शौकीन्सः सेक्स के लिए लार टपकाने वालों की कहानी
कई बार महसूस होता है कि बॉलीवुड में खराब से खराबतर सिनेमा बनाने की स्पर्द्धा हो रही है। कौन कितना नीचे उतर सकता है। शौकीन्स को देख कर भी आपको ऐसा लगेगा। यहां दिल्ली के तीन बूढ़े हैं। लेकिन इतने भी बूढ़े नहीं कि रिटायर हों। वे स्वस्थ हैं, सक्रिय हैं। उनके जीवन में सब कुछ है, मगर कुछ नहीं है तो सेक्स।
यहां-वहां देख कर उनकी लार टपकती रहती है। चूंकि दिल्ली में उनका परिवार हैं, परिचित हैं इसलिए वे मलेशिया जाते हैं। मौज-मस्ती करने। यहां जिस लड़की के घर में वे रुकते हैं, उसी पर उनकी नजर ठहर जाती है। सदा फेसबुक से चिपकी रहने वाली लड़की का बॉयफ्रेंड उसे छोड़ चुका है और वह जब आत्महत्या करने के लिए एक मॉल की छत पर पहुंचती है तो वहां फिल्म ऐक्टर अक्षय कुमार की शूटिंग हो रही होती है।
लड़की मरने का आइडिया ड्रॉप कर देती है क्योंकि वह अक्षय की सबसे बड़ी फैन है और उससे मिलाने वाले के लिए कुछ भी कर सकती है। तीनों बूढ़ों को जब यह बात पता चलती है तो वे एक-एक करके उसे अक्षय से मिलाते हैं। लेकिन उनके हाथ वह नहीं लगता, जिसकी वे उम्मीद करते हैं।
न रोमांच न ही रोमांस
फिल्म 1982 में आई निर्देशक बासु चटर्जी की शौकीन से प्रेरित है, लेकिन बेहद निराश करती है। यहां कहानी नीरस है। आधे से ज्यादा हिस्से में वह एक ही जगह पर ठहरी हुई फूहड़ दृश्य रचती रहती है। कई बार खुद को दोहराती है।
इसमें न रोमांच है और न रोमांस। तीन बूढ़े, एक मिशन, एक जैसी हरकतें, एक जैसा हश्र। लड़की उन्हें कहती है कि मेरा मन समुंदर किनारे बिकनी पहन कर टहलने का हो रहा है और वे तीनों जाने कितने दृश्यों में उससे बिकनी पहनने का आग्रह करते दिखते हैं। ...और जब वह बिकनी में आती है बूढ़ों समेत दर्शक भी निराश होते हैं।
लीजा भी करती हैं निराश
अगर आपने क्वीन की लीजा हेडन देखी है तो शौकीन्स की लीजा भी देख लीजिए। आप जान जाएंगे कि निर्देशक का महत्व क्या होता है। जो लीजा क्वीन में आकर्षक और दिल में उतरने वाली थीं, वही कुछ महीनों बाद यहां सुस्त और सस्ती दिखी हैं।
उनका सांवलापन इसमें जादू नहीं करता। जितनी तेजी से लीजा का ग्राफ क्वीन में चढ़ा था उससे ज्यादा तेजी से इस फिल्म में उतरता है। लीजा को बहुत खराब ढंग से शूट किया गया है। वह तीनों बूढ़ों की पसंद हैं और आपको उन पर तसर आता है। अनुपम खेर, अनु कपूर और पियूष मिश्रा भी एक-दूसरे से खराब ऐक्टिंग करने की प्रतिस्पर्द्धा में नजर आते हैं।
अक्षय को क्या हो गया?
अक्षय कुमार अतिआत्मविश्वास के शिकार दिखते हैं। सिर्फ अक्षय ही नहीं, उनके समकालीन सलमान, शाहरुख, सैफ जैसे सितारों की पूरी पीढ़ी के साथ यही समस्या है। जैसे-जैसे इनकी उम्र बढ़ रही है वैसे वैसे अपनी फिल्मों में ये ज्यादा निरर्थक रोल कर रहें हैं। शौकीन्स बासी में कढ़ी में उबाल है।
ऐक्टिंग से लेकर शूटिंग तक सस्तापन इसकी सतह पर दिखता है। फिल्म के संगीत का यह आलम है कि इसके एक गाने में इश्क को कुत्ता बना दिया है और दूसरे में हीरो अपने अल्कोहलिक (शराबी) होने पर छाती ठोक कर कहता है कि अपने पैसे की पीता है, किसी के बाप की नहीं। चलिए, शराबियों के हक में कहीं से बुलंद आवाज आई। चीयर्स...!!