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The Vvaan Movie Review: जंगल का खौफ डराता नहीं, सिद्धार्थ की एक्टिंग जमती नहीं; कमजोर VFX ने बिगाड़ा पूरा खेल

Fri, 25 Sep 2026 01:51 PM IST
Kiran Vinod Kumar Jain किरण जैन
Updated Fri, 25 Sep 2026 01:51 PM IST
सार

The Vvaan Movie Review: सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया अभिनीत 'द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट' सिनेमाघरों में सज गई है। कैसी है फिल्म? यहां पढ़िए रिव्यू...

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The Vvaan movie review in hindi sidharth malhotra tamannaah bhatia shweta tiwari and ekta kapoor
'द वन- फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट' फिल्म रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
Movie Review
द वन- फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट
कलाकार
सिद्धार्थ मल्होत्रा , तमन्ना भाटिया , सुनील ग्रोवर , मनीष पॉल , श्वेता तिवारी , अनूप सोनी और सुलभा आर्या
लेखक
अरुणाभ कुमार, आनंदेश्वर द्विवेदी
निर्देशक
दीपक कुमार मिश्रा
निर्माता
एकता कपूर, शोभा कपूर, अरुणाभ कुमार
रिलीज डेट
25 सितंबर 2026
रेटिंग
2/5

विस्तार

जब कोई फिल्म माइथोलॉजी, लोककथा, सुपरहीरो एंगल, वीएफएक्स और छठ पूजा के सांस्कृतिक ताने-बाने को एक साथ समेटने की कोशिश करे, तो उसे संभालना आसान नहीं होता। 'द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट' के पास कहने और दिखाने के लिए बहुत कुछ है। अफसोस, फिल्म अंत तक यह तय नहीं कर पाती कि वह आखिर बनना क्या चाहती है। शुरुआत में लगता है कि एक दिलचस्प लोककथा धीरे-धीरे परत-दर-परत खुलेगी। आधे घंटे बाद लगता है कि अब कहानी पटरी पर आएगी। इंटरवल तक वह कई बार पटरी बदल चुकी होती है। अफसोस, अंत तक भी सही ट्रैक नहीं मिलता।

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The Vvaan movie review in hindi sidharth malhotra tamannaah bhatia shweta tiwari and ekta kapoor
'द वन- फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट' फिल्म रिव्यू - फोटो : अमर उजाला

कहानी
सिद्धार्थ मल्होत्रा फिल्म में ऋषि हैं। वह मुंबई में रहता है और छह साल से अपने गांव देवांचल नहीं गया। पत्नी ममता यानी तमन्ना भाटिया के साथ उसकी जिंदगी में बच्चे की कमी है। छह साल पहले हुए मिसकैरेज का दर्द दोनों के बीच अब भी मौजूद है।
छठ पूजा पर ममता गांव जाना चाहती है। ऋषि भी पुश्तैनी जमीन बेचने देवांचल पहुंचता है। इसी इलाके में देव वन है। यहां शाम के बाद जाना मना है। मान्यता है कि वन देवी जंगल की रक्षा करती हैं और राजा के वंशजों को इसकी जिम्मेदारी मिली थी।
ऋषि इन मान्यताओं को नहीं मानता। फिर एक बैल जंगल में चला जाता है। उसे बचाने के लिए ऋषि खुद देव वन में पहुंच जाता है। यहीं से फिल्म को अपनी असली पकड़ बनानी थी। लेकिन रहस्य सुलझने के बजाय उस पर नया रहस्य जुड़ता जाता है।
राजा का वंश, वन देवी, कवच, बुरी शक्ति, गांव की राजनीति और पुश्तैनी जमीन। कहानी हर मोड़ पर कुछ नया जोड़ती है। लेकिन किसी एक चीज को मजबूती से पकड़ नहीं पाती।

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The Vvaan movie review in hindi sidharth malhotra tamannaah bhatia shweta tiwari and ekta kapoor
'द वन- फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट' फिल्म रिव्यू - फोटो : अमर उजाला

अभिनय
सिद्धार्थ मल्होत्रा:
सिद्धार्थ का अभिनय फिल्म की बड़ी कमजोरियों में से एक है। ऋषि एक रेशनल इंसान है। वह देवी, जंगल और पुरानी मान्यताओं पर विश्वास नहीं करता। फिर उसके सामने ऐसी घटनाएं होती हैं, जो उसकी सोच बदलने लगती हैं।
इस बदलाव में अविश्वास, डर, कन्फ्यूजन और फिर विश्वास का असर दिखना चाहिए था। लेकिन सिद्धार्थ के एक्सप्रेशन कई सीन्स में एक ही जगह अटके रहते हैं।
उनकी डायलॉग डिलीवरी भी काफी सपाट है। कई सीन्स में ऐसा लगता है कि वह परिस्थिति को जीने के बजाय बस अपने हिस्से के संवाद रटे-रटाए अंदाज में पढ़ रहे हैं।
बिहार से लौटे किसी शख्स की बॉडी लैंग्वेज या अंदाज का वहां दूर-दूर तक अता-पता नहीं है। ऋषि को देखकर ऐसा लगता है जैसे वह कोई शहर का बाबू गांव घूमने आया हो। गांव की मिट्टी से जुड़ा कोई शख्स नहीं।
तमन्ना भाटिया: तमन्ना स्क्रीन पर बेहद खूबसूरत लगती हैं। खासकर उनका इंडियन लुक और छठ पूजा के दृश्य अच्छे लगते हैं। लेकिन अफसोस, उनके हिस्से में एक्टिंग करने के लिए कुछ था ही नहीं। वह बस हीरो के इर्द-गिर्द खड़ी नजर आती हैं।
सुनील ग्रोवर: विलेन दीपक के रूप में सुनील ने ईमानदारी से जोर लगाया है। नेगेटिव शेड में वह ठीक-ठाक लगे भी हैं। लेकिन उनकी पुरानी कॉमिक इमेज इतनी तगड़ी है कि उन्हें खून-खराबा करते या लात-घूसे चलाते देखना थोड़ा पचता नहीं है।
मनीष पॉल और सुलभा आर्या: फिल्म में कॉमेडी का ठेका मनीष पॉल और सुलभा आर्या को दिया गया है। यकीन मानिए, उनके बीच के जोक्स इतने जबरदस्ती और फूहड़ हैं कि थिएटर में हंसी आने की बजाय माथा पीटने का मन करता है। बच्चों वाले जोक्स भी इससे ज्यादा सेंसिबल होते हैं।

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'द वन- फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट' फिल्म रिव्यू - फोटो : अमर उजाला

कहां खटकती है फिल्म?
निर्देशन
‘पंचायत’ जैसे गांव-कस्बे की दुनिया को बारीकी से दिखाने वाले दीपक कुमार मिश्रा के पास गांव और लोककथा की दुनिया का अनुभव है। लेकिन यहां उनकी पकड़ नजर नहीं आती।
फिल्म का टोन बार-बार बदलता है। कभी लोककथा, कभी हॉरर, कभी फैंटेसी, कभी सुपरहीरो और फिर कॉमेडी। नतीजा यह कि फिल्म अपनी पहचान खो देती है।
‘देव वन’ को फिल्म का सबसे बड़ा डर बनना था। लेकिन वह कई जगह सिर्फ खूबसूरत लोकेशन लगता है। जंगल में जरूरी डर और बेचैनी गायब है।
क्लाइमैक्स में हवा में उड़ती फाइट और जरूरत से ज्यादा स्लो-मोशन भव्यता के बजाय अजीब लगते हैं।

The Vvaan movie review in hindi sidharth malhotra tamannaah bhatia shweta tiwari and ekta kapoor
'द वन- फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट' फिल्म रिव्यू - फोटो : अमर उजाला

स्क्रीनप्ले और राइटिंग
फिल्म में आइडिया बहुत हैं। लेकिन उन्हें जोड़ने वाला मजबूत स्क्रीनप्ले नहीं है। वन देवी, राजा का वंश, कवच, बुरी शक्तियां, छठ और गांव की राजनीति। सब कुछ है। लेकिन इनके बीच कनेक्शन कमजोर है। कई ट्विस्ट सस्पेंस बढ़ाने के बजाय खत्म कर देते हैं। जिस कवच के लिए विलेन पूरी जिंदगी लगा देता है, वह आखिरकार पिता के बिस्तर से आसानी से मिल जाता है। ऋषि का रेशनल इंसान से आस्था रखने वाला किरदार बनना भी अचानक लगता है। बदलाव बताया ज्यादा गया है, महसूस कम कराया गया है। जबरदस्ती की कॉमेडी कहानी की रफ्तार तोड़ती है। कमजोर VFX फैंटेसी दुनिया का असर और कम कर देते हैं।

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'द वन- फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट' फिल्म रिव्यू - फोटो : अमर उजाला

बिहार और छठ: सजावट ज्यादा, जड़ें कम
फिल्म की कहानी बिहार और उसकी लोक मान्यताओं से जुड़ी है। छठ पूजा भी इसका अहम हिस्सा है। इसलिए उम्मीद थी कि गांव, लोकविश्वास और संस्कृति फिल्म की जान बनेंगे।
लेकिन बिहार यहां कई जगह सिर्फ बैकड्रॉप बनकर रह जाता है। बिहार दिखता जरूर है, लेकिन उसकी मिट्टी और वहां का असली रंग महसूस नहीं होता।
छठ के सीन्स खूबसूरत हैं। मगर कहानी के भीतर उनकी मौजूदगी कई जगह स्वाभाविक कम और सजावटी ज्यादा लगती है।
 

देखें या छोड़ दें?
'द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट' इस बात का क्लासिक उदाहरण है कि केवल बड़े आइडिया और महत्वाकांक्षा से फिल्म नहीं बनती, उसके लिए कसी हुई राइटिंग और दमदार ट्रीटमेंट की जरूरत होती है। फिल्म में माइथोलॉजी, सुपरहीरो और सोशल ड्रामा के बहुत सारे इंग्रेडिएंट्स डाले गए हैं, लेकिन अंत में यह एक बेस्वाद कॉकटेल बनकर रह जाती है।
यदि आप तमन्ना भाटिया की स्क्रीन प्रेजेंस और छठ पूजा के भव्य दृश्यों को बड़े पर्दे पर देखना चाहते हैं, तो एक बार सोचा जा सकता है। अन्यथा, कमजोर स्क्रीनप्ले और थकाने वाले क्लाइमैक्स के चलते यह फिल्म आपकी परीक्षा ले सकती है।

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