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Movie Review: 'बैंक चोर' में सस्ती चुटकुलेबाजी की धूम

Sat, 17 Jun 2017 07:26 AM IST
रवि बुले
रवि बुले Updated Sat, 17 Jun 2017 07:26 AM IST
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film review of ritesh deshmukh starrer movie bank chor
बैंक चोर

सिर्फ दर्शक ही ‌डिमांड नहीं करते कि कैसी फिल्म देखना चाहते हैं, फिल्में भी डिमांड करती हैं कि उन्हें कैसे देखा जाए। कुछ फिल्में सजग होकर देखने की होती है, कुछ आंखें बंद करके। कुछ लोरी जैसा फील देकर सुला देती हैं और जागने पर जहां सोए थे, वहीं से मिलती है। थोड़ी फिल्में सोचने पर मजबूत करती हैं और ज्यादातर कहती हैं कि दिमाग को सिनेमाहॉल के बाहर ही रखें।

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बैंक चोर आखिरी श्रेणी की फिल्म है। टीवी पर आए दिन चलने वाले चुटकुलेबाजी के कार्यक्रमों से आप ऊबते नहीं हैं तो बैंक चोर देख सकते हैं। यह चुटकुलेबाजी की ‘धूम’ है। कोई चोर, कोई सिपाही। मराठी माणुस चंपक (रितेश देशमुख) को पिता की बायपास सर्जरी के लिए धन चाहिए। जो नहीं है। शॉर्टकट मैसेज यह कि बैंक को लूटा जाए। वह दो किसी काम के लायक नहीं टाइप चोरों, गेंदा-गुलाब के साथ मिलकर एक बैंक में जा पहुंचता है।

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Movie Review: 'बैंक चोर' में सस्ती चुटकुलेबाजी की धूम

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bank chor

बिना अनुभव, बिना तालमेल काम में जितनी गड़बड़ियां किसी से हो सकती हैं वह इनसे होती है और देखते-देखते सब समझ जाते हैं कि इन लोगों से कुछ नहीं होगा। फिर बात बढ़ती है और बीआई, पुलिस और टीवी चैनल सब इस बैंक चोरों को घेर लेते हैं। अफसर सीबीआई अमजद खान (विवेक ओबेराय) और न्यूज रिपोर्टर गायत्री गांगुली उर्फ गागा (रिया चक्रवर्ती) माहौल को हंगामाखेज बनाते हैं।

चोर-पुलिस के बीच तोड़-पानी चलने लगता है। फिल्म का थ्रिल यह है कि इन सब बातों के पीछे भी कुछ चल रहा है, जो धीरे-धीरे सामने आता है। फिल्म की मुश्किल यह है कि इसमें हर लाइन को चुटकुला बनाने की कोशिश है, जिसमें से ज्यादातर फुस्सी साबित होते हैं। आप हंस नहीं पाते। अपनी ध्वनि में कुछ और लगने वाले टाइटल ‘बैंक चोर’ जैसे शब्द और संवाद कुछ कुछ कहने की कोशिश करते है।

Movie Review: 'बैंक चोर' में सस्ती चुटकुलेबाजी की धूम

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बैंक चोर

अगर आप इस तरह की कॉमेडी पसंद करते हैं तो कई बातें मजेदार लगेंगी। रितेश और विवेक मस्ती सीरीज की फिल्में करते आए हैं। हालांकि यहां वे उतने लाउड नहीं हैं। फिल्म में रितेश जरूर कहीं-कहीं प्रभावित करते हैं और कभी लगता है कि वह फिल्म को संभाल भी सकते हैं। परंतु ऐसा हो नहीं पाता।

पहले हिस्से में ही निर्देशक के हाथ से बाहर निकलती फिल्म दूसरे हिस्से में फिसल जाती है। खास तौर पर आखिरी के मिनटों में। विवेक का रोल और बेहतर हो सकता था। वह जरूरत से ज्यादा कड़े और कहीं-कहीं बिल्कुल अतार्किक हैं। रही सही कसर बाबा सहगल पूरी कर देते हैं। फिल्म को अच्छे से शूट किया गया है। बैकग्राउंड कहीं कहीं शोर जैसा एहसास कराता है।

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