हमशकल्स: जानिए कितनी घटिया है यह फिल्म?
साल के आखिर में जब सबसे खराब फिल्मों की सूची बनेगी तो साजिद खान की ‘हमशकल्स’ टॉप थ्री दावेदारों में होगी। हिंदी की सबसे घटिया फिल्मों में उनकी ‘हिम्मतवाला’ पहले से शुमार है। अब बारी ‘हमशकल्स’ की है। अगर आप किसी को टॉर्चर करना चाहते हैं तो ‘हमशकल्स’ के हॉल में बंद कर दें।
अगर आपने बहुत दिनों से सिर के बाल नहीं नोचें हैं तो यह फिल्म देखने जाइए। अगर कॉमेडी के नाम पर ट्रेजडी का नमूना देखना है तो यह फिल्म बेहतरीन नमूना है। इस फिल्म में एक विज्ञानी ‘माइंड आल्टरिंग ड्रग’ उर्फ मैड बनाता है, जिसे पानी में मिला कर पिलाए जाने पर दोनों नायक (सैफ और रितेश) कुत्तों की तरह भौंकने और बर्ताव करने लगते हैं। यह फिल्म भी माइंड आल्टरिंग ड्रग है जो दिमाग पर बुरा असर करती है। आप डायरेक्टर को काट खाना चाहते हैं और इसकी जिम्मेदारी खुद डायरेक्टर की है।
वैधानिक चेतावनी
यह फिल्म कई लिहाज से हानिकारक है। आपके अच्छे भले मूड का सत्यानाश कर देती है। यह आपकी जेब में किसी जरूरी काम में खर्च आने वाले पैसे का चूरा कर देती है। इस फिल्म को देखने के बाद आपको सिरदर्द खत्म करने के लिए दवा का सेवन करना पड़ता है।
साजिद ने एक दृश्य में दिखाया है कि पागलखाने का वार्डन पागलों को टॉर्चर करने के लिए ‘हिम्मतवाला’ दिखाता है। देखने वालों को कुर्सी से बांधा गया है। मुंह पर टेप चिपकाए गए हैं। ‘हमशकल्स’ ‘हिम्मतवाला’ से कम नहीं। कहीं कहीं तो उससे बीस साबित होती है। अगर आप हंसी के डोज की उम्मीद में इस फिल्म को देखने जाते हैं तो यूं समझिए कि रेगिस्तान में पानी की तलाश कर रहे हैं।
कॉमेडी का ‘क’ तक नहीं
क्या यह वाकई पागल हैं?
पागलखाने के बगल में एक और पागलखाना है जहां अशोक-कुमार के हमशक्ल बंद हैं। दोनों की मानसिक उम्र पांच साल की है। यहां पागलों की अदला-बदली हो जाती है। लेकिन कहानी में ट्विस्ट आता है जब पता चलता है कि दूसरे पागलखाने में कंस का भी एक हमशक्ल बंद है। बिजनेसमैन अशोक-कुमार कंस के हमशक्ल की मदद से मुकाबला जीतना चाहते हैं।
जब सब गड्मड्ड हो जाता है तो साइंटिस्ट अशोक-कुमार के क्लोन तैयार कर लेता है और कहानी में कंस का एक और हमशक्ल भी आ जाता है। इस तरह से तीन लोगों के दो-दो और हमशक्ल हो जाते हैं। हीरोइनें बीच-बीच में आती जाती रहती हैं। डायरेक्टर को इनका ग्लैमर कुछ कम लगा तो उन्होंने तीनों नायकों को भी करीब पंद्रह-बीस मिनट तक पर्दे पर बहुत भौंडे ढंग से महिला बनाए रखा। खैर, हमेशा की तरह अंत में कंस की पराजय होती है।
सिनेमा के विकास में साजिद का योगदान
अगर मिमिक्री ही सब कुछ है तो साजिद खान फिल्म इंडस्ट्री के सबसे बड़े डायरेक्टर हैं। उन्होंने पूरी फिल्म को मिमिक्री से आगे नहीं देखा। साजिद के लिए वक्त आ चुका है कि बंद कमरे में बैठ कर अपनी फिल्में देखें और आत्मचिंतन करें। फिल्म इंडस्ट्री में चमचों की कमी नहीं है, जो डायरेक्टर को खुश करने के लिए अंदर अंदर रोते हुए भी बाहर ठहाके लगाते हैं। साजिद इसी दुर्घटना का शिकार हैं। उन्हें सोचना चाहिए कि क्या अब वह अपना और परिवार का नाम डुबा रहे हैं? ऐसी फिल्में बनाने से बेहतर हैं कि फिल्में न बनाएं। जितने बजट की फिल्म वे बनाते हैं, उससे दस गुना कम बजट में आज नए, युवा और अपनी जमीन तलाश रहे निर्देशक कहीं बेहतर सिनेमा बना रहे हैं। साजिद अगर उनके लिए जगह छोड़ दें तो सिनेमा के विकास में ज्यादा योगदान दे सकेंगे।
ऐक्टिंग-वैक्टिंग छोड़ो
सैफ अली खान अपनी कॉमिक टाइमिंग के लिए याद नहीं किए जाते हैं। रितेश ने जरूर कुछ कॉमेडी फिल्मों में नाम कमाया है। लेकिन इस फिल्म में साजिद ने दोनों से जिस ढंग से काम कराया है, इनके के प्रशंसक जल्दी ही उसे भूल जाना चाहेंगे। गंदे ढंग से मुंह बनाना और लीजंड ऐक्टरों की नकल उतारने को ऐक्टिंग कहा जाएगा तो सारे ऐक्टिंग स्कूल बंद हो जाएंगे। सैफ-रितेश बुरी तरह से निराश करते हैं।
राम कपूर को शुरुआती आधे घंटे में देख कर यही लगता है कि वे फिल्म और टीवी के पर्दे में फर्क नहीं कर पा रहे हैं। वे फिल्म में टीवी की तरह ऐक्टिंग करते दिखते हैं। सतीश शाह ने जरूर बढ़िया काम किया, मगर जब सब बेकार हैं तो उनका क्या भला हो सकता है। अच्छा हुआ कि बिपाशा बसु खुद ही फिल्म के प्रमोशन से हट गई थीं क्योंकि उनके हिस्से तो यहां ग्लैमर भी नहीं आया। तमन्ना भाटिया और ईशा गुप्ता ऐसी ही फिल्में करती रहीं तो भविष्य की अपनी राह में खुद कांटे बिछा लेंगी।