Khela Hobe Review: ओमपुरी की आखिरी फिल्म में नहीं दिखा दिग्गज अभिनेता का दम, मुग्धा गोडसे से नहीं हो पाया खेल
चुनाव कोई भी हो, जीतने के लिए कोई ना कोई मुद्दा जरूर होना चाहिए। जितना बड़ा चुनाव उतना ही बड़ा मुद्दा। 'खेला होबे' का विषय भी चुनाव पर आधरित है। कोई छह साल पहले बनी यह फिल्म अब जाकर रिलीज होने जा रही हैं। दिवंगत अभिनेता ओमपुरी इस फिल्म में एक खास किरदार निभाते नजर आए। ओम पुरी की मृत्यु के पांच साल के बाद 'खेला होबे' उनकी आखिरी रिलीज फिल्म बन गई है। इस फिल्म में एक काल्पनिक स्थान राघवगढ़ की कहानी को दिखाया गया है, जहां एक अर्धविक्षिप्त लड़की गर्भवती हो जाती है, फिर कस्बे के चौराहे पर एक बहस शुरू हो जाती है, कि यह घिनौना कृत किसने किया होगा?
नगर निगम के चुनाव होने वाले हैं और बच्चू लाल की भूमिका निभा रहे मनोज जोशी को चुनाव जीतने के लिए एक मुद्दा मिल जाता है। मुद्दा यह है कि एक पागल लड़की के साथ घिनौना कृत्य किसने किया? चुनाव मैदान में फारिख भाई की भूमिका निभा रहे ओम पुरी भी हैं, लेकिन वह दूसरों की तरह झूठे वादे के बल पर चुनाव नहीं लड़ना चाहते। पिछली बार वह चुनाव हार गए थे, उनकी इच्छा है कि किसी तरह से इस बार चुनाव जीत जाएं। नगर निगम के वर्तमान चेयरमैन गिरीश गुप्ता को मात देने के लिए उनके विरोधी शब्बो का किरदार निभा रही मुग्धा गोडसे को चुनाव मैदान में उतरते हैं, फिर शुरू होता है चुनावी जंग जैसा की आम तौर पर चुनाव में देखने और सुनने को मिलता है।
राजनीति एक ऐसा अखाड़ा है कि अपने फायदे के लिए लोग अपने रिश्तों को भी दाव पर लगा देते हैं, और कुछ ऐसे लोगों को उठाकर फर्श से अर्श तक पहुंचा देते हैं जिन्हें समाज में आम तौर पर घृणित नजरिए से देखा जाता है। कल तक पगली कहलाती रही जब मां बन जाती है तो लोग दूर दूर से अस्पताल में उसे चढ़ावा चढ़ाने आते हैं। लेकिन यहां भी एक गंदी राजनीति चलती है। वह पागल औरत कौन है, उसका अतीत क्या है? इसको निर्देशक ने पूरी तरह से सस्पेंस रखा है,लेकिन जब अंतिम में उस पागल औरत का खुलासा होता है तो, वह किसी भी एंगल से पागल नहीं लगती। सिनेमा में लिबर्टी के नाम पर निर्देशक ने इतनी ज्यादा लिबर्टी ले ली कि वह भूल गए कि इस तरह की कहानियों में कितनी संवेदनशीलता की जरूरत होती है।
फिल्म के निर्देशक सुनील सी सिन्हा 'खेला होबे' से पहले कई भोजपुरी फिल्मों का निर्देशन कर चुके हैं। 'खेला होबे' के रूप में उन्होंने विषय तो अच्छा चुना लेकिन उसे ठीक से परदे पर उतार नहीं पाए। चुनावी माहौल में जिस तरह की सरगर्मी देखने को मिलती है, फिल्म को उस तरह से पेश नहीं कर पाए। पूरी फिल्म की शूटिंग उन्होंने मुंबई के एसेल स्टूडियो और मढ आईलैंड के मनीषा बंगले में पूरी कर ली। पिछले कुछ समय से सिनेमा के क्षेत्र में काफी बदलाव आया है, चाहे वह कहानी कहने का तरीका हो या फिर तकनीकी स्तर पर, यह फिल्म इस पर खरी नहीं उतरती है। फिल्म में उन्होंने हिंदी सिनेमा के दिग्गज कलाकारों में ओम पुरी, मनोज जोशी, रति अग्निहोत्री जैसे कलाकारों का चयन किया है,लेकिन इन कलाकारों से वह ढंग से काम नहीं निकाल पाए।
इस तरह की फिल्मों का बजट बहुत कम होता है, कम संसाधन और सीमित बजट में फिल्म बनाना किसी भी निर्देशक के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होता है। लेकिन फिल्म की जो बेसिक जरूरतें होती हैं,कम से कम उसका तो ख्याल निर्देशक टीम को जरूर रखना चाहिए था। मसलन, फिल्म में कॉस्ट्यूम कंटीन्यूटी का बहुत झोल है। एक सीन में ओम पुरी अलमारी से जब अपना कुर्ता निकालकर बेड पर रखते है और फिर तुरंत उसे पहनते हैं, तो उस कुर्ते का रंग बदल जाता है। ऐसे ही मनोज जोशी के साथ भी होता है, घर से निकलते वक्त उनकी शर्ट का रंग कुछ और है और बाद में उनकी शर्ट का रंग बदल जाता है। ऐसी छोटी मोटी बहुत सारी गलतियां है, जिस पर ध्यान रखा जा सकता था।
जहां तक फिल्म में सभी कलाकारों के अभिनय की बात है तो ओम पुरी, मनोज जोशी के बहुत अच्छा काम किया है, लेकिन निर्देशक इनकी प्रतिभा का सही इस्तेमाल नहीं कर पाए। रति अग्निहोत्री महज कुछ सीन में ही नजर आई। उनके संवाद किसी और से डब कराए गए है जो साफ तौर पर पता चलता है, जिसकी वजह से उनकी भूमिका कमजोर पड़ती है। मुग्धा गोडसे ने भरपूर कोशिश की है लेकिन वह भी अपना प्रभाव नहीं छोड़ पाई। रुशद राणा, संजय बत्रा, संजय सोनू और रतन मयाल जैसे कलाकारों की भी परफॉर्मेंस सामान्य रही। फिल्म का ऐसा कोई गीत नहीं, जो याद रहे। इस तरह के विषय पर फिल्म को अच्छा लुक देने की जो जिम्मेदारी कैमरामैन की होती है,वह भी अपनी जिम्मेदारी निभाने से चूक गए। फिल्म का संपादन, बैकग्राउंड म्यूजिक भी बहुत सामान्य है। फिल्म के निर्देशक की थोड़ी सी तारीफ करना इसलिए लाजिमी है कि छह साल से बनी फिल्म को थिएटर तक लाने में कामयाब हुए है,नहीं तो ऐसी फिल्में थिएटर तक मुश्किल से ही पहुंच पाती हैं।