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नुसरत फतेह अली खान को UNESCO ने माना था धरोहर, जापानियों ने दिया था नया खिताब
Updated Fri, 13 Oct 2017 01:56 PM IST
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फाइल फोटो
नुसरत फतेह अली खान...सूफी संगीत का एक निराला अंदाज़,...दुनिया भर में जो लोग पंजाबी-उर्दू और क़व्वाली नहीं भी समझ पाते हैं, वो भी उनकी आवाज़ और अंदाज़ में मदहोश हो जाते हैं। नुसरत ने संगीत की सभी शैलियों को आजमाते हुए भी सूफियाना अंदाज़ नहीं छोड़ा और न ही कभी खुद से कोई छेड़छाड़ की।
दुनिया यूं ही उनकी दीवानी नहीं है। क़व्वाली के वो बेताज बादशाह थे। अपने हुनर से इन्होंने गायन को इबादत बना डाला। अगर आप ढूंढें तो इनकी इबादत करने वाले आसानी से मिल जायेंगे। जब ये लम्बी तान ले कर गाते थे तो दुनिया ठहर जाती थी।
नुसरत का आज ही के दिन 13 अक्टूबर 1948 को पाकिस्तान के फैसलाबाद में जन्म हुआ था। परवेज अली खान उनके बचपन का नाम था। इनके पिता फतेह अली खान भी मशहूर कव्वाल थे, जो भारत के जालंधर के बाशिंदे थे। 600 सालों से नुसरत का खानदान कव्वाली गाता आ रहा है।
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दुनिया यूं ही उनकी दीवानी नहीं है। क़व्वाली के वो बेताज बादशाह थे। अपने हुनर से इन्होंने गायन को इबादत बना डाला। अगर आप ढूंढें तो इनकी इबादत करने वाले आसानी से मिल जायेंगे। जब ये लम्बी तान ले कर गाते थे तो दुनिया ठहर जाती थी।
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नुसरत का आज ही के दिन 13 अक्टूबर 1948 को पाकिस्तान के फैसलाबाद में जन्म हुआ था। परवेज अली खान उनके बचपन का नाम था। इनके पिता फतेह अली खान भी मशहूर कव्वाल थे, जो भारत के जालंधर के बाशिंदे थे। 600 सालों से नुसरत का खानदान कव्वाली गाता आ रहा है।
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तबला बजाने से की शुरुआत
नुसरत ने सबसे पहले तबला बजाना शुरू किया था और वो इसके लिए 20 घंटे रियाज करते थे। कहा जाता है कि उनमें इतनी कुव्वत थी कि वो मजारों और गांवों में होने वाले धार्मिक आयोजन में दिन-रात लगातार गाते थे। पाकिस्तान में तो नुसरत मशहूर थे ही लेकिन 1989 में ब्रुकलिन एकेडमी में प्रदर्शन करके वो पहली बार अमेरिका में सुर्खियों में आए थे।
संगीत में उनके योगदान को युनेस्को ने धरोहर माना है और 1995 में उन्हें महान संगीतकार के खिताब से नवाजा था। जापान में नुसरत को इसलिए नहीं पसंद किया जाता था कि वो अच्छी कव्वाली गाते हैं, जबकि वहां लोग उन्हें इसलिए पसंद करते थे कि उनकी शक्ल लाफिंग बुद्धा से मिलती थी।
2006 में टाइम मैगजीन ने उन्हें पिछले 60 सालों के सबसे बड़े 12 कलाकारों की सूची में रखा था। उनका पसंदीदा रंग सफेद और खाने में उन्हें करेला गोश्त पसंद था। उन्होंने अपने भतीजे राहत अली खान तो तीन साल की उम्र में ही ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी थी।
सात साल की उम्र में राहत ने शो में मौजूदगी दर्ज कराना शुरू कर दिया था। 16 अगस्त 1997 को इस फनकार को खुदा ने अपने पास बुला लिया, लेकिन उसकी आवाज इस दुनिया में आज भी जन्नत में होने का एहसास कराती है...
संगीत में उनके योगदान को युनेस्को ने धरोहर माना है और 1995 में उन्हें महान संगीतकार के खिताब से नवाजा था। जापान में नुसरत को इसलिए नहीं पसंद किया जाता था कि वो अच्छी कव्वाली गाते हैं, जबकि वहां लोग उन्हें इसलिए पसंद करते थे कि उनकी शक्ल लाफिंग बुद्धा से मिलती थी।
2006 में टाइम मैगजीन ने उन्हें पिछले 60 सालों के सबसे बड़े 12 कलाकारों की सूची में रखा था। उनका पसंदीदा रंग सफेद और खाने में उन्हें करेला गोश्त पसंद था। उन्होंने अपने भतीजे राहत अली खान तो तीन साल की उम्र में ही ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी थी।
सात साल की उम्र में राहत ने शो में मौजूदगी दर्ज कराना शुरू कर दिया था। 16 अगस्त 1997 को इस फनकार को खुदा ने अपने पास बुला लिया, लेकिन उसकी आवाज इस दुनिया में आज भी जन्नत में होने का एहसास कराती है...