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Film Review: कॉफी विद डी: रोचक विषय की भोंथरी धार

Fri, 20 Jan 2017 06:05 PM IST
रवि बुले
रवि बुले Updated Fri, 20 Jan 2017 06:05 PM IST
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Movie review: Coffee with D
कॉफी ऐसा पेय पदार्थ है जो भांति-भांति प्रकार से तैयार किया जाता है। दाउद इब्राहिम भी बॉलीवुड वालों के लिए कॉफी से कम नहीं है। दाउद की कहानी के कुछ बीज हैं, जिसे अपनी कल्पना से सींचने वाले लेखक-निर्देशक उसे तमाम रूप देते आए हैं। उसमें सच-झूठ और गल्प का इतना घालमेल हो चुका है कि शायद यह अंडरवर्ल्ड डॉन और आतंकी खुद भी तथ्य और कल्पना का ठीक-ठीक बंटवारा न कर पाए।
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फिल्म समीक्षा: कॉफी विद डी

Movie review: Coffee with D
बॉलीवुड में दर्जन भर से ज्यादा फिल्में दाउद को दिखा चुकी हैं। निर्देशक विशाल मिश्रा भी बदनाम दाउद कथा का अपना संस्करण लाए हैं मगर निश्चित रूप से यह कॉफी पीने से मिलने वाली ताजगी जैसा असर नहीं करता। खराब पटकथा, लंबे-निरर्थक दृश्यों और दाउद के आगे मरियल-से दिखते सुनील ग्रोवर की वजह से रोचक विषय की धार भोंथरी पड़ जाती है। साफ लगता है कि फ्लोर पर जाने से पहले फिल्म के लिए सही तैयारी नहीं की गई।
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जानिए कैसी है सुनील ग्रोवर की 'कॉफी विद डी'

Movie review: Coffee with D
coffee with d
फिल्म ऐसे टीवी जर्नलिस्ट अर्णब (सुनील ग्रोवर) की कहानी है, जिसकी बातों के आगे सब पानी भरते हैं। परंतु मैनेजमेंट नाखुश है क्योंकि टीआरपी के खेल में चैनल पिछड़ रहा है। टीआरपी बढ़ाने के आइडिये को तलाशता अर्णब पाकिस्तान में बैठे आंतकी-डॉन डी (जाकिर हुसैन) को ललकारता है ताकि वह लाइव इंटरव्यू देने के लिए राजी हो जाए। डी राजी तो होता है मगर दोनों के आमने-सामने पड़ते ही ऐसा लगता है कि अर्णब के सारे कारतूस खत्म हो गए। कमजोर स्क्रिप्ट की वजह से दर्शक की नजर में गिरने के बाद अर्णब उठ नहीं पाता और फिल्म खाम-खयाली के साथ द एंड पर दस्तक दे देती है।
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फिल्म समीक्षा: कॉफी विद डी

Movie review: Coffee with D
coffee with d
कॉफी विद डी में लेखन के साथ निर्देशन की कमजोरियां हैं। दृश्य बांध नहीं पाते। अभिनेता कॉमेडी को सीरियसली लेते नहीं दिखते। लगता है कि वह कैमरे के आगे चहल-कदमी कर रहे हैं। नतीजा यह कि पूरे कथानक में वह माहौल नहीं बनता जो बांध सके। सब कुछ यहां बिखरा है। कोई ऐसी बात नहीं आती, जो सोचने पर मजबूर करे। फंस गए रे ओबामा जरूर याद आती है। उसे ही आदर्श मान कर डी के साथ कॉफी के मंसूबे बांधे गए होते तो काफी कुछ यहां अलग होता। जाकिर हुसैन, पंकज त्रिपाठी और राजेश शर्मा जैसे अनुभवी कलाकार यहां हैं परंतु एक भी असर नहीं छोड़ता। दिपनिता और अंजना तो कतई नहीं। सुनील ग्रोवर टीवी पर ही अच्छे लगते हैं। निर्देशक विशाल मिश्रा की यह पहली फिल्म है। उम्मीद की जा सकती है कि वह अगली फिल्म में कसावट भरे काम के साथ आएंगे। फिलहाल आप इस कॉफी और डी दोनों को ही दूर से सलाम कर सकते हैं।
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