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Garmi Review: तिग्मांशु धूलिया की इलाहाबाद वापसी का क्या रहा हासिल, पढ़िए वेब सीरीज ‘गर्मी’ का रिव्यू
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गर्मी
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो , मुंबई
Movie Review
गर्मी
कलाकार
व्योम यादव
,
पुनीत सिंह
,
जतिन गोस्वामी
,
दीक्षा ठाकुर
,
पंकज सारस्वत
और
विनीत तिवारी आदि
लेखक
तिग्मांशु धूलिया
और
कमल पांडे
निर्देशक
तिग्मांशु धूलिया
निर्माता
स्वरूप संपत
और
हेमल ठक्कर
रिलीज
21 अप्रैल 2023
ओटीटी:
सोनी लिव
रेटिंग
2/5
अगर आपने साल 2003 में रिलीज हुई फिल्म ‘हासिल’ देखी होगी तो आपको ये भी याद होगा कि ये कहानी दरअसल उत्तर प्रदेश की राजनीति में क्षत्रिय बनाम ब्राह्मण की बरसों से चली आ रह लड़ाई की क्षेपक जैसी ही है। रणविजय सिंह और गौरीशंकर पांडे की कहानी की पृष्ठभूमि क्या रही होगी, दोनों ने कैसे अपने अपने ‘गिरोह’ बनाए होंगे और कैसे राजनीति में बिल्डर, बाबा और बंदूकबाज शामिल होते हैं, इसी को थोड़ा पीछे जाकर बताने की कोशिश करती है ‘हासिल’ के निर्देशक तिग्मांशु धूलिया की नई वेब सीरीज ‘गर्मी’। गर्मी ये वैसी नहीं है जैसी इन दिनों देश के अधिकतर इलाकों में पड़ रही है। ये गर्मी उस ताव की है जिसके ताप से दूसरों को बचाने में खुद के ही सक्षण होने गलतफहमी अक्सर कुछ इंसानों को हो जाती है। ‘शोले’ का गब्बर याद है ना! कभी कभी मेरे मन में ख्याल ये भी आता है कि ‘शोले’ की कहानी अगर आज के दौर में वेब सीरीज सरीखी बनी होती तो सबसे ज्यादा गालियां कौन देता, जय, वीरू, ठाकुर या फिर गब्बर?
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गर्मी
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो , मुंबई
तिग्मांशु के कंधे पर टिकी बंदूक
तिग्मांशु धूलिया के नाम का ब्रांड की तरह इस्तेमाल करती वेब सीरीज ‘गर्मी’ का ट्रेलर इसे देखने की उत्सुकता जगाता है। इलाहाबाद जैसे दिखने वाले काल्पनिक शहर त्रिवेणीपुर से 130 किमी दूर बसे लालगंज से ये कहानी शुरू होती है, जहां एक अध्यापक को अपने जवान हो चुके बेटे की चिंता है। बेटा गबरू है। बाप की बेइज्जती उसे बर्दाश्त नहीं होती और वह उनके सामने ही दुकानदार को मां की गाली दे देता है। इसी बेटे को बाद में यूनिवर्सिटी की मेस में एक सीनियर के गाली देने पर उससे भिड़ता भी तिग्मांशु दिखाते हैं। अरविंद शुक्ला नाम के इस किरदार की एंट्री हॉस्टल में छात्र संघ अध्यक्ष बिंदु सिंह की कृपा से हुई है। लेकिन, क्षत्रियों और ब्राह्मणों की लड़ाई के बीज साथ साथ वह बोते रहते हैं। एक कोतवाल है जिसकी हैसियत इतनी ज्यादा है कि वह यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर के दफ्तर में लात घूंसे चला सकता है। कसाई मोहल्ले के बमबाज से शुरू होने वाली कहानी उस दौर की है जब वीडियो वायरल होने शुरू हो चुके हैं। उत्तर प्रदेश को जानने वाले समझ सकते हैं कि ये दो कालखंड उत्तर प्रदेश की अपराध की दुनिया में कम से कम 30 साल के फासले के हैं।
तिग्मांशु धूलिया के नाम का ब्रांड की तरह इस्तेमाल करती वेब सीरीज ‘गर्मी’ का ट्रेलर इसे देखने की उत्सुकता जगाता है। इलाहाबाद जैसे दिखने वाले काल्पनिक शहर त्रिवेणीपुर से 130 किमी दूर बसे लालगंज से ये कहानी शुरू होती है, जहां एक अध्यापक को अपने जवान हो चुके बेटे की चिंता है। बेटा गबरू है। बाप की बेइज्जती उसे बर्दाश्त नहीं होती और वह उनके सामने ही दुकानदार को मां की गाली दे देता है। इसी बेटे को बाद में यूनिवर्सिटी की मेस में एक सीनियर के गाली देने पर उससे भिड़ता भी तिग्मांशु दिखाते हैं। अरविंद शुक्ला नाम के इस किरदार की एंट्री हॉस्टल में छात्र संघ अध्यक्ष बिंदु सिंह की कृपा से हुई है। लेकिन, क्षत्रियों और ब्राह्मणों की लड़ाई के बीज साथ साथ वह बोते रहते हैं। एक कोतवाल है जिसकी हैसियत इतनी ज्यादा है कि वह यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर के दफ्तर में लात घूंसे चला सकता है। कसाई मोहल्ले के बमबाज से शुरू होने वाली कहानी उस दौर की है जब वीडियो वायरल होने शुरू हो चुके हैं। उत्तर प्रदेश को जानने वाले समझ सकते हैं कि ये दो कालखंड उत्तर प्रदेश की अपराध की दुनिया में कम से कम 30 साल के फासले के हैं।
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गर्मी
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो , मुंबई
ठेठ इलाहाबादी बोली का नुस्खा
वेब सीरीज ‘गर्मी’ की जो सबसे बड़ी खासियत है वह है इसमें स्थानीय बोली का भरपूर इस्तेमाल है। इलाहाबाद की गलियों की जुबान पर तिग्मांशु को महारत वैसे भी हासिल रही ही है, जवानी की सारी बदमाशी भी वह यहां देख सुन चुके हैं। अपने शुरुआती दौर को फिर से परदे पर जीने की कोशिश करने में तिगमांशु की लिखावट में जहां जहां अनुराग कश्यप की छाया पड़ती है, वहीं वहीं ये सीरीज लड़खड़ाने लगती है। पुलिस की पूछताछ में थर्ड डिग्री का इतना वीभत्स इस्तेमाल ये सीरीज दिखाती है कि अगर किसी ने वाकई मनोरंजन के लिए ये सीरीज देखनी शुरू की है तो उबकाई आ सकती है। सीरीज की लिखावट में बोली के अलावा ऐसा कुछ है नहीं जो इसे ‘मिर्जापुर’, ‘जबलपुर’ या ‘जमाताड़ा’ से अलग दिखाता हो। सोनी लिव की क्रिएटिव टीम एक ऐसे यूनिवर्स में अटक चुकी है जिसमें उनको अपने ही दर्शकों की रुचि अभिरुचि के बारे में जानकारी कम होती जा रही है।
वेब सीरीज ‘गर्मी’ की जो सबसे बड़ी खासियत है वह है इसमें स्थानीय बोली का भरपूर इस्तेमाल है। इलाहाबाद की गलियों की जुबान पर तिग्मांशु को महारत वैसे भी हासिल रही ही है, जवानी की सारी बदमाशी भी वह यहां देख सुन चुके हैं। अपने शुरुआती दौर को फिर से परदे पर जीने की कोशिश करने में तिगमांशु की लिखावट में जहां जहां अनुराग कश्यप की छाया पड़ती है, वहीं वहीं ये सीरीज लड़खड़ाने लगती है। पुलिस की पूछताछ में थर्ड डिग्री का इतना वीभत्स इस्तेमाल ये सीरीज दिखाती है कि अगर किसी ने वाकई मनोरंजन के लिए ये सीरीज देखनी शुरू की है तो उबकाई आ सकती है। सीरीज की लिखावट में बोली के अलावा ऐसा कुछ है नहीं जो इसे ‘मिर्जापुर’, ‘जबलपुर’ या ‘जमाताड़ा’ से अलग दिखाता हो। सोनी लिव की क्रिएटिव टीम एक ऐसे यूनिवर्स में अटक चुकी है जिसमें उनको अपने ही दर्शकों की रुचि अभिरुचि के बारे में जानकारी कम होती जा रही है।
गर्मी
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो , मुंबई
व्योम यादव की बेहतरीन अदाकारी
अभिनय के लिहाज से ये सीरीज व्योम यादव की है। अरविंद शुक्ला के किरदार में व्योम ने जबर्दस्त काम किया है। आगे भी उन्हें अच्छे मौके मिले तो वह कमाल कर सकते हैं। आंखें उनकी इरफान खान जैसी ही हैं और कुछ कुछ अभिनय में भी इरफान के रंग वह ले आते हैं। हो सकता है इसमें हाथ तिग्मांशु का ज्यादा रहा हो लेकिन अगर ऐसा होता तो फिर पुनीत सिंह भी आशुतोष राणा जैसा तेवर दिखा सकते थे लेकिन उनके अभिनय में वह बात नहीं है। विनीत कुमार और जतिन गोस्वामी के नाम भी सीरीज देखने की उत्सुकता बढ़ाते हैं। विनीत कुमार ने मठाधीश बाबा के तौर पर अच्छा काम किया है। अखाड़े में पहलवानी के दांव पेंच दिखाने वाले उनके दृश्य प्रभावशाली हैं। जतिन गोस्वामी के लिए ये सीरीज खतरे की घंटी है क्योंकि मृत्युंजय सिंह का ये किरदार उनके आभामंडल में कोई नई रोशनी का इजाफा नहीं कर रहा।
अभिनय के लिहाज से ये सीरीज व्योम यादव की है। अरविंद शुक्ला के किरदार में व्योम ने जबर्दस्त काम किया है। आगे भी उन्हें अच्छे मौके मिले तो वह कमाल कर सकते हैं। आंखें उनकी इरफान खान जैसी ही हैं और कुछ कुछ अभिनय में भी इरफान के रंग वह ले आते हैं। हो सकता है इसमें हाथ तिग्मांशु का ज्यादा रहा हो लेकिन अगर ऐसा होता तो फिर पुनीत सिंह भी आशुतोष राणा जैसा तेवर दिखा सकते थे लेकिन उनके अभिनय में वह बात नहीं है। विनीत कुमार और जतिन गोस्वामी के नाम भी सीरीज देखने की उत्सुकता बढ़ाते हैं। विनीत कुमार ने मठाधीश बाबा के तौर पर अच्छा काम किया है। अखाड़े में पहलवानी के दांव पेंच दिखाने वाले उनके दृश्य प्रभावशाली हैं। जतिन गोस्वामी के लिए ये सीरीज खतरे की घंटी है क्योंकि मृत्युंजय सिंह का ये किरदार उनके आभामंडल में कोई नई रोशनी का इजाफा नहीं कर रहा।
गर्मी
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो , मुंबई
तकनीकी रूप ये दोयम सीरीज
वेब सीरीज ‘गर्मी’ के सहारे सोनी लिव की कोशिश बी और सी क्लास श्रेणी के शहरों में अपने ओटीटी ऐप के डाउनलोड बढ़ाने की हैं। लेकिन, इसकी तकनीकी खामियां इसे एक दर्शनीय सीरीज बनाने की बड़ी बाधा हैं। सीरीज के ओपनिंग क्रेडिट का मोंटाज कल्पनाशीलता की ऋणात्मक अति है। सिनेमैटोग्राफी में ऐसा कुछ है नहीं कि जिसे देखकर वाह निकल जाए। शुरू के एपिसोड में कुछ नाच नौटंकी या आल्हा जैसा दिखाकर इसमें गांव देहात के दर्शकों को जोड़ सकते थे, लेकिन बमबाजी में फंसी सीरीज अपने खुरदरे धरातल से आगे की सोचती ही नहीं है।
यह भी पढ़ें- Kisi Ka Bhai Kisi Ki Jaan Review: ‘बच्चन पांडे’ का दर्जा ऊंचा करती सलमान की फिल्म, सामजी के टैलेंट को नमस्कार
वेब सीरीज ‘गर्मी’ के सहारे सोनी लिव की कोशिश बी और सी क्लास श्रेणी के शहरों में अपने ओटीटी ऐप के डाउनलोड बढ़ाने की हैं। लेकिन, इसकी तकनीकी खामियां इसे एक दर्शनीय सीरीज बनाने की बड़ी बाधा हैं। सीरीज के ओपनिंग क्रेडिट का मोंटाज कल्पनाशीलता की ऋणात्मक अति है। सिनेमैटोग्राफी में ऐसा कुछ है नहीं कि जिसे देखकर वाह निकल जाए। शुरू के एपिसोड में कुछ नाच नौटंकी या आल्हा जैसा दिखाकर इसमें गांव देहात के दर्शकों को जोड़ सकते थे, लेकिन बमबाजी में फंसी सीरीज अपने खुरदरे धरातल से आगे की सोचती ही नहीं है।
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