मेरठिया गैंगस्टर्स समीक्षा: फिल्म की दो बड़ी मुश्किलें हैं
निर्माताः प्रशांत-प्रतीक तिवारी/शोएब अहमद
निर्देशकः जीशान कादरी
सितारेः आकाश दहिया, वंश भारद्वाज, जयदीप अहलावत, चंद्रचूड़ राज, जतिन शर्मा, शादाब कमाल, नुसरत भरूचा, संजय मिश्रा, बृजेंद्र काला, मुकुल देव
रेटिंग **
बॉलीवुड की गैंगस्टर फिल्में दशकों तक चले मुंबई के तस्करी के जमाने और भाईगिरी से आगे निकल उत्तर भारत में जड़ें जमा चुकी हैं। हाल के वर्षों में उत्तर भारत के अपराध जगत ने सिनेमा के लिए उर्वर जमीन का काम किया है।
निर्देशक अनुराग कश्यप ने दो खंडों में गैंग्स ऑफ वासेपुर जैसी फिल्म बना कर इसका शिखर स्थापित किया है। इसी वासेपुर के लेखक जीशान कादरी अब निर्देशक के रूप में सामने आए हैं। मेरठिया गैंगस्टर्स उनकी फिल्म है। निःसंदेह मेरठ वासेपुर नहीं है। दोनों के गैंगस्टरों में भी फर्क है। यहां अपराध खून में नहीं है और क्रूरता की जगह तत्कालिक उबाल ज्यादा है।
इन दो वजहों से कमजोर पड़ती है फिल्म
मेरठिया गैंगस्टर्स यह रेखांकित करते हुए शुरू होती है कि बेरोजगारी की कोख से अपराधी पैदा होते हैं। हर क्षेत्र में छोटे-मोटे प्रयास ही अंततः बड़ी कहानी गढ़ते हैं और अपराध की दुनिया भी इससे अलग नहीं। मेरठिया गैंगस्टर्स में ग्रामीण-कस्बाई परिवेश के छह युवक यूं तो नौकरी करना चाहते हैं, परंतु नौकरी दिलाने का धंधा करने वाले ठगों के शिकार बन जाते हैं।
यहां से उनके अपराधी बनने का सफर शुरू होता है और आगे चल कर लूट, अपहरण, फिरौती की दिशा में रफ्तार पकड़ लेता है। इन्हीं युवकों के बीच एक चेहरा युवती का है, जिसके पास नौकरी तो है मगर बोनस/प्रमोशन के लिए वरिष्ठ अधिकारी उससे ‘शारीरिक श्रम और कड़ी मेहनत’ की अपेक्षा करता है। अंततः युवती इन युवकों से ज्यादा शातिर साबित होती है!
मेरठिया गैंगस्टर्स के संवादों में सहजता के साथ चुटीलापन है, जो कई जगह गुदगुदाता है। इसके सभी अभिनेताओं ने अच्छा काम किया है। परंतु फिल्म की दो बड़ी मुश्किलें हैं जो इसे कमजोर बनाती हैं।
संगीत फिल्म का कमजोर पक्ष है, नहीं फबता रैना का गाना
इसके सभी अभिनेताओं ने अच्छा काम किया है। परंतु फिल्म की दो बड़ी मुश्किलें हैं जो इसे कमजोर बनाती हैं। पहली है इसका बेहद धीमा होना। निर्देशक ने कहानी कहने से ज्यादा दृश्य रचने पर जोर दिया। इंटरवेल के बाद फिल्म ढीली पड़ जाती है। दूसरी बात यह कि जीशान ने यहां गैंग्स ऑफ वासेपुर की तरह पात्रों का तो जमावड़ा लगा दिया लेकिन उनके किरदारों को गहराई देने में नाकाम रहे।
संगीत फिल्म का कमजोर पक्ष है। क्रिकेटर सुरेश रैना का गाना भी नहीं फबता। जबकि इसे शूट अच्छे से किया गया है। मेरठिया गैंगस्टर्स का अंत पारंपरिक गैंगस्टर फिल्मों की तरह न होकर सस्पेंस थ्रिलर जैसा है, जो किसी को चौंका सकता है तो किसी को बेकार लग सकता है। पहली फिल्म में जीशान अपनी मौलिकता तलाश करते हुए कहानी और कैमरे के संग एक साथ कई प्रयोग करते हैं।
कच्चेपन के बावजूद वह उम्मीद जगाते हैं। जैसे हॉरर फिल्मों का खास दर्शक वर्ग होता है, वैसे ही गैंगस्टर फिल्मों के भी शौकीन होते हैं। भले ही उनकी संख्या ज्यादा न हो परंतु पर्दे पर सामूहिक प्रयासों से अपराध होते देखने में उन्हें ‘किक’ मिलती है। मेरठिया गैंगस्टर्स की उन्हें यह किक देगी।