Othello Hindi Review: पंचायत के ‘भूषण शर्मा’ का ओथेलो अवतार, प्राची पटवारी और हिमांशु राज को खूब मिली तालियां
मुंबई के नाट्य सभागारों की सप्ताहांत की शामें खूब खचाखच भरी होती हैं। नाटक देखने की इस शहर के तमाम परिवारों की परंपरा रही है। गुजराती और मराठी नाटकों में तो लोग समूहों में आते हैं। हिंदी नाटकों की भी इस शहर में अपनी अलग ही प्रतिष्ठा है। नाटक अनुशासन का काम है। महीनों के अभ्यास के बाद जब कोई नाटक मंडली पहली बार रंगमंच पर अपनी मेहनत का नतीजा जानने उतरती है तो रंगमंच के सामने और रंगमंच के पीछे तनाव एक सा होता ही है। शेक्सपियर ने यूं तो सुखांत, दुखांत, हास्य रस से भरपूर तमाम नाटक लिखे हैं लेकिन इनमें से बीते चार सौ साल से भी ज्यादा समय से उनके जो नाटक कलाकारों की तमाम पीढ़ियों के पसंदीदा रहे हैं, उनमें ‘ओथेलो’ का नाम सबसे ऊपर आता है।
अभिनय या अंग्रेजी साहित्य से जिनका जरा सा भी नाता रहा है, वे सब ‘ओथेलो’ की कहानी जानते हैं। ओथेलो यानी वेनिस का वह मिलिट्री कमांडर जिसे साइप्रस की धरती पर तुर्कों के संभावित हमलने को विफल करने भेजा जाता है। नाटक उसकी शादी की खबर जानकर व्यथित रॉड्रिगो की शिकायत से शुरू होता है। रॉड्रिगो भी डेस्डेमोना से प्रेम करता है, लेकिन डेस्डेमोना ने शादी कर ली ओथेलो से। रॉड्रिगो ये शिकायत उस इयागो से कर रहा है जो ओथेलो का सबसे खास सिपहसालार है। ओथेलो का एक और खास सिपहसालार है कैसियो, जिसकी तरक्की से इयागो खुश नहीं है। इयागो को ये भी शक रहा है कि ओथेलो उसकी पत्नी एमीलिया के साथ हमबिस्तर हो चुका है। इमीलिया का काम है डेस्डेमोना की सेवा में हर पल तैनात रहना। इयागो को अब बदला लेना है। वह सारे किरदारों को अपने ताने बाने में फंसाता चलता है। चाल दर चाल वह ओथेलो के दिमाग में खुराफात भरता जा रहा है। और, ओथेलो उसकी बातों में फंसता भी जाता है। नाटक जिन्होंने पढ़ या देख रखा है, उन्हें इसका उपसंहार पता है लेकिन अनगिनत बार हो चुके इस नाटक के मंचन का असली आनंद है, इसके कलाकारों के अभिनय पर पूरे समय नजर टिकी रहना। और, यही इसके लेखन की जीत है।
‘पंचायत’ वेब सीरीज में भूषण का किरदार करके मशहूर हुए अभिनेता दुर्गेश कुमार की द पुअर थियेटर कंपनी ने एक और नाट्य समूह वेदा फैक्ट्री के साथ मिलकर ‘ओथेलो’ के इस नए हिंदी अनुकूलन का निर्माण किया है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के ही अभय जोशी और तौकीर आलम खान ने इसका हिंदी अनुकूलन किया है। तौकीर इस नाटक के निर्देशक भी हैं। दुर्गेश की पुअर थियेटर कंपनी की परिकल्पना से ये नाटक मेल तो नहीं खाता लेकिन उनका अभिनय के साथ साथ निर्माण में भी कदम रखना, उनकी मुंबई शहर में हो रही निरंतर प्रगति के स्तर का मापक बन चुका है। नाटक में एक सीमित क्षेत्र के भीतर कल्पनाओं की विस्तारित छवियां यूं पेश करना कि दर्शक को रंगमंच की बजाय वह विस्तारित भौगोलिक परिदृश्य ही नजर आने लगे, उसके लिए किसी भी नाटक की डिजाइनिंग सबसे अहम होती है। तौकीर ने ही इस नाटक को डिजाइन और निर्देशित भी किया है और इस विभाग में उन्हें सौ में सौ नंबर मिलने ही चाहिए।
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‘ओथेलो’ के मंचन में तौकीर आलम खान और दुर्गेश कुमार अलग अलग शो में ओथेलो बनते हैं। मैंने जो शो देखा उसमें ओथेलो का किरदार दुर्गेश ने निभाया। वह इस शाम के सितारे भी थे और उनका नाटक देखने का दर्शकों में उत्साह ऐसा दिखा कि वेदा कुनबा थियेटर समय से पहले ही हाउसफुल हो चुका था। अभिनय में संवाद अदायगी से पहले की जो कलाएं एक कलाकार दिखाता है, वह हैं संवादों का भाव समझना और उनके अनुसार अपना शारीरिक संचलन करना। नाटक में किसी भी कलाकार की मुख मुद्राओं और भाव प्रकटने के लिए शारीरिक चक्रों की ऊर्जा से एक आकर्षण दर्शकों के मन में पैदा करना अहम होता है। दुर्गेश कुमार इस नाटक के शीर्षक किरदार में यही सब करने का जो प्रयास करते हैं, वह रंगमंच के किसी भी विद्यार्थी के लिए एक दर्शनीय कार्यशाला बन जाता है। नाटकों का अभ्यास शायद कम होते जाने से उनके रंगमंच पर प्रवेश और निकास की लय ताल एक दो बार टूटती है और कहीं कहीं वह संवादों में भी जूझते दिखते हैं, लेकिन समग्र रूप से दुर्गेश कुमार ने ओथेलो के रंग रूप का न सिर्फ आकार लिया, बल्कि इस पात्र की संरचना में ढलने में भी वह सफल रहे।
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इस नाट्य मंचन की शाम में जो दो कम नामचीन कलाकारों ने दर्शकों का ध्यान सबसे ज्यादा खींचा वह रहे इयागो के किरदार में हिमांशु राज तलरेजा और उनकी पत्नी एमीलिया के किरदार में प्राची पटवारी। करीब 90 मिनट के बिना मध्यातंर हुए इस नाटक में दोनों की प्रस्तुतियों में कहीं कोई दोष नजर नहीं आया। इन दोनों का अभिनय, संवाद अदायगी, भाव प्रकटन और शारीरिक संचलन इतने अभ्यस्त कलाकार जैसा दिखा, जैसे कि वह इन दोनों किरदारों का अभिनय नहीं बल्कि इन्हें जी रहे हों। काबिल कलाकारो की खोज में कास्टिंग डायरेक्टर्स पर आश्रित रहने वाले हिंदी सिनेमा के निर्माता निर्देशकों की नजर कभी किसी मंचन में इन दोनों पर पड़ी, तो कैमरे के सामने खिंचे आसमान पर इन दोनों का इंद्रधनुष निकलना पक्का है। डेस्डेमोना बनी मानसी सहगल भी नाटक में अपना किरदार बखूबी निभाती हैं। वैशाली, राजन शर्मा और स्पंदन मोदी ने सहायक कलाकारों के रूप में अच्छा अभिनय किया है। कुमार सौरभ को रॉड्रिगो के किरदार में देखना चौंकाने वाली अनुभूति रही। वह अपना किरदार बखूबी निभाते भी हैं, लेकिन नाटक के गठन के अनुसार इस किरदार की जो देहभाषा और शरीर सौष्ठव होना चाहिए, उसकी कमी यहां खलती है।
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परदे के पीछे के जिन हुनरमंदों की मेहनत इस नाटक को सफल बनाने में नजर आती है, उसमें सबसे पहला नाम इसके प्रोडक्शन डिजाइनर उज्ज्वल कुमार का है। कम से कम प्रॉप्स में एक उम्दा प्रभाव उनकी कल्पना ने इस नाटक में जोड़ा है। स्नेहा कुमार ने किरदारों की वेशभूषा बिना ग्लैमर का तड़का लगाए नाटक के कालखंड के अनुसार रखने में प्रशंसनीय काम किया। विनार रणदिवे का संगीत नाटक के कथ्य के अनुरूप ही आरोह-अवरोह पाता रहता है। लेकिन, इस संगीत की लय ताल के हिसाब से नाटक का प्रकाश संयोजन उतना रोचक नहीं रहा जितना ऐसे नाटकों में कलाकारों की मनोदशा दिखाने के लिए होना चाहिए। नाटकों के मंचन शो दर शो निखरते हैं और इस नाटक से भी ये उम्मीद बंधती है।
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