Ishq Vishk Rebound Review: पश्मीना रोशन की डेब्यू फिल्म के चार ‘विलेन’, हेयरपिन बेंड पर निपुण के साथ ढप्पा
कुछ फिल्में देखने का भीतर से खूब मन होता है, कुछ फिल्में देखने की जरूरत इसलिए होती है क्योंकि वे आपको जमाने की बदलती रफ्तार दिखा सकती हैं और फिर कुछ फिल्में इसलिए भी देखनी जरूरी होती हैं, क्योंकि उनका डीएनए ऐसी फिल्मों का होता है जो अपने जमाने की हिट फिल्में रही हैं। फ्रेंचाइजी जैसा तो कुछ विकसित होता नहीं दिखता लेकिन केन घोष निर्देशित फिल्म ‘इश्क विश्क’ के गुणसूत्रों पर बनी फिल्म ‘इश्क विश्क रिबाउंड’ देखने की दो वजहें रहीं, एक इसके हीरो रोहित सराफ जो ‘व्हाट विल पीपल से’ और ‘स्काई इज पिंक’ में अपनी अदाकारी की संभावनाएं दिखा चुके हैं। और, दूसरी ऋतिक रोशन की चचेरी बहन पश्मीना रोशन। याद है न करिश्मा कपूर, करीना कपूर को कपूर खानदान ने बड़े परदे पर लॉन्च नहीं किया था। पश्मीना की पहली फिल्म भी टिप्स म्यूजिक कंपनी ने बनाई है। सबक नंबर एक, बेटियां अब भी हिंदी सिनेमा में कारोबारी दांव लगाने के लिए फिल्मी परिवारों की प्राथमिकता नहीं हैं।
सबक दर सबक सिखाती फिल्म
फिल्म ‘इश्क विश्क रिबाउंड’ इसे बनाने वाली कंपनी टिप्स की कारोबारी प्राथमिकता है या नहीं, इसके बारे में तो तहकीकात अभी जारी रहेगी, लेकिन इस फिल्म को बनाने का जो सबसे अहम कारण नजर आता है वह है रोहित सराफ और निर्देशक निपुण धर्माधिकारी की वेब सीरीज ‘मिसमैच्ड’ से बनी दोस्ती। सबक नंबर दो, डायरेक्टर के पास एक काबिल हीरो हो, एक अच्छी सी दिखने वाली कहानी हो तो फिल्म बनाने को कौन मना करेगा? ऊपर से निर्देशक अगर प्रोड्यूसर के कहने पर एक नई हीरोइन लॉन्च करने को तैयार हो जाए, तो मामला सेट हो ही जाता है। दो हीरो, एक हीरोइन की इस प्रेम त्रिकोण सी कहानी में अगर आंखें बंदकर महसूस करें तो एक बहुत प्यारी सी दोस्ती, रिश्तों और मोहब्बत की कहानी है। इसकी पटकथा को इसके चार क्रुक्स, सॉरी चार कुक्स ने खराब न किया होता ये फिल्म कमाल की बनती। सबक नंबर तीन, बहुत सारे कुक्स मिलकर एक डिश ही नहीं बल्कि एक फिल्म भी खराब कर सकते हैं।
एक लड़का और एक लड़की अब भी दोस्त नहीं होते?
फिल्म के निर्माता रमेश तौरानी और जया तौरानी का इस फिल्म के निर्माण के लिए राजी होना ही नई पीढ़ी के कलाकारों की हौसला अफजाई के लिए काफी है। रोहित, जिब्रान और पश्मीना ने अपना काम भी काफी अच्छे तरीके से किया है। जिब्रान ने बाल कलाकार के तौर पर पहले भी काफी वक्त मूवी कैमरे के सामने बिताया है और उनका बड़े होकर इस तरह के लीड रोल में आना उन्हें पहचानने वालों के लिए सुखद एहसास है। रोहित को हिंदी के आम दर्शक उतना नहीं जानते जितना ऑफबीट फिल्में और महंगी वेब सीरीज देखने वाले जानते हैं। फिल्म ‘इश्क विश्क रिबाउंड’ भी अमीर घरानों की मन ही मन में घुटती औलादों की प्रेम कहानी ही है। एक बहुत अच्छा मौका था हिंदी सिनेमा के दर्शकों के सामने ये परखने का कि इक्कीसवीं सदी की प्रेम कहानियों में क्या अब भी एक लड़का और एक लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते। क्या अब भी मौका मिलते ही दोनों को एक-दूसरे को ‘स्मूच’ कर लेना ही क्यूपिड की नियति है?
चौराहे पर फूटी चार लेखकों की हांडी
फिल्म ‘इश्क विश्क रिबाउंड’ की पटकथा ही इसकी असली विलेन है। इसके चारों लेखकों ने मिलकर इसको इतना अलग-अलग कोनों में खींचा है कि बाद में पैबंद लगाने पर भी इसका तंबू ठीक से तन नहीं पाता है। ठीक ठाक चलती फिल्म में फोर्थ वॉल से बात करने का एक्सपेरीमेंट जिसका भी आइडिया रहा हो, इस तरह की फिल्मों मे काम नहीं करता है। दोस्त के बाप से मुक्का खाने के ठीक पहले कौन भला यूं दर्शकों से बात करता है? नॉनसेंस! फिल्म के संवाद भी बहुत औसत हैं। पूरी फिल्म सिर्फ अपनी लिखावट के चलते भारी हो जाती है और हाल के दिनों की सबसे कम अवधि की फिल्म होने के बावजूद इंटरवल के बाद बोर करने लगती है। सबक नंबर चार, कहानी सीधी और सिंपल हो तो उसे बेवजह कॉम्प्लीकेट करने की जरूरत नहीं है।
रोहित और पश्मीना को मिले पासिंग मार्क्स
रोहित सराफ ने फिल्म को इसके बाद भी संभालने की कोशिश खूब की है। वह बॉय नेक्स्ट डोर भले न हो लेकिन क्यूट बहुत लगते हैं। पश्मीना रोशन के लिए ये फिल्म एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जहां से वह आगे स्लो या फास्ट जो मर्जी चाहें ट्रेन पकड़ सकती हैं। उनके अभिनय में ताजगी है, ट्रेनिंग थोड़ी और मिली तो वह एक्टिंग उन तमाम ‘स्टार किड्स’ से बेहतर कर ले जाएंगी, जिनकी तरफ से मुंबई की दिग्गज टैलेंट एजेंसियां खूब बैटिंग करती रहती हैं। सबक नंबर पांच, निर्देशक कितना ही काबिल क्यों न हो, अगर उसे फ्री हैंड न मिला तो मामला जमना काफी मुश्किल होता है।
निपुण के लिए हिंदी सिनेमा का सबसे बड़ा सबक
सुप्रिया पिलगांवकर और शीबा चड्ढा जैसी काबिल अभिनेत्रियों को इस फिल्म में लाना निर्देशक निपुण की निपुणता की एक और बानगी है। नेशनल फिल्म अवॉर्ड विनर निपुण धर्माधिकारी के कहानी कहने में एक अलहदा अंदाज तो है। लेकिन हिंदी फिल्मों के प्रोड्यूसर उन्हें कितनी फ्रीडम इसके लिए देते हैं, इसी पर उनका आगे का रास्ता जाता है। मोड़ खतरनाक है। उन्हें बिल्कुल हेयरपिन बेंड जैसे रास्ते से निकलना है। हिंदी में बात करते करते कलाकार जब एकदम से पंजाबी में रोमांटिक होते हैं तो ठेठ हिंदी पट्टी के दर्शकों की तरह मुझे भी सोचने पर मजबूर होना पड़ जाता है कि आखिर ये माजरा क्या है? क्या अब भी कनाडा और पंजाब से ही हिंदी फिल्म म्यूजिक इंडस्ट्री की सबसे ज्यादा कमाई हो रही है? या सिर्फ टिप्स और टी सीरीज जैसी कंपनियों का भ्रम है, क्योंकि बीते साल यू ट्यूब पर सबसे ज्यादा देखे गए गानों की पाठशाला का सबक तो कुछ और ही कहता है।