Ganpath Review: शिव शक्ति भी नहीं कर पाई ‘गणपत’ का उद्धार, बेहद खराब निकली कृति, अमिताभ और टाइगर की फिल्म
फिल्म ‘गणपत’ को देखने की वजह सिर्फ एक रही और वह ये कि आखिर इस फिल्म के निर्माता और निर्देशक सिनेमा में आई नई तकनीकों का इस्तेमाल किस तरह करते हैं? एक काल्पनिक शहर की रचना, अमीरों और गरीबों की गहरी खाई, शिव और गणेश के वैदिक उद्धरण, थलपति और दलपति का फर्क समझाती कहानी और नायक की एक ऐसी परिकल्पना, जिससे शायद नई पीढ़ी के दर्शकों को भी लगाव हो जाए। यही सब कुछ सोचकर फिल्म ‘गणपत’ के रचयिता विकास बहल ने सिल्वरसिटी की ये दुनिया रची होगी। ये ऐसी दुनिया है जहां गरीबों की बस्ती में पूरी धरती पर तिरपाल बिछा है और अमीरों की बस्ती में दर्जन भर लोग ही रहते हैं। ऊंची इमारतों में कोई नहीं दिखता। हां, स्टेडियम खचाखच भरा दिखता है। कोई ऐसा शहर है जहां के गरीब अंग्रेज जैसे नजर आते हैं और अमीर हिंदुस्तानियों जैसे।
बगैर हिंदुस्तान का हिंदी सिनेमा
हिंदुस्तान से दूर रहकर बिना हिंदुस्तान की धरती पर कदम रखे हिंदी सिनेमा बनाने का ख्वाब निर्माता वाशु भगनानी बरसों से देख रहे हैं। ब्रिटेन में अपना स्टूडियो भी उन्होंने इसी सपने को पूरा करने के लिए खड़ा कर दिया है। लागत का एक बड़ा हिस्सा वहां की सरकार छूट के रूप में निर्माताओँ को दे देती है और किसी फिल्म की बस लागत भर ऊपर नीचे करके घाटे में भी इस सब्सिडी के सहारे मुनाफे का सौदा कैसे किया जाता है, ये बात अब किसी से छिपी नहीं हैं। कोई 200 करोड़ रुपये की फिल्म बताई जा रही ‘गणपत’ की मेकिंग ऐसी है कि इस पर 50 करोड़ रुपये का खर्च भी ज्यादा दिखता है। इससे अच्छे ग्राफिक्स बीती सदी के वीडियो गेम्स में हुआ करते थे। और, पोस्ट प्रोडक्शन का काम इतना खराब है कि क्लब से कृति सैनन को निकाले जाने के सीन के एक शॉट में बैकड्रॉप तक लगाना इसके एडिटर भूल गए हैं। वहां हरा क्रोमा वैसे का वैसा ही दिखता रहता है।
टुकड़े टुकड़े में रची गई टूटी दुनिया
तकनीकी रूप से बेहद खराब फिल्म ‘गणपत’ की कहानी की कल्पना ऐसी है कि इसमें कलाकार लंबे लंबे सीन बस कैमरे के सामने खड़े होकर बोलते रह सकता है और दूसरे कलाकारों की शूटिंग बाद में करके इन सीन्स के बीच में पिरोया जा सकता है। न मास्टर शॉट की जरूरत, न ओएस की, न एक्सिस चेंज करने की जरूरत और न ही ड्रामा बिल्ड अप करने के लिए जूम इन, जूम आउट की। क्रोमा लगा हुआ है। शॉट फिक्स है। ट्रैकिंग भी हो सकती है क्रोमा पर, लेकिन उसके लिए तकनीकी दक्षता भी तो होनी चाहिए। कुल मिलाकर फिल्म ‘गणपत’ के कोई तीन साल पहले हुए एलान के समय जो एक डिस्टोपियन दुनिया में रची साइंस फिक्शन फिल्म देखने की ललक बनी थी, वह फिल्म के शुरू होती ही फड़फड़ाकर बुझ जाती है।
अमिताभ बच्चन ने चुकाया एहसान
वाशु भगनानी अपने समय के प्रोड्यूसर नंबर वन रहे हैं। जुहू की एक दुछत्ती में चलने वाले ऑफिस से लेकर लंदन के करीब खुले उनके एयरकंडीशंड स्टूडियो तक बतौर निर्माता उनकी तरक्की फिल्म ‘गणपत’ की असल सक्सेस स्टोरी है। लेकिन एक फिल्मकार के तौर पर उनका विकास फिल्म ‘रहना है तेरे दिल में’ के टाइम फ्रेम में ही कहीं अटककर रह गया है। अमिताभ बच्चन का उन्होंने फिल्म की ओपनिंग और क्लोजिंग क्रेडिट्स में बार बार एहसान माना है कि उन्होंने उनकी इस फिल्म में काम करने की बात मान ली। जिन लोगों ने हैदराबाद में 25 साल पहले वाशु की ही फिल्म ‘बड़े मियां छोटे मियां’ की शूटिंग के समय के हालात देखे हैं, उन्हें पता है कि वाशु जलसा जाएं और हां लेकर न लौटें, ऐसा हो नहीं सकता। अतीत की मेहरबानियां वर्तमान की कद्रदानियां बनती ही हैं।
थलपति नहीं दलपति कहिए, जनाब!
अगर आपको अब भी फिल्म ‘गणपत’ की कहानी जाननी है तो बस ये जान लीजिए कि शोषितों की बस्ती को जिस गणपत का इंतजार अपने मसीहा के तौर पर है, वह शोषणकर्ता के यहां गुड्डू के नाम से नौकरी पर है। इस दुनिया में बस फाइट है और डांस है। बाकी कुछ इस दुनिया के लोग करते दिखते नहीं हैं। गुड्डू को कहकर बताना पड़ता है कि ये दुनिया मैड मैक्स जैसी है। हीरो और विलेन के आमने सामने के संवाद नहीं हैं। एक मजबूत जोकर से ही एक मजबूत बैटमैन बन पाने की कहावत शायद न विकास ने सुनी न वाशु ने। यहां कहानी का विलेन बोलता ही नहीं हैं। दलपति बने अमिताभ बच्चन के भी फिल्म के दूसरे मुख्य कलाकारो के साथ ड्रामा बिल्डअप करने वाले सीन नहीं हैं।
मजबूरी का नाम टाइगर श्रॉफ
टाइगर श्रॉफ के हिस्से जो संवाद आए हैं, वे यूं लगता है कि खुद से ही बातें करते हुए वह बोले जा रहे हैं। और, जब वह संवाद नहीं बोल रहे होते हैं तो या तो नाच रहे होते हैं या बिना शर्ट के लड़ाई कर रहे होते हैं। हां, लेकिन एक महिला स्वर में गाए गाने पर टाइगर श्रॉफ लिप सिंक क्यों कर रहे हैं, ये कोई नहीं समझाता। फिल्म में कृति सैनन भी हैं। दो दिन पहले ही उन्हें फिल्म ‘मिमी’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला है। अब ‘गणपत’ पूरी बनने के बाद खुद कृति सैनन ने जब देखी होगी तो उन्हें कैसा लगा होगा? ये भी बहुत जल्द उनके बयानों से सामने आने वाला ही है। फिल्म का गीत संगीत बहुत खाली है। टीन के डिब्बे सा ये आवाज तो करता है, पर असर नहीं करता।