'मक्खी' बॉलीवुड की, रंग-ढंग हॉलीवुड के

नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क Updated Fri, 12 Oct 2012 04:36 PM IST
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'मक्खी'' इसी साल तेलुगू में रिलीज हुई फिल्म 'एगा' का हिन्दी डब्ड वर्जन है। साउथ की ज्यादातर फिल्में बदले की कहानी पर आधारित होती हैं। इन फिल्मों के नायक किसी सामाजिक न्याय के लिए नहीं बल्कि खुद या परिवार के साथ हुए अन्याय के लिए लड़ते हैं। बदले के यह विषय इतने आम होते हैं कि दर्शक इन्हें खुद से कनेक्ट कर लेते हैं।
'मक्खी' भी ऐसे ही एक बदले की कहानी दिखाने वाली फिल्म है। फर्क बस इतना है कि तेलुगू की इस फिल्म को तकनीक के जरिए हॉलीवुड फिल्मों का टच देने का प्रयास किया गया है। चूंकि तेलुगू में यह प्रयोग सफल रहा है इसलिए आगे भी इस पैटर्न की फिल्में देखने को मिल सकती हैं। मसाला फिल्मों की तरह ही 'मक्खी', आपको हंसाने के साथ भावुक करने और रोमांटिक होने के पूरे मौके देती है। तकनीकी और एक्शन का तड़का बदस्तूर बीच-बीच में चलता रहता है। इंटरवल के बाद यह फिल्म तेज है और दर्शकों को बांधे रखती है और कुछ भी सोचने-समझने का मौका नहीं देती।


कहानी
फिल्म की कहानी तीन किरदारों के इर्द-गिर्द घूमती है। जॉनी (नैनी), बिंदु (समंथा) से दो साल से एक-तरफा प्यार कर रहा होता है। इसी बीच बिजनेसमैन सुदीप (सुदीप) बिंदु की जिंदगी में एक गलत इरादे के साथ दाखिल होता है। इधर बिंदु धीरे-धीरे जॉनी से अपने प्यार का इकरार करना शुरू करती है। बिंदु को किसी कीमत पर पाने की मंशा रखने वाला सुदीप को जब जॉनी अपने रास्ते का कांटा लगता है तो वह उसे मार देता है। यहीं से बदले की कहानी शुरू होती है।

यही जॉनी 10 दिन के बाद पुनर्जन्म लेकर 'मक्खी' के रूप में पैदा होता है। उस 'मक्खी' को अपनी पिछली जिंदगी में हुईं सारी घटनाएं याद होती हैं। 'मक्खी' सुदीप से बदला लेना चाहता है। 'मक्खी' बिंदु को भी इस बात का एहसास करा देता है वह पुनर्जन्म में जॉनी था। 'मक्खी' बिंदु की मदद से कैसे सुदीप को मारता है यही इस फिल्म की कहानी है।


निर्देशन
निर्देशक एसएस राजमौली का पूरा फोकस जॉनी के साथ हुए अन्याय से दर्शकों को जोड़ने पर रहा है। जब जॉनी 'मक्खी' का रूप बनाकर आता है तो वहां भी इस बात का ख्याल रखा गया है। 'मक्खी' की बनावट और रंगों का चयन ऐसा है जिससे दर्शकों का भावुक जुड़ाव 'मक्खी' के साथ हो। यह 'मक्खी' फिल्म की हीरो लगे इसलिए निर्देशक ने उससे एक्शन कराने के साथ कॉमेडी भी कराई है। 133 मिनट की यह फिल्म शुरुआत के 30 मिनट कमजोर रहती है। फिल्म में दर्शकों की दिलचस्पी तब बढ़ती है जब 'मक्खी' सुदीप से बदला लेना शुरू करता है। इसके पहले यह पहले यह एक घिसी-पिटी ट्राइ एंगल लव स्टोरी की तरह चलकर दर्शकों को उबाती रहती है।

अभिनय
खलनायक होते हुए भी सुदीप को फिल्म में नायक जैसे फुटेज और तवज्जो मिली है। यह खलनायक नायक की तरह स्टाईलिश भी है। सुदीप इस रोल में फिट बैठे हैं। चूंकि सुदीप हिंदी फिल्मों में भी नजर आते रहते हैं इसलिए दर्शकों का उनसे जुड़ाव एक नायक की तरह होता है। कुछ एक जगह ओवरएक्टिंग छोड़कर सुदीप की ऐक्टिंग अच्छी रही। कहीं-कहीं पर वह 'सिंघम' में प्रकाश राज द्वारा की गई ऐक्टिंग की कॉपी करते दिखे हैं। नैनी के हिस्से में जितना था उन्होंने उसे औसत तरीके से दिखा दिया। समंथा भी एक समर्पित प्रेमिका के रूप में अपने रोल के साथ्ा न्याय करती हैं


संगीत
फिल्म के फर्स्ट हॉफ को रोमांटिक बनाने के लिए कुछ गाने डाले गए हैं। इन गानों का पिक्चराइजेशन तो अच्छा है पर इनके लिरिक्स सुनने में अच्छे नहीं लगे हैं। यह गाने कहानी को रोकते हुए लगे हैं। इंटरवल के बाद जो गाने बैंगग्राउड में बजे हैं वह दृश्यों को जस्टीफाई करते हैं। फिल्म के आखिरी में एक हिंदी फिल्मों का रिमिक्स भी डाला गया है।


क्यों देखें
यदि आप साउथ की परंपरागत लाउड फिल्म को हॉलीवुड स्टाइल स्पेशल इफेक्ट्स के तड़के के साथ देखना चाहते हो तो।


क्यों न देखें
अगर साउथ इंडियन स्टाइल रिवेंज ड्रामा पसंद नहीं है। इस शुक्रवार को दूसरी कई हिंदी फिल्में हैं तो यदि आपको 'मक्खी' के बदले की कहानी में इन्ट्रेस्ट नहीं है तो आप के पास दूसरी चॉयस भी है।

निर्देशकः एसएस राजमौली
कहानीः एसएस राजमौली, जर्नादन महर्षि
कलाकारः सुदीप, नैनी, समंथा
संगीतः एम एम करीम

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