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PVR INOX Row: प्रोड्यूसर्स और मल्टीप्लेक्स चेन के विवाद मामले पर CCI का आदेश, छोटे निर्माताओं को मिलेगी राहत?
Thu, 02 Oct 2025 12:09 AM IST
हिमांशु सोनी
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
Published by: हिमांशु सोनी
Updated Thu, 02 Oct 2025 12:09 AM IST
सार
CCI probe On PVR INOX Row: मल्टीप्लेक्स कंपनी PVR INOX के खिलाफ दर्ज की गई शिकायत पर सीसीआई ने जांच के आदेश दिए हैं, जिसके बाद कंपनी को बड़ा नुकसान झेलना पड़ सकता है।
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पीवीआर INOX
- फोटो : एक्स
विस्तार
भारतीय फिल्म इंडस्ट्री और मल्टीप्लेक्स चेन के बीच लंबे समय से चल रहा विवाद अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। भारतीय प्रतिस्पर्द्धा आयोगने देश की सबसे बड़ी मल्टीप्लेक्स कंपनी PVR INOX के खिलाफ जांच के आदेश दिए हैं। मामला वर्चुअल प्रिंट फीस (VPF) से जुड़ा है, जिसे लेकर निर्माताओं का आरोप है कि कंपनी अपनी दबदबे की स्थिति का गलत फायदा उठा रही है।
क्या है वीपीएफ विवाद?
डिजिटल सिनेमा के शुरुआती दौर में एनालॉग से डिजिटल प्रोजेक्शन पर जाने के लिए मल्टीप्लेक्स चेन ने निर्माताओं से एक अतिरिक्त शुल्क लेना शुरू किया था, जिसे वर्चुअल प्रिंट फीस कहा गया। इस शुल्क का मकसद नई तकनीक के उपकरणों की खरीद और इंस्टॉलेशन की लागत निकालना था। लेकिन अब जब देशभर के सिनेमा हॉल पूरी तरह डिजिटल हो चुके हैं, तब भी यह फीस वसूली जा रही है।फिल्म और टेलीविजन प्रोड्यूसर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने सीसीआई के पास शिकायत दर्ज कराई थी कि PVR INOX इस फीस को बंद नहीं कर रहा है, जिससे छोटे निर्माताओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
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सीसीआई ने क्या कहा?
सीसीआई ने 33 पन्नों के अपने आदेश में कहा कि पहली नजर में ऐसा लगता है कि कंपनी ने प्रतिस्पर्धा कानून की धारा 4 का उल्लंघन किया है, जो किसी भी कंपनी को अपनी प्रमुख स्थिति का दुरुपयोग करने से रोकता है। आयोग ने माना कि PVR INOX देशभर के लगभग 30% मल्टीप्लेक्स स्क्रीन और बॉक्स ऑफिस राजस्व पर नियंत्रण रखता है, जिससे वह बाजार में एक दबदबे की स्थिति में है।सीसीआई ने यह भी नोट किया कि कुछ बड़े हॉलीवुड स्टूडियोज को इस फीस से छूट दी जाती है, जबकि भारतीय स्वतंत्र और छोटे फिल्म निर्माताओं को अब भी इसे चुकाना पड़ता है। यह रवैया आयोग के अनुसार भेदभावपूर्ण प्रतीत होता है।
PVR INOX का पक्ष
कंपनी ने अपने बचाव में कहा कि डिजिटल प्रोजेक्शन उपकरण की लागत बहुत ज्यादा होती है और इन्हें हर 8-10 साल में बदलना पड़ता है। यदि यह शुल्क बंद किया गया तो टिकट के दाम और बढ़ जाएंगे, जिसका सीधा असर दर्शकों पर पड़ेगा।
90 दिन में जांच पूरी करने के आदेश
सीसीआई ने अपने आदेश में कहा कि यह जांच केवल प्राथमिक अवलोकन है, अंतिम निष्कर्ष नहीं। आयोग के महानिदेशक (DG) को निर्देश दिया गया है कि वो 90 दिनों के भीतर जांच पूरी करें और यह भी देखें कि कंपनी के अधिकारियों की इसमें क्या भूमिका रही।
छोटे निर्माताओं की उम्मीद
निर्माताओं का मानना है कि अगर यह शुल्क खत्म होता है तो छोटे बजट की फिल्मों को राहत मिलेगी और उन्हें बड़ी फिल्मों के मुकाबले बेहतर प्रतिस्पर्धा का मौका मिलेगा। इंडस्ट्री में लंबे समय से यह बहस चल रही है कि डिजिटल युग में भी यह शुल्क केवल कमाई का एक और जरिया बनकर रह गया है।
अब आगे क्या?
अब सबकी नजर सीसीआई की जांच पर है। यदि आयोग यह मानता है कि कंपनी ने अपनी प्रमुख स्थिति का दुरुपयोग किया है, तो PVR INOX पर भारी जुर्माना लग सकता है और वर्चुअल प्रिंट फीस पूरी तरह खत्म भी हो सकती है। यह फैसला आने वाले समय में भारतीय फिल्म उद्योग और दर्शकों, दोनों के लिए अहम साबित हो सकता है।
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क्या है वीपीएफ विवाद?
डिजिटल सिनेमा के शुरुआती दौर में एनालॉग से डिजिटल प्रोजेक्शन पर जाने के लिए मल्टीप्लेक्स चेन ने निर्माताओं से एक अतिरिक्त शुल्क लेना शुरू किया था, जिसे वर्चुअल प्रिंट फीस कहा गया। इस शुल्क का मकसद नई तकनीक के उपकरणों की खरीद और इंस्टॉलेशन की लागत निकालना था। लेकिन अब जब देशभर के सिनेमा हॉल पूरी तरह डिजिटल हो चुके हैं, तब भी यह फीस वसूली जा रही है।फिल्म और टेलीविजन प्रोड्यूसर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने सीसीआई के पास शिकायत दर्ज कराई थी कि PVR INOX इस फीस को बंद नहीं कर रहा है, जिससे छोटे निर्माताओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
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सीसीआई ने क्या कहा?
सीसीआई ने 33 पन्नों के अपने आदेश में कहा कि पहली नजर में ऐसा लगता है कि कंपनी ने प्रतिस्पर्धा कानून की धारा 4 का उल्लंघन किया है, जो किसी भी कंपनी को अपनी प्रमुख स्थिति का दुरुपयोग करने से रोकता है। आयोग ने माना कि PVR INOX देशभर के लगभग 30% मल्टीप्लेक्स स्क्रीन और बॉक्स ऑफिस राजस्व पर नियंत्रण रखता है, जिससे वह बाजार में एक दबदबे की स्थिति में है।सीसीआई ने यह भी नोट किया कि कुछ बड़े हॉलीवुड स्टूडियोज को इस फीस से छूट दी जाती है, जबकि भारतीय स्वतंत्र और छोटे फिल्म निर्माताओं को अब भी इसे चुकाना पड़ता है। यह रवैया आयोग के अनुसार भेदभावपूर्ण प्रतीत होता है।
PVR INOX का पक्ष
कंपनी ने अपने बचाव में कहा कि डिजिटल प्रोजेक्शन उपकरण की लागत बहुत ज्यादा होती है और इन्हें हर 8-10 साल में बदलना पड़ता है। यदि यह शुल्क बंद किया गया तो टिकट के दाम और बढ़ जाएंगे, जिसका सीधा असर दर्शकों पर पड़ेगा।
90 दिन में जांच पूरी करने के आदेश
सीसीआई ने अपने आदेश में कहा कि यह जांच केवल प्राथमिक अवलोकन है, अंतिम निष्कर्ष नहीं। आयोग के महानिदेशक (DG) को निर्देश दिया गया है कि वो 90 दिनों के भीतर जांच पूरी करें और यह भी देखें कि कंपनी के अधिकारियों की इसमें क्या भूमिका रही।
छोटे निर्माताओं की उम्मीद
निर्माताओं का मानना है कि अगर यह शुल्क खत्म होता है तो छोटे बजट की फिल्मों को राहत मिलेगी और उन्हें बड़ी फिल्मों के मुकाबले बेहतर प्रतिस्पर्धा का मौका मिलेगा। इंडस्ट्री में लंबे समय से यह बहस चल रही है कि डिजिटल युग में भी यह शुल्क केवल कमाई का एक और जरिया बनकर रह गया है।
अब आगे क्या?
अब सबकी नजर सीसीआई की जांच पर है। यदि आयोग यह मानता है कि कंपनी ने अपनी प्रमुख स्थिति का दुरुपयोग किया है, तो PVR INOX पर भारी जुर्माना लग सकता है और वर्चुअल प्रिंट फीस पूरी तरह खत्म भी हो सकती है। यह फैसला आने वाले समय में भारतीय फिल्म उद्योग और दर्शकों, दोनों के लिए अहम साबित हो सकता है।