Film Review: 'ऐ दिल है मुश्किल' कब तक चलेगा दोहराव
निर्माता-निर्देशकः करन जौहर
सितारेः रणवीर कपूर, अनुष्का शर्मा, ऐश्वर्या राय बच्चन, फवाद खान
रेटिंग **1/2
पुरानी बोतल में नई शराब। नया लेबल। क्या लड़का-लड़की सिर्फ दोस्त नहीं हो सकते? वर्षों से चल रहे इस फिल्मी सवाल को करन जौहर ने ऐ दिल है मुश्किल में नई पीढ़ी और भारत-पाकिस्तान के किरदारों के साथ बनाया। मगर हाल की पाकिस्तान विरोधी जनभावनाओं को देखते हुए उन्हें पाकिस्तान को पर्दे पर लखनऊ दिखाने को मजबूर होना पड़ा।
जबकि किरदारों अलीजा (अनुष्का शर्मा), सबा (ऐश्वर्या), डीजे अली (फवाज खान), ताहिर (गेस्ट रोलः शाहरुख खान) की भाषा साफ बताती है कि वे पाकिस्तान से हैं, लखनऊ से नहीं। हिंदी फिल्में बनाने वाले करन जौहर भारत से कितने कनेक्ट हैं, इसका पता इसी से चलता है कि उनकी कहानी में हीरो भी भारतीय नहीं है। अयान (रणबीर कपूर) लंदन में पैदा हुआ और पला है। ये सारे किरदार यूरोप में घूमते हैं।
वह भारत के नाम पर सिर्फ बॉलीवुड सिनेमा को पहचानते हैं। असल में करन की फेक्ट्री में बने पूरे सिनेमा में यह कृत्रिम भारतीयता दिखती है। मगर इसमें संदेह नहीं कि उसमें पैसों से आने वाले पल दो पल के ग्लैमर की चमक है और इसे देखने-पसंद करने वाले दर्शकों की संख्या कम नहीं।
प्यार यहां भी कैंसर है
जिन्हें करन की कभी अलविदा ना कहना पसंद आई थी, वह ऐ दिल है मुश्किल को भी पसंद कर सकते हैं क्योंकि अंततः प्यार यहां भी कैंसर है! जवानी में कदम रख चुके अयान का बचपना गया नहीं है और इसी नादानी में उसने तीन बार दिल पर चोट खा चुकी अलीजा को दिल दे दिया है। मगर अलीजा उसे दोस्त से ज्यादा नहीं मानती क्योंकि उसे प्यार का दर्द नहीं देना चाहती। अलीजा के लिए ‘प्यार में जुनून है और दोस्ती में सुकून है’। वह अयान के संग-साथ में सुकून पाती है।
अलीजा से दूर होकर अयान जब शायरी करने वाली, तलाकशुदा सबा से मिलता है तो उसकी खूबसूरती का आशिक हो जाता है। परंतु उसे प्यार नहीं कर पाता। फिल्म प्यार की तलाश करते अयान की कहानी है। जिसमें भावनाओं का ज्वार-भाटा थोड़ी-थोड़ी देर में आता-जाता रहता है। ऐ दिल है मुश्किल का पहला हिस्सा काफी देर तक दिशाहीन लफ्फाजी की तरह लगता है, जिसमें आप समझ नहीं पाते कि कहानी किस तरफ जा रही है।
अलीजा और अयान बार-बार शराबखानों, क्लबों और अपने कमरों में लौट कर आते हैं। इसके अलावा उनके जीवन में कुछ नहीं घटता। घटनाक्रम रफ्तार पकड़ता है डीजे अली की एंट्री के साथ, जब अलीजा उसके लिए अयान को अपने से दूर कर देती है। मगर कहानी में विस्तार नहीं है और वह चुनिंदा बिंदुओं पर ही दोहराती रहती है।
ऐश्वर्या राय हर दृश्य में कमबैक के लिए बेचैन नजर आती हैं
असल में पूरी फिल्म करन जौहर के पुराने सिनेमा से अलग कुछ नहीं कहती। उसकी भावनाएं भी नई नहीं हैं। रणबीर संभावनाओं के बावजूद बंधे हुए दायरे कुछ खास फिल्मी खेमों में काम कर रहे हैं। इसमें उनका नुकसान है। यह फिल्म उन्हें इतना सुकून जरूर देगी कि इसे देख कर दर्शक उनकी कुछ पिछली फिल्में भूल सकेंगे। कुछ इसे उनके कमबैक का भी नाम देंगे।
अनुष्का शर्मा के हिस्से लाउड अभिनय आया हैं। उनके चेहरे पर पहले ही संवेदनाओं की गहराई नहीं दिखती। यहां वह और कम हो गई है। ऐश्वर्या राय बच्चन यहां हर दृश्य में कमबैक के लिए बेचैन नजर आती हैं। अंततः फिल्म उन्हें निराश ही करेगी क्योंकि उनका किरदार बीच फिल्म में अप्रासंगिक होकर खो जाता है।
वह कहानी के बीच में आती हैं और बीच में ही लापता हो जाती हैं। फिल्म का गीत-संगीत जरूर इन दिनों आ रही अन्य फिल्मों के मुकाबले सुनने लायक है। करन अगर अपने सिनेमा के खांचों को तोड़ सकें तभी आगे कुछ बेहतर दे पाएंगे। वर्ना ऐसा सिनेमा उन्हें अब आगे नहीं ले जा सकेगा और दर्शक दोहराव को कब तक देखते रहेंगे?