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सिक्सटीनः सोलह बरस के सपनों की कहानी

Fri, 12 Jul 2013 10:16 AM IST
रवि बुले
रवि बुले Updated Fri, 12 Jul 2013 10:16 AM IST
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film review of sixteen

नई पीढ़ी। नए खयाल। नया निर्देशक। नए अभिनेता। विषय अनछुआ भले ही नहीं, लेकिन उसकी कई बातें नई जरूर हैं। निर्देशक राज पुरोहित की फिल्म सिक्सटीन सोलह बरस की 'साली' उमर की बात करती है।

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जब पढ़ाई के वर्तमान और कैरियर के भविष्य के बीच कई रंगीनियां आकर्षित करती हैं। प्रेम की तरंगें मन और चंचल उमंगें तन को बेचैन बनाती हैं।

पुरोहित की यह पहली फिल्म कूल और कंटेंप्ररी है। वे बच्चों की बात करते हैं, लेकिन घर और माता-पिता पर भी कैमरा घुमाते हैं। फिल्म में एक संवाद है कि अच्छे माता-पिता भी बड़ी मुश्किल से मिलते हैं।
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यह बात घर से बगावत करने वाले बहुत सारे बच्चों के मन की है। जैसे माता-पिता अच्छे बच्चे चाहते हैं, वैसे ही बच्चे भी अच्छे माता-पिता चाहते हैं। अच्छे मतलब...? जो उनके मन को समझें। उनके समय के साथ कदम से कदम मिलाएं।
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कहानी दिल्ली के किशारों की

निर्देशक ने दिल्ली के एक स्कूल में पढ़ रहे किशोर-किशोरियों की कहानी कही है। यह मुख्य रूप से तीन किशोरियों (वमीका, इजाबेल और महक) की कहानी है, जो अपनी लव-लाइफ और सेक्स-लाइफ के सवालों के हल ढूंढ रही हैं। उनकी बातों में कैरियर और परिवार भी हैं।

तीनों अलग-अलग हादसों की शिकार होती हैं। एक का एमएमएस सामने आता है, दूसरी प्रेग्नेंट हो जाती है और तीसरी अपने से दोगुनी उम्र के युवक से प्यार कर बैठती है।

ये नायिकाएं अपनी बातों में बिंदास हैं। कई जगहों पर चौंकाती हैं। जबकि उनका क्सालमेट किशोर अपने पिता की आईएएस बनने की इच्छा तले दबा ठीक से सांस तक नहीं ले पा रहा है। अंततः वह बड़े हादसे का शिकार होता है।

अंग्रेजी की अधिकता फिल्म की कमजोरी

सिक्सटीन यह भी बताती है कि बॉलीवुड टीन-एज/यंग एडल्ट फिल्मों के बाजार के प्रति गंभीर हो रहा है। पिछले दिनों 'गिप्पी' आई थी। हालांकि अभी तक यह फिल्में सिर्फ महानगरीय बच्चों और उनके जीवन संघर्षों की ही बात कर रही हैं। सिक्सटीन के तीन-चौथाई संवाद अंग्रेजी में हैं। यह बात उसके बॉक्स ऑफिस कलेक्शन पर असर डालेगी।


निर्देशक ने पूरे कौशल से कहानी कही है। कलाकारों का अभिनय मंजा हुआ है। फिल्म में माता-पिता और बच्चों के बीच समय और संस्कारों का संघर्ष है। संभव है कि कई अभिभावक निर्देशक की बात से सहमत न हों क्योंकि उन्हें लगता है कि हमारे समय में बच्चों को बिगाड़ने वाली चीजें कदम-कदम पर मौजूद हैं।

तब उन्हें कैसे खुली छूट दे दी जाए। ऐसे में बशीर बद्र का यह शेर याद आता हैः

दुनिया में कहीं इनकी तालीम नहीं होती
दो-चार किताबों को घर में पढ़ा जाता है।

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