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अच्छा लग सकता है आपको यह चक्रव्यूह

रोहित मिश्र

Updated Wed, 24 Oct 2012 03:36 PM IST
film review chakravyuh
यदि हम नक्‍सल आंदोलन के खिलाफ नहीं हैं तो फिर उसके साथ हैं। इस विचारधारा से देखने पर प्रकाश झा की फिल्म चक्रव्यूह नक्सलियों की हर उस सोच या वारदात को जायज और जरूरत बताने का प्रयास करती है जिसे समाज बुरा मानता है।
पूरी फिल्म में नक्‍सलियों के तौर-तरीकों को बुरा मानकर उसके खिलाफ लड़ने वाला फिल्म का नायक फिल्म के अंतिम सीन में नक्सलियों की सोच के साथ खड़ा दिखता है। फिल्म किसी अंजाम या निष्कर्ष पर नहीं पहुंचती है। ऐसा जानबूझ कर ‌किया जाता है। फिल्मकार इस बात को लेकर बेहद सतर्क रहे हैं कि वह किसी पक्ष या विपक्ष में खड़े न दिखें।

फिल्‍म के अंत में आया एक वाइसओवर बताता है कि नक्‍सल समस्या कैसे अपना आकार बड़ा कर रही है। समस्या हल होने के बजाय उसका चक्रव्यूह गहरा होता जा रहा है। फिल्म चक्रव्यूह नक्‍सल समस्‍या और सरकार के साथ उसके ट्रीटमेंट को भले ही बहुत बेहतर तरीके से न दिखा पाई हो लेकिन यह दो दोस्तों की मानसिक उलझन को बेहतर तरीके से दर्शाती है।

यह प्रकाश झा की सफलता है उन्होंने नक्‍सल आंदोलन जैसे जटिल विषय को मनोरंजक और रोचक बनाकर पेश किया। इस विषय को फिल्मी बनाने की कोशिश कहीं-कहीं बचकानी भी लगती है। कभी-कभार फिल्‍म के नक्‍सली वैसे ही बनावटी दिखते हैं जैसे करण जौहर की फिल्मों के स्कूल गोइंग स्टूडेंट।


कहानीः

चूंकि फिल्म का विषय बड़ा और जटिल था इसलिए इसे दो दोस्तों की कहानी बताकर दिखाने का प्रयास किया गया। इन दो दोस्तों के माध्यम से सरकार और नक्‍सलियों का पक्ष रखने की कोशिश की गई है। आईपीएस पुलिस अधिकारी आदिल(अर्जुन रामपाल) की पोस्टिंग नक्सल समस्या से पीड़ित क्षेत्र नंदीगांव में होती है।

यहां पुलिस का नेटवर्क पूरी तरह से तबाह हो चुका है। एक उद्योगपति उस क्षेत्र में अपना उद्योग लगाना चाहते हैं। सरकार की कोशिश के बाद नक्सलियों की वजह से उन्हें सफलता नहीं मिल पा रही है। आदिल को इस काम का जिम्‍मा सौंपा जाता है।

आदिल का दोस्त कबीर(अभय देओल) जिसने कभी आदिल के साथ पुलिस की ट्रेनिंग भी की थी नक्‍सलियों के बीच आदिल का मुखबिर बनकर शामिल हो जाता है। वह मुखबिर इसलिए बनता है ताकि वह नक्सलियों की मूवमेंट की हर खबर आदिल को दे सके।

फिल्म वहां से रोचक होनी शुरू होती है जब कबीर का मन नक्सलियों के पक्ष में बनना शुरू हो जाता है। एक साथी महिला नक्सली जूही(अंजलि पाटिल) के प्रति उसके मन में एक प्रेम भी पैदा होता है। नक्‍सल के पक्ष या विपक्ष की यह वैचारिक लड़ाई इंटरवल के बाद दो दोस्तों की लड़ाई में तब्दील हो जाती है। स्थितियां बदलती जाती हैं।

नक्सलियों के बड़े नेता रहे राजन(मनोज बाजपेई) के गिरफ्तार होने के बाद कबीर नक्सलियों का एक बड़ा नेता बनकर उभरता है। फिल्म का क्लाइमेक्स इसी बात में है कि यह दोनों दोस्त अपनी दोस्ती को आगे बढ़ाते हैं या अपनी वैचारिक सोच को।

अभिनयः

अभिनय के लिहाज से अर्जुन रामपाल और अभय देओल दोनों ने ही बेहतरीन काम किया है। राजनीति फिल्म में नाना पाटेकर की भूमिका जिस तरह से अंडरप्ले हो गई थी कुछ वैसा ही हाल मनोज बाजपेई का इस फिल्म में रहा है। उनके हिस्से न तो ज्यादा फुटेज आए हैं और न ही संवाद। अपनी संक्षिप्त भूमिका में ही सही वह रोल के खांचे में फिट बैठते हैं।

नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की गोल्ड मेडलिस्ट रहीं अं‌जलि पाटिल ने इस फिल्म से अपना डेब्यू किया है। उनके पास फिल्म की नायिका ईशा गुप्ता से ज्यादा मौके रहे हैं। वह प्रभावित भी करती हैं। ईशा गुप्ता औसत रहीं हैं।

मधुर भंडारकर और प्रियदर्शन की तरह प्रकाश झा के पास जूनियर कलाकारों की अपनी टीम है। गंगाजल से लेकर चक्रव्यूह तक वही सारे किरदार अलग-अलग रूप में दिखते हैं। कोई किसी फिल्‍म में पुलिसवाला बन जाता है तो कोई नेता। इन कलाकारों ने अभिनय तो अच्छा किया है पर एक बासीपन इनके साथ जुड़ता जा रहा है। छोटी सी भू‌मिका में ओमपुरी भी अपनी इमेज के अनुरूप ही रहे हैं।

निर्देशनः

एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ने का मतलब वहां पर तंबू लगाकर बैठ जाना नहीं होता है। उस चोटी से उतरना ही होता है। मृत्युदंड, अपरहण और राजनीति जैसी फिल्में प्रकाश झा का शिखर रही हैं। यह फिल्म उस शिखर पर उन्हें दोबारा नहीं लौटा पाती। पर हां दर्शकों को निराश भी नहीं करती।

पूरी फिल्म खामोशी से नक्‍सल समस्या के लिए सरकार को दोषी और नक्सलियों को जायज ठहराने का प्रयास करती है। यह प्रकाश की खूबी है ‌कि वह संवाद और घटनाओं से चुपचाप दर्शकों को अपनी इस सोच के साथ कर लेते हैं। नक्सल समस्या को बहुत कम या न जानने वाले दर्शक जब फिल्म देखकर निकलते हैं तो वह नक्सलियों के खिलाफ नहीं बल्कि उनके जैसा सोच रहे होते हैं। फिल्म के अच्छे संवादों के लिए अंजुम राजाबली और सागर पांड्या को भी बधाई मिलनी चाहिए।

संगीतः

यह प्रकाश झा की पहचान बनती जा रही है कि इंटरवल के बाद जब फिल्म थोड़ी गंभीर होती है तो वह उसे एक आइटम नंबर डालकर थोड़ा फिल्‍मी करते हैं। यह फिल्मी कोशिश चक्रव्यूह में निराश करती है। समीरा रेड्डी पर फिल्माया गाना पूरी तरह से बेझिल है।

टाटा, बिरला, अंबानी और बाटा बोल वाला चर्चित गीत प्रभावित तो जरूर करता है पर गीत में वैसी कशिश और विट देखने को नहीं मिली जैसी गुलाल में ‌पीयूष मिश्रा ने अपने लिखने और गाने में पैदा की थी।

क्यों देखे

फिल्म चर्चित और गंभीर विषय पर बनी है इसके लिए इसे देखा जाना चाहिए। इसके अलावा य‌दि आपकी दिलचस्पी नक्सल की समस्या या उसके समाधानों पर जाने की नहीं है तो भी इसे दो दोस्तों की बनती-बिगड़ती कहानी के लिए देख सकते हैं।

क्यों न देखें

यह एक सार्थक सिनेमा है। कई जगह फिल्मी होने के बाद भी संभव है कि इसका विषय आपको अपने साथ कनेक्‍ट न करे। हल्के विषयों पर कुछ दूसरी फिल्में भी आपके लिए ही हैं।

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