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Film Review: ‘प्री-मैच्योर’ बेबी है 'नाम शबाना'
रवि बुले
Updated Fri, 31 Mar 2017 02:05 PM IST
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'नाम शबाना' का पोस्टर
निर्माताः नीरज पांडे
निर्देशकः शिवम नायर
सितारेः तापसी पन्नू, मनोज बाजपेयी, पृथ्वीराज सुकुमारन, अक्षय कुमार
रेटिंग *1/2
2015 में आई अक्षय कुमार स्टारर ऐक्शन-थ्रिलर बेबी (निर्देशकः नीरज पांडे) बॉक्स ऑफिस पर ब्रांड जैसी स्थापित हुई। परिणाम यह कि अब उसकी एक किरदार शबाना (तापसी पन्नू)
के जीवन को विस्तार से बड़े पर्दे पर उतारा गया है। कहानी के इस अंदाज को अंग्रेजी में स्पिन-ऑफ कहते हैं। यानी पहले से तैयार उत्पाद से एक अन्य नया उत्पाद बना लेना! ताकि पुराने ब्रांड को दुहा जाए। परंतु नाम शबाना शुरुआती मिनटों में बता देती है कि उसमें दुधारू जैसा कुछ नहीं है।
निर्माता-लेखक नीरज पांडे ने देशभक्ति का पासा फेंका है। तीनों सेनाओं तथा सरकारी रक्षा एजेंसियों से इतर गुप्त एजेंसी दिखाई है, जो देश के दुश्मनों को खत्म करती है। इसी में शबाना को भर्ती किया जाता है क्योंकि वह ताइक्वांडो जैसे खेल की धाकड़ खिलाड़ी है। उसने मां को पीटने वाले पिता के सिर पर ऐसी चोट मारी थी कि उनकी मौत हो गई थी। दो साल उसने सुधार गृह में गुजारे। अब वह सख्तजान है। अपने क्लासमेट का प्यार उसे नहीं छूता। प्रेमी फकत ड्राइवर बना रहता है और अंततः कुछ नालायक-बिगड़ैलों के हाथों मारा जाता है।
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शबाना को उसका बदला लेना है। गुप्त एजेंसी उसकी मदद करती है और फिर शबाना को एक मिशन के लिए कुआलालंपुर भेजती है। जिसमें वह अवैध हथियारों के तस्कर टोनी (पृथ्वीराज सुकुमारन) को मार गिराती है।
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निर्देशकः शिवम नायर
सितारेः तापसी पन्नू, मनोज बाजपेयी, पृथ्वीराज सुकुमारन, अक्षय कुमार
रेटिंग *1/2
2015 में आई अक्षय कुमार स्टारर ऐक्शन-थ्रिलर बेबी (निर्देशकः नीरज पांडे) बॉक्स ऑफिस पर ब्रांड जैसी स्थापित हुई। परिणाम यह कि अब उसकी एक किरदार शबाना (तापसी पन्नू)
के जीवन को विस्तार से बड़े पर्दे पर उतारा गया है। कहानी के इस अंदाज को अंग्रेजी में स्पिन-ऑफ कहते हैं। यानी पहले से तैयार उत्पाद से एक अन्य नया उत्पाद बना लेना! ताकि पुराने ब्रांड को दुहा जाए। परंतु नाम शबाना शुरुआती मिनटों में बता देती है कि उसमें दुधारू जैसा कुछ नहीं है।
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निर्माता-लेखक नीरज पांडे ने देशभक्ति का पासा फेंका है। तीनों सेनाओं तथा सरकारी रक्षा एजेंसियों से इतर गुप्त एजेंसी दिखाई है, जो देश के दुश्मनों को खत्म करती है। इसी में शबाना को भर्ती किया जाता है क्योंकि वह ताइक्वांडो जैसे खेल की धाकड़ खिलाड़ी है। उसने मां को पीटने वाले पिता के सिर पर ऐसी चोट मारी थी कि उनकी मौत हो गई थी। दो साल उसने सुधार गृह में गुजारे। अब वह सख्तजान है। अपने क्लासमेट का प्यार उसे नहीं छूता। प्रेमी फकत ड्राइवर बना रहता है और अंततः कुछ नालायक-बिगड़ैलों के हाथों मारा जाता है।
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शबाना को उसका बदला लेना है। गुप्त एजेंसी उसकी मदद करती है और फिर शबाना को एक मिशन के लिए कुआलालंपुर भेजती है। जिसमें वह अवैध हथियारों के तस्कर टोनी (पृथ्वीराज सुकुमारन) को मार गिराती है।
कच्ची कहानी है 'नाम शबाना' की
'नाम शबाना' का पोस्टर
नाम शबाना ‘प्री-मैच्योर’ बेबी है। कहानी कच्ची है। सीन कृत्रिम हैं। जिन्हें लिखने में सामान्य बुद्धि लगाई गई, इसमें संदेह है। तापसी दो घंटे 28 मिनट तक सख्त चेहरे और तने शरीर में असामान्य दिखती हैं। उनका फिगर फिट और फेस बीमार नजर आता है। उनके कुछ ऐक्शन सीन बेहतर हैं, जिनका कहानी से तालमेल नहीं बैठता। ये सीन ऐक्शन वीडियो जैसे मशीनी लगते हैं।
फोन पर शबाना को बार-बार निर्देश देते मनोज बाजपेयी के लिए यह रोल करना कौन सी मजबूरी थी, उन्हें देख कर यही खयाल आता है। शबाना जांबाज है परंतु दो बार उसे मुश्किल हालत से निकालने के लिए अक्षय कुमार प्रकट होते हैं और काम खत्म करके फटाफट गायब हो जाते हैं।
फोन पर शबाना को बार-बार निर्देश देते मनोज बाजपेयी के लिए यह रोल करना कौन सी मजबूरी थी, उन्हें देख कर यही खयाल आता है। शबाना जांबाज है परंतु दो बार उसे मुश्किल हालत से निकालने के लिए अक्षय कुमार प्रकट होते हैं और काम खत्म करके फटाफट गायब हो जाते हैं।
'नाम शबाना' के एक सीन में अक्षय कुमार और तापसी पन्नू
- फोटो : SELF
लेखक-निर्देशक अक्षय की एंट्री के साथ शबाना को अचानक निरीह-असहाय बना देते हैं। इससे हीरो की हीरोगिरी को टेका लग जाता है।
अनुपम खेर और डैनी चुनिंदा दृश्यों में आते-जाते हैं। तस्कर टोनी का किस्सा बीच में आता है और बेहद लंबा खिंचता है।
शिवम नायर सिनेमा की तकनीक जानते हैं परंतु कहानी/स्क्रिप्ट ढंग की न हो तो निर्देशक कुछ नहीं कर सकता। नाम शबाना देखने की कोई ठोस वजह सामने नहीं आती।
सब यहां पुराना और फार्मूलाबद्ध है। निर्माता ने बाजार को ध्यान में रख कर ‘प्रोजेक्ट’ बनाया। परंतु इसमें संदेह नहीं कि नाम शबाना कथित बेबी ब्रांड का नाम डुबाती है। शुरू से अंत बोर करती है। क्या इसे ही मनोरंजन कहते हैं?
अनुपम खेर और डैनी चुनिंदा दृश्यों में आते-जाते हैं। तस्कर टोनी का किस्सा बीच में आता है और बेहद लंबा खिंचता है।
शिवम नायर सिनेमा की तकनीक जानते हैं परंतु कहानी/स्क्रिप्ट ढंग की न हो तो निर्देशक कुछ नहीं कर सकता। नाम शबाना देखने की कोई ठोस वजह सामने नहीं आती।
सब यहां पुराना और फार्मूलाबद्ध है। निर्माता ने बाजार को ध्यान में रख कर ‘प्रोजेक्ट’ बनाया। परंतु इसमें संदेह नहीं कि नाम शबाना कथित बेबी ब्रांड का नाम डुबाती है। शुरू से अंत बोर करती है। क्या इसे ही मनोरंजन कहते हैं?