Film Review: सरकार को आईना दिखाती 'कमांडो 2'
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-निर्माताः विपुल शाह
-निर्देशकः देवेन भोजानी
-सितारेः विद्युत जामवाल, अदा शर्मा, फ्रेडी दारुवाला, ईशा गुप्ता
रेटिंग**
देश की सेवा करने में जो मजा है वह किसी बात में नहीं है। यह डायलॉग कमांडो-2 के हीरो का है। यही इन दिनों बॉलीवुड की आवाज है। एक के बाद एक फिल्में देश प्रेम को प्रेरित कर रही हैं। अब आप कह सकते हैं कि ‘सिनेमा सरकार का आईना है।’ कहानी कहती है कि विक्की चड्ढा नाम के व्यक्ति के माध्यम से देश के कई भ्रष्ट लोगों ने काला धन मलेशिया में जमा कराया है। उसे पकड़ने से सब वापस मिल जाएगा।
प्रध्ाानमंत्री ने जनता से वादा किया है कि विदेश में छुपे काले धन को वापस लाएंगे और गरीबों के बैंक अकाउंट में जमा कराएंगे। कमांडो-2 का नायक करन (विद्युत जामवाल) विक्की चड्ढा को परास्त करके, सारा काला धन तीन करोड़ किसानों के सरकारी खातों में जमा करा देता है। सिनेमा में वादे-इरादे दो घंटे में निपट जाते हैं।
काले धन का उठाया मुद्दा
असली गुस्सा ‘फ्यूज’ हो जाता है। सच्चाई यह है कि विदेश में जमा काले धन की वापसी छड़ी घुमा कर होने वाला जादू नहीं है। हजारों-हजार अवैध खाते हैं। उद्योगपतियों, नौकरशाहों और नेताओं के भी। कमांडो में सिर्फ एक चेहरा, रणवाल (सतीश कौशिक) दिखता है।
उसने इस करतूत में गृहमंत्री लीला चौधरी (शेफाली शाह) के बेटे को भी उलझा रखा है। गृहमंत्री का तर्क है कि बेटे का नाम सार्वजनिक होने से व्यक्तिगत नुकसान तो होगा, सरकार भी गिर जाएगी। अतः कमांडो और उसकी टीम (फ्रेडी दारुवाला, अदा शर्मा, आदिल हुसैन) को मलेशिया में विक्की के काले कारोबार को खत्म करने का मिशन हरसंभव गुप्त रखना होगा।
अदा ने सिर्फ लिपस्टिक बदली
फिल्म अति-औसत और बोर करने वाली है। कहानी आश्वस्त नहीं करती। देश प्रेम, जनसेवा और काला धन एजेंडे जैसे उभरते हैं। किरदार साधारण हैं। उनकी बातों बेअसर हैं। विद्युत जामवाल जबर्दस्त एक्शन हीरो हैं परंतु यहां काम कम और बातें ज्यादा करते हैं। वह इतना मुस्कराते हैं कि चेहरे पर गुस्सा नहीं टिकता। अदा शर्मा ने हैदराबादी-हिंदी बोली है। वह बोलती हैं तो लगता है, कब चुप होंगी? ईशा गुप्ता ऐक्टर नहीं मॉडल हैं।
उन्हें बार-बार कपड़े और लिपस्टिक बदल कर अदाएं दिखाने का काम मिला है। इसे वह ठीक से नहीं कर पाईं। फिल्म में न ग्लैमर है, न रोमांस और न कॉमेडी। कमांडो-2 अनिल कपूर के फ्लॉप टीवी सीरियल ‘24’ जैसा आभास देती है। दूसरे हिस्से पर निर्देशक देवेन भोजानी की पकड़ बिल्कुल नहीं है। फिल्म अनियंत्रित हो जाती है। दूसरों के काले धन की अपने बैंक खाते में एंट्री का इंतजार बुरा नहीं है, परंतु फिलहाल अपनी मेहनत की कमाई बचाना बेहतर होगा।