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Movie Review: नेक इरादे पर नाकाम फिल्म है 'फुल्लू'

Sat, 17 Jun 2017 07:26 AM IST
रवि बुले
रवि बुले Updated Sat, 17 Jun 2017 07:26 AM IST
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Movie Review Of 'Phullu' Starring Sharib Hashmi And Jyoti Sethi
'फुल्लू' फिल्म
निर्माताः अनमोल कपूर, पुष्पा चौधरी
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निर्देशकः अभिषेक सक्सेना

सितारेः शारिब अली हाशमी, ज्योति सेठी

रेटिंग: *

यह सही है कि फिल्मों में सामाजिक संदेश भी मनोरंजन के साथ जरूरी हैं। 'फुल्लू' महिलाओं के मासिक धर्म को केंद्रीय विषय बनाकर बात करती है परंतु बहुत ही अधकचरे ढंग से। सिनेमाई कलात्मकता यहां गायब है। न लेखन के स्तर इसमें कल्पनाशीलता और न ही कहानी को शूट करने में खूबसूरती दिखाई गई है।

फुल्लू (शारिब अली हाशमी) गांव का ऐसा शख्स है, जिसे उसकी मां मऊगा कहती है यानी जो महिलाओं से घिरा रहता है। उन्हें भाभी कहते हुए उनकी जरूरत के सामान शहर से ला दिया करता है क्योंकि उनके पति दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों में कमाने के लिए गए हैं। मां फुल्लू की शादी बिगनी (ज्योति सेठी) से करा देती है कि फुल्लू शायद कमाई-धमाई के बारे में सोचे। परंतु वह नहीं बदलता और एक दिन शहर के मेडिकल स्टोर पर सैनेटरी नैपकिन की जानकारी मिलने के बाद तय करता है, वह इसे बनाने की फैक्ट्री में ही काम करेगा। पैड बनाना सीखेगा और गांव में महिलाओं को इन्हें इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित करेगा।
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'न किरदार बदलता है न परिवेश'

Movie Review Of 'Phullu' Starring Sharib Hashmi And Jyoti Sethi
'फुल्लू' फिल्म
फुल्लू की कोशिशों के बावजूद पूरी फिल्म में शुरू से अंत तक कुछ नहीं बदलता। न किरदार, न परिवेश। गर्भवती बिगनी अंत में प्रसव के दौरान मर जाती है। बच्चा भी नहीं बचता। फिल्म धीरे-धीरे सतह से नीचे आती जाती है और कुछ जगहों पर अवसाद से भरी मालूम पड़ती है। एक स्तर के बाद कहानी ठहर जाती है। न तो फुल्लू के इरादे ठीक ढंग से उभरते हैं और न ही ग्रामीण महिलाओं में स्वास्थ्य के प्रति सजगता सामने आती हैं। फिल्म को आप प्रयोगधर्मी सिनेमा की श्रेणी में भी नहीं रख सकते।

बदलते समाज के बीच मासिक धर्म के अस्वस्थ मिथकों तोड़ने और स्वस्थ शुरुआत की जो कोशिश 'फुल्लू' की एक पंक्ति की कहानी में दिखाई देती है, वह पर्दे पर कतई प्रभावित नहीं करती। इसकी मुख्य वजह खराब पटकथा-संवाद, लोकेशनों का चयन और कमजोर संपादन है। कैमरावर्क किसी पुरानी फिल्म जैसा है। अंततः आप पाते हैं कि एक अच्छा विषय नष्ट हो गया। शारिब अली हाशमी ने दिए गए रोल को ठीक से निभाया है परंतु उनकी मां का अभिनय करने वाली अभिनेत्री और मस्जिद के बाहर गाने वाले इमानुल हक कैमियो रोल में बढ़िया हैं। इसी विषय पर अक्षय कुमार की फिल्म भी बनकर तैयार हो रही है, 'पैडमैन'। बेहतर होगा, उसका इंतजार करें।
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