Helmet Movie Review: अपारशक्ति और अभिषेक बनर्जी की ये है असली ‘स्टारवैल्यू’, जी5 की एक और खराब फिल्म
आमिर खान के भाई फैसल खान तो याद ही होंगे आपको। उनकी एक फिल्म बीते हफ्ते रिलीज हुई है। एक और भाई हिंदी सिनेमा के उसी रास्ते पर हैं। आयुष्मान खुराना के भाई अपारशक्ति। वह साबित करने में जुटे हैं कि नाम में क्या रखा है। और, लगता है कोशिश उनकी कामयाब भी हो रही है। वीर्यदान पर एक फिल्म ‘विकी डोनर’ करके आयुष्मान रातोंरात सुपरस्टार बन गए थे। वीर्यसंकलन पर फिल्म ‘हेलमेट’ करके अपराशक्ति खुराना अपने पैकअप की कहानी लिखना शुरू कर चुके हैं। दोनों फिल्मों में फर्क है, कॉमेडी और फूहड़पन का। ओटीटी पर तमाम अच्छी कहानियों के साथ साथ ढेर सारा कचरा भी पहुंच रहा है। फिल्म ‘हेलमेट’ इसी बाढ़ में बह आई कहानी है जिसे देखने का मतलब अपना कीमती समय बर्बाद करना तो है ही, ये जी5 के नए प्रबंधन की अपने ग्राहकों के साथ वादाखिलाफी की भी नई मिसाल है।
देसी कहानियों को दुनिया तक पहुंचाने के वादे के साथ शुरू हुआ जी5 अब उस दौर में पहुंच चुका है जहां कहानियां ही उसके पास नहीं हैं, बाकी सब है। बड़े बड़े नाम हैं। बड़े बड़े प्रोडक्शन हाउस हैं। बस नहीं हैं तो कहानियां। और कहानियां लेकर जी5 तक कोई जाए भी तो कैसे, अगर जज ऐसा हो जो पहले ‘स्कैम 1992’ को रिजेक्ट कर चुका है। ख़ैर, जो एक्सेप्ट हुआ उसकी भी कुछ न कुछ अलग ही कहानी होगी नहीं तो फिल्म ‘हेलमेट’ को तो स्क्रिप्ट लेवल पर ही रिजेक्ट करना बनता है।
21वीं सदी को शुरू हुए 21 साल बीत चुके हैं और ऐसे में 21 साल का लड़का तो अब गांव में किराने की दुकान पर भी झट से ‘केएस’ खरीद लेता है। यहां शहर का बालक मेडिकल स्टोर में कंडोम नहीं खरीद पा रहा है। कहानी तो यही होनी चाहिए कि आखिर ये किस बस्ती का बालक है जहां बालिग लड़के को अब भी कंडोम खरीदते शरम आती है। निर्देशक ने इस कंडोम खरीद की कहानी की पृष्ठभूमि भी बताई है। और, फिर यही कहानी आगे चलकर भानुमती का पिटारा बनने की कोशिश में अपना ही बाजा बजवा लेती है। तीन दोस्त मिलकर मोबाइल से भरी वैन लूटने का प्लान बनाते हैं और लूट लेते हैं कंडोम की थोक डिलीवरी करने जा रही वैन। जिनको कंडोम खरीदते शरम आ रही थी, वे इसे घर घर पहुंचाने की ‘समाजसेवा’ में जुटते हैं।
फिल्म ‘हेलमेट’ कॉन्सेप्ट लेवल पर ही फेल फिल्म है। अमोल पालेकर की जवानी के दिनों की ये अच्छी फिल्म हो सकती थी। तब से पिछले पचास साल में दुनिया बहुत लाल त्रिकोण देख चुकी है। कहानी चुनने में गच्चा खाने के बाद निर्देशक सरताम रमानी ने फिल्म की कास्टिंग करने में भी गोता खाया है और फिल्म में एक भी कलाकार ऐसा नहीं है जो अपने नाम से फिल्म चला सके। अपराशक्ति का भी खुद को सुपरस्टार समझने का गुमान ऐसी ही फिल्मों से टूटना है। अभिषेक को ये गलतफहमी अरसे से है कि ‘स्त्री’ और ‘पाताललोक’ को अकेले उन्होंने ही हिट करा दिया है। दोनों की ‘स्टारवैल्यू’ दर्शकों को यहां आकर पता चली है।
कलाकारों में अगर किसी कलाकार पर वाकई तरस आता है तो वह हैं प्रनूतन बहल। नूतन जैसे कलाकार की तीसरी पीढ़ी की अदाकारा को अच्छा अभिनय आने के बाद भी अगर खेमेबाजी के चलते अच्छी फिल्में नहीं मिल रही हैं, तो ये हिंदी सिनेमा की हार है। जमील खान, आशीष वर्मा ने अपना काम अपने हिसाब से ही कर दिया है और इन दोनों के फिल्म में होने न होने से कोई खास फर्क भी नहीं पड़ता है। जिनके नाम से फिल्म बनी है, उन्होंने ही पूरा खेल खराब पहले ही कर दिया है। अपारशक्ति को एक्टिंग नहीं आती, ये उन्हें मान लेना चाहिए। अभिषेक बनर्जी के लिए अब भी समय है कि वह संभल जाएं। अपने खीसे से स्टारडम को निकालकर बाहर फेंके और अपनी कदकाठी व नापतौल के हिसाब के किरदार करें तो लंबा चल सकते हैं। फिल्म बहुत ही बोरिंग फिल्म है और इस सीजन की सबसे खराब फिल्म भी।