Phir Aayi Hasseen Dillruba Review: जयप्रद को मिला सस्पेंस का मारक मंत्र, विक्रांत मैसी के तिलिस्म का असली असर
अभी बीते हफ्ते जब गीतकार इरशाद कामिल से बात हो रही थी, तो उन्होंने अपने जीवन का फलसफा समझाते हुए अपने एक गीत का उदाहरण दिया और कहा, ‘मन के मत पर मत चलियो ये जीते जी मरवा देगा..!’ इसी एक लाइन में फिल्म ‘हसीन दिलरुबा’ और उसकी सीक्वल ‘फिर आई हसीन दिलरुबा’ के गुणसूत्र छिपे हैं। इरशाद कामिल महंगे गीतकार है लिहाजा हर फिल्म निर्माता के बजट में भी नहीं हैं लेकिन निर्माता जब टी सीरीज जैसी नंबर वन म्यूजिक कंपनी के मालिक हों और साथ आनंद एल राय जैसे जौहरी का हो तो ऐसी फिल्म में एक गाना तो ऐसा बनता है जो दर्शकों के जहन में गूंजता रहे, हर बार, बार बार, लगातार। नया, सुरों पर मचलता और एकदम वैसा ही जैसा कि आनंद बक्षी का लिखा कालजयी गाना है, ‘एक हसीना थी..एक दीवाना था..!’
कनिका ढिल्लों की हसीन कहानी
फिल्म ‘फिर आई हसीन दिलरुबा’ में भी हसीना एक ही है। अब उसे उसका पति ही बदलचन कहकर बुलाने लगा है। पिछली फिल्म में हसीना का दिल जिस नौजवां पर आया था, उसकी तलाश अब भी जारी है। और, इस बीच एक और शोहदा इस हसीना पर फिदा हो चुका है। कनिका ढिल्लों की कहानी कुछ कुछ वैसी ही लाइन पर इस बार भी है कि वो स्त्री है, कुछ भी कर सकती है। लेकिन, इस बार इस हसीना को वाकई एक दिलरुबा बनाने की कनिका ने ठानी है। किरदार को काले से स्याह की तरफ धकेला है। विक्रांत मैसी को फिल्म ‘12वीं फेल’ में मिली हालिया सफलता के बाद दर्शकों की सहानुभूति उनके किरदार को पसंघा भर ज्यादा मिलने वाली है। लेकिन, कहानी का क्या है कि ये चलती रहती है, हिचकोले खाते। अपने जाने पहचाने रास्तों से और फिर कहानी में आ जाता है मगरमच्छ..! वाक़ई! और, इस बार मगरमच्छ रमेश सिप्पी की फिल्म ‘शान’ और राकेश रोशन की फिल्म ‘खून भरी मांग’ के अरसे बाद एक्शन में भी दिखता है।
जयप्रद के निर्देशन का करिश्मा
कनिका ढिल्लों पिछली बार फिल्म ‘हसीन दिलरुबा’ मे जहां जहां चूकी थीं, इस बार उन सारी जगहों पर उन्होंने नए निर्देशक जयप्रद देसाई के साथ मिलकर ताजमहल लगा दिया है। कहानी की समस्या कम हुई तो जयप्रद का ध्यान कहानी के किरदारों को गढ़ने के साथ साथ पिछली बार की दिक्कतों पर भी गया है। कनिका ढिल्लों फिल्म की सह निर्माता भी हैं तो यूपी की इस ‘क्राइम पेट्रोल’ जैसी कहानी में नए किरदार भी उन्होंने जयप्रद के साथ मिलकर अच्छे गढ़े हैं। बस पुलिसिया कार्यप्रणाली के इसमें थोड़ा और विस्तार पाने की गुंजाइश अभी इसमें बाकी है। मोंटू चाचा बनकर घूम रहे जिमी शेरगिल का किरदार जयप्रद ने अच्छा फिल्माया है। समां बांधने के लिए इस बार वह हर्षवर्धन राणे की जगह सनी कौशल को लाए हैं। कंपाउंडर के इस किरदार का विकास अच्छा है। लेकिन, सिंगल स्क्रीन थियेटर की सारी टिकटें अपनी गर्लफ्रेंड के लिए खरीद लेने वाला कंपाउंडर इतना पैसा कमाता कहां से है, ये और दिखाया जाता तो असर दूना हो सकता था।
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अपने ही बनाए खांचे में अटकी रहीं तापसी
खैर, कहानी के गठन की इन कमियों के बावजूद जयप्रद ने इस बार फिल्म को आखिर तक ओम प्रकाश शर्मा के किसी नॉवेल की तरह सस्पेंस में बांधे रखा है। कुल जमा तीन ठो क्लाइमेक्स हैं फिल्म में, और हर बार इसमें कोई नया पेंच निकलता है। किरदार मरने का नाम नहीं लेते और कलाकार हैं कि हर नए सीन में अपनी कुछ नई प्रतिभा दिखाने को बेकरार दिखते हैं। फिल्म का नाम जैसा है, वैसा ही काम इसकी हीरोइन तापसी पन्नू का है। शाहरुख खान की फिल्म ‘डंकी’ ने उनकी पिछली सारी फ्लॉप फिल्में भुला दी हैं। लेकिन, बड़े परदे पर उनका अपना तिलिस्म कितना बाकी है, इसका फैसला होने में अभी समय लगेगा। अभिनय उनका यहां भी बहुत एकांगी है। उनकी फिल्में लगातार देखते आ रहे दर्शक उनकी एक जैसी भाव भंगिमाएं, एक जैसा ‘एटीट्यूड’ और एक जैसी ही प्रतिक्रियाएं भी पहचानने लगे हैं।
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फिर भाईं भूमिका दुबे, फिर आलोक पर टिकी नजर
फिल्म ‘फिर आई हसीन दिलरुबा’ इसके पुरुष कलाकारों की वजह से देखी जाने लायक है। भले इस बार आदित्य श्रीवास्तव के किरदार की लंबाई पर कैंची चल गई हो लेकिन उनके फिल्म में पहली बार ही दिखते ही कहानी की नई करवट रोचक लगने लगती है। बाद में उनका फोकस जिमी शेरगिल छीन लेते हैं और हर अहम बात से पहले गैस की गोली खाने वाले मोंटू चाचा का अपने पर्स में अपने भतीजे (हर्षवर्धन राणे) की फोटो लेकर घूमना भी कहानी का ताप बढ़ाता रहता है। फिल्म के दूसरे सहायक कलाकारों में भूमिका दुबे ने बेहद शानदार काम किया है और उनकी अभिनय प्रतिभा ‘बारह बाई बारह’ के बाद एक बार फिर बड़े परदे पर खिलकर निखरी है। वेब सीरीज ‘बंबई मेरी जान’ में रहीम के किरदार में शानदार एक्टिंग करने वाले आलोक पांडे पर भी दर्शकों की नजर रुकती है, लेकिन ऐसे कद्दावर अभिनेता के किरदार की गहराई बेहतर हो सकती थी।
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विक्रांत मैसी के आने वाले कल की दस्तक
और, अब बारी फिल्म के दो मुख्य नायकों की। पहले बात विक्रांत मैसी की। पिछली फिल्म ‘हसीन दिलरुबा’ में अपने प्यार के लिए अपना हाथ काटकर फेंक देने वाले रिशु के उनके किरदार को इस बार दुतरफा धार वाली तलवार की तरह आगे बढ़ाया गया है। अपने नकली हाथ से रानी का हाथ छूकर वह क्या दिखाना चाहता है ये तो वह ही जाने लेकिन वह भीतर से सख्त है, इसका मुजाहिरा करने के लिए भूमिका दुबे के साथ गढ़े गए दृश्य इस किरदार को मजबूती देते हैं। विक्रांत मैसी का अभिनय फिल्म दर फिल्म निखरने लगा है और वह अपने किरदार की पृष्ठभूमि व उसकी मनोदशा को परदे पर बेहतर तरीके से उतार भी रहे हैं। नेशनल फिल्म अवार्ड वाली पीआर स्टोरीज में न पड़कर अगर अपने हुनर पर वह यूं ही काम करते रहे, तो आने वाले कल में उनका पदक पक्का है।
सनी ने भी आखिर दिखा ही दिया कौशल
फिल्म ‘हसीन दिलरुबा’ में जो काम हर्षवर्धन राणे करने से चूक गए थे, उसे अंजाम तक पहुंचाते दिखे फिल्म ‘फिर आई हसीन दिलरुबा’ में सनी कौशल। शुरुआती दृश्यों में तो लगता है कि एक छोटे कस्बे के कंपाउंडर के किरदार में उनकी कास्टिंग शायद ठीक नहीं है लेकिन फिल्म के आगे खिसकने के साथ साथ उनके अभिनय का रंग गाढ़ा होता जाता है। रंग रंगीली, बैकलेस चोली वाली ‘विधवा’ पर फिदा ये आशिक उसके संग ब्याह भी रचा लेता है और ये जानते हुए भी उसे मोहब्बत करता रहता है कि उसकी दिलरुबा किसी और पर फिदा है। इस किरदार की स्थितिज ऊर्जा कमाल की है। हो सकता है कि फिल्म की अगली कड़ी में इसकी गतिज ऊर्जा का असर कनिका ढिल्लों थोड़ा कायदे से फिल्म में बुन पाएं। फिल्म कुल मिलाकर अच्छी बन पड़ी है और इसकी कहानी ही इसकी असल हीरो है।