फोटो : अमर उजाला मुंबई

फिल्म ‘स्क्वॉड’ में रिनजिंग का नाम है भीम। उनकी कदकाठी भी वैसी ही है। फिल्म में उनके पहले सीन के साथ एक रैप सॉन्ग बजता है जिसमें महाभारत के भीम और पांडवों का भी जिक्र है। फिल्म भी उनकी एंट्री के बाद ‘पांडवों’ की तलाश में निकलती हैं। कृष्ण जैसा ही कुछ किरदार यहां पूजा बत्रा निभा रही हैं। एक मिशन के लिए वह एक दस्ता यानी स्क्वॉड तैयार करती हैं। ये मिशन है ‘हिंदुस्तान की बेटी’ को बचाने का। उस हिंदुस्तान की बेटी का जिसके बारे में भीम खुद कहता है, ‘हम हिंदुस्तान हैं। बोलेंगे नहीं सीधे तोड़ेंगे।’ ‘उरी-द सर्जिकल स्ट्राइक’ और ‘बागी 3’ जैसी फिल्मों से खुराक पाती इसकी कहानी विदेश में मौजूद एक बच्ची के इर्द गिर्द घूमती है। बच्ची को लेकर भीम संवेदनशील इसलिए भी है क्योंकि उसको हीरो बनाने के लिए फिल्म का पहला सीन एक दूसरी बच्ची पर खत्म होता है। अब उसे अपने साथ हुए उस हादसे के प्रायश्चित के तौर पर इसे बचाने के लिए तैयार किया जाता है।

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Squad Review in Hindi Rinzing Degzongpa malvika raaj Pooja batra mohan Kapoor nilesh zaheeda sahay
स्क्वॉड - फोटो : अमर उजाला मुंबई

फिल्म ‘स्क्वॉड’ के साथ बेसिक दिक्कत ये है कि ये फिल्म सिर्फ फिल्म बनाने के लिए बनाई गई दिखती है। पैसा, अवसर और स्टूडियो का साथ, सब कुछ होने के बावजूद नीलेश अपनी पहली ही फिल्म में कोई भी असर छोड़ने में इसलिए नाकाम रहते हैं क्योंकि फिल्ममेकिंग का उनको कोई अनुभव नहीं है और शायद इस फिल्म के निर्माण के दौरान उनके साथ कोई ऐसा शख्स बतौर सलाहकार रहा भी नहीं जो उनकी गलतियों की तरफ उनका ध्यान दिलाता चलता। फिल्म की कहानी का मूल विचार अच्छा है लेकिन पटकथा बहुत कमजोर। फिल्म के संवाद बहुत ही चलताऊ किस्म के हैं, जैसे, ‘तेरा मुंह तोड़ने में मेरा एक रुपया खर्च नहीं होगा और मुझे फ्री की चीजें तोड़ना बहुत पसंद है।’ रिनजिंग का हिंदी ज्ञान और उच्चारण दोनों कमजोर हैं। उनको पता नहीं होता कि वह सही हिंदी बोल भी रहे हैं या नहीं। फिल्म के सारे कलाकारों ने मिलकर एक साथ कोई वर्कशॉप वगैरह भी की हो, फिल्म देखकर लगता नहीं है।

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स्क्वॉड - फोटो : अमर उजाला मुंबई

लेखन और निर्देशक के स्तर पर मात खाने के अलावा फिल्म अपने कलाकारों के अभिनय  के मामले में भी बेहद कमजोर है। रिनजिंग की कदकाठी एक्शन स्टार जैसी नहीं है। उनके चेहरे पर दृश्यों के मुताबिक भाव नहीं आते। वह पूरी फिल्म में एक जैसा सपाट चेहरा लिए रहते हैं। अगर उनको वाकई अभिनय में करियर बनाना है तो उन्हें अपने शरीर और अपनी संवाद अदायगी पर बहुत मेहनत करने की जरूरत है। पूजा बत्रा और मोहन कपूर अपने अलग स्वैग में हैं। दोनों अपनी अभिनय यात्रा की मंजिल कब की पा चुके हैं। अब सेकेंड इनिंग्स में दोनों की कलाकारी में कोई कमाल शेष नहीं है। फिल्म की हीरोइन मालविका राज कभी फिल्म ‘कभी खुशी कभी गम’ में करीना कपूर के बचपन का रोल कर चुकी हैं। वह भी फिल्मी परिवार से हैं। लेकिन अभिनय का अनुभव उनके पास भी नहीं है।

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स्क्वॉड - फोटो : अमर उजाला मुंबई

फिल्मी परिवारों से ताल्लुक रखने वाले फिल्म के हीरो, हीरोइन और निर्देशक ने फिल्म ‘स्क्वॉड’ से ये भी साबित किया है कि सिर्फ फिल्मी परिवार से होने के चलते ही कोई स्टार नहीं बन जाता। इसके लिए भी बहुत मेहनत करने की जरूरत है। फिल्म जगत से रिश्ते होने के चलते तीनों को मौका तो मिल गया लेकिन उन्होंने जिस तरह से ये अपना पहला मौका जाया किया है, उससे उनकी आगे की राह आसान नहीं दिखती। फिल्म गीत संगीत के विभाग में भी बेहद कमजोर है। एडीटिंग भी लचर हैं। हां, इसकी सिनेमैटोग्राफी और इसकी अलग अलग लोकेशन्स नयनाभिराम दृश्यावलियां जरूर बनाती है लेकिन विदेशी लोकशन्स देखने के लिए ही भला कोई क्यूं दो घंटे की फिल्म देखेगा।

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