Potluck Season 2 Review: किताबी लिखावट सी सोनी लिव की सिट कॉम सी सीरीज, सारे एपिसोड देखना अपने आप में चुनौती
आमतौर पर मिडिल क्लास के लोग जिस काम में शर्माते हैं या फिर यह कह लीजिए कि सामाजिक नजरिए से गलत समझते है, वही अपर क्लास के लोगों के शौक हैं। बाप बेटा एक साथ बैठकर बीयर पी सकते हैं। बेटी की डेट एनिवर्सरी कब है यह बात पिता को अच्छी तरह से पता है। रिश्तों को समझने का ये भी एक अलग तरीका और नजरिया है। 'पॉटलक सीजन 2' का ताना बाना इसी के इर्द गिर्द घूमता हैं। वैसे सीरीज को देखने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि पॉटलक का मतलब क्या होता है? दरअसल, पॉटलक एक अंग्रेजी शब्द है जिसकी एक कहावत है 'द फेमिली हू ईट्स टुगेदर, स्टेज टुगेदर', मतलब अपनी अपनी रसोई मे खाना पकाना और फिर सबका एक जगह इकट्ठा होकर खाना खाना। इस सीरीज में भी परिवार के सभी सदस्य हफ्ते में एक दिन खाने पर मिलते हैं और एक दूसरे से अपने सुख दुख की चर्चा करते हैं।
'पॉटलक सीजन वन' 10 सितंबर 2021 को सोनी लिव पर स्ट्रीम हुआ था। अब इसका दूसरा सीजन सोनी लिव पर स्ट्रीम हो रहा है। कहानी वही शास्त्री परिवार की है। पहले सीजन में शास्त्री परिवार के मुखिया गोविंद शास्त्री ने अपने परिवार के सभी सदस्यों को हफ्ते में एक दिन घर पर इकट्ठा होकर खाने पर आने के लिए मना लिया था, तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि घर सभी सदस्य हफ्ते में एक दिन खाने पर मिलेंगे। बड़े शहरों में पूरे परिवार के लोगों का एक छत के नीचे रहना अब संभव नहीं रहा, इसलिए परिवार के लोग अलग अलग रहते हैं। यही हाल शास्त्री परिवार का भी है, दोनों बेटों की शादी हो चुकी है। वे अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अलग रहते हैं। बेटी प्रेरणा अपने मां बाप के ही रहती है। पिछले सीजन में प्रेरणा कोलकाता में नौकरी कर रही थी और लगातार अलग अलग लड़कों से रिश्ते बनाने की कोशश कर रही थी। इस सीजन में फाइनली उसे एक लड़का मिल गया है जिसे वह डेट कर रही है। इस बात की जानकारी उसके पिता को है।
इस सीजन में अधिकतर बातें घिसी पिटी सी भी हैं। परिवार का बड़ा बेटा विक्रांत शास्त्री घर से ही काम करता है। उसकी पत्नी आकांक्षा ऑफिस में जॉब करती है लेकिन लोगों से घुल मिल नहीं पाती तो उसका पति सलाह लेता है कि तुम्हारे पास पैसा है, दोस्त खरीद लो! छोटे बेटे की नौकरी जा चुकी है। उसका दोबारा नौकरी करने का मन नहीं। पिता की सलाह मिलती है कि नौकरी कर या फिर बिजनेस कर लेकिन डर मत। डरने से अच्छा है, कर के फेल हो जाए।
'पॉटलक' एक तरह से सिटकॉम जैसा ही है। बस इसमें लाइव आडियंस नहीं है। कहानी ऐसी है कि पहले सीजन में ही बोर हो चुके लोग इसका दूसरा सीजन क्यों देखें, पता नहीं है। बस सिटकॉम की ही तरह परिवार के हर सदस्य की अपनी एक अलग कहानी और कुछ समस्याएं भी हैं। मजा ऐसी कहानियों में तब आता है जब ये सहज हास्य से भरपूर हों लेकिन वह भी यहां नहीं है। निर्देशक राजश्री ओझा का शायद ध्यान ही इस तरफ नहीं रहा। राजश्री ने सीरीज के पहले सीजन में जो थोड़ी बहुत कसावट बनाए रखी थी, वह भी इस सीजन से लापता है। अश्विन लक्ष्मी नारायण, गौरव लुल्ला की लेखनी यहां वहां खूब घूमती है लेकिन असल मुद्दे की तरफ दर्शकों को खींचे रहने में नाकाम रहती है। अभिनय भी किसी का ऐसा नायाब नहीं है कि उसके बारे में अलग से कुछ लिखा जाए।
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