फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Entertainment ›   Movie Review ›   Film Pai an amazing thrill

पाईः दुनिया जहां से लौटने का मन नहीं करता

Fri, 23 Nov 2012 03:50 PM IST
रोहित मिश्र
रोहित मिश्र Updated Fri, 23 Nov 2012 03:50 PM IST
विज्ञापन
Film Pai an amazing thrill
अच्छी किताबों पर अच्छी फिल्म कई बार नहीं बन पाती हैं। 'लाइफ ऑफ पाई' इस मिथक को तोड़ती है। यैन मार्टल के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित इस फिल्म को आंग ली ने इतने बेहतर तरीके से बनाया है कि यह फिल्म, किताब से ज्यादा प्रभावकारी लग सकती है। फिल्म का सबसे सशक्त पक्ष सिनेमेट्रोग्राफी है।
विज्ञापन


समुद्व के दृश्य कहीं भयावह लगते हैं तो कहीं मनमोहक। भारत के कलाकारों के साथ भारत में ही फिल्माई गई यह फिल्म रोमांच और कल्पना के ऐसे सागर में ले जाती है जहां से आप लौटकर आना नहीं चाहते। एक लाइफ बोट में समुद्री आपदाओं के साथ उसी बोट में सवार शेर से भी जूझना वाकई दिलचस्पी जगाता है।
विज्ञापन


कहानी
यह कहानी पाई (सुरज शर्मा) की जो भारत के पॉंडिचेरी शहर में अपने परिवार के साथ रहता है। उसके पिता का एक सरकारी जमीन पर ज़ू है। सिर्फ जू के जानवर उनके होते हैं। बेहतर मौकों की तलाश में पाई और उसके माता-पिता (तब्बू और आदिल हुसैन )अपने जानवरों के साथ एक जहाज़ पर कैनेडा के लिए निकल पड़ते है।
विज्ञापन
विज्ञापन


अचानक भारी तूफान से जहाज़ पलट जाता है। इस जहाज से निकली एक लाइफबोट में पाई के साथ उसके साथ लाए गए चार जानवर (शेर,ज़ेब्रा,लक्कड़बग्घा,बनमानुष) ही बच पाते हैं। कुछ ही देर की यात्रा में जेब्रा, लकड़बग्घा और बनमानुष मर जाते हैं। आगे का अंधा सफर पाई शेर के साथ जिसका नाम रिचर्ड पॉर्कर होता है के साथ तय करता है।

पाई को समुद्री आपदाओं, भूख और प्यास के साथ शेर से भी जूझना होता है। शेर से बचने के लिए पाई कई तरकीबें आजमाता है। इस अनोखी यात्रा में ऐसा मुकाम भी आता है जब पाई और शेर दोनों ही अपना-अपना जीवन एक-दूसरे से मिलकर बचा रहे होते हैं। अंततः एक लाइफ बोट को एक किनारा मिलता है। शेर जंगल में निकल जाता है और पाई को लोग बचा लेते हैं।

अभिनय
इस फिल्म की पटकथा और उसका ट्रीटमेंट इतना जबर्दस्त है कि कलाकारों को सिर्फ अपनी भूमिका निभा भर देनी है। फिल्म में एक-दूसरे से कहे गए संवाद बहुत कम है। हर कलाकार ज्यादातर संवाद से खुद से कर रहा होता है। यह एक तरह का एकालाप होता है।

फिल्म के नायक पाई(सूरज शर्मा) को बैकग्राउंड के संवादों के अनुरूप अपनी भाव-भंगिमाएं बनानी होती हैँ। यह काम सूरज शर्मा ने बखूबी किया है। बोट पर समुद्री तूफानों के बीच विश्वास हारने और फिर उम्मीद पा लेने के दृश्यों को सूरज ने बहुत ही खूबसूरती के साथ फिल्माया है। छोटी से बोट में शेर के साथ तिकड़म बैठाने, उससे बचकर उसकी मदद भी करने जैसे दृश्यों में भी सूरज विश्वास जगाते हैं।

सीनियर पाई की भूमिका में इरफान खान अपनी चिर-परिचित संवाद अदायगी के साथ हैं। उनके हिस्से अभिनय नहीं बस संवाद बोलना था। जिसे उन्होंने चेहरे के उतार-चढ़ाव के साथ बेहतर तरीके से किया है। तब्बू की भूमिका फिल्म में कुछ कमजोर है। तब्बू से बेहतर और ज्यादा काम आदिल हुसैन के पास रहा है जिसे वह पूरा भी करते हैं। निर्देशक आंग ली ने तो शेर से भी अच्छा अभिनय करवा लिया है।

निर्देशन
हॉलीवुड की जो भी फिल्में भारत के बैकग्राउंड पर बनी है उन फिल्मों में भारत की धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था पर तंज और व्यंग्य देखने को जरूर मिलता है। फिल्म के शुरुआती 20 से 25 मिनट में आंग ली ने भी इस परंपरा को निभाया है। बच्चे पाई के माध्यम से उन्होंने हिंदु ही नहीं विविध धर्म और उन पर टिकीं आस्थाओं पर एक बौद्विक किस्म बहस की है। कुछ को यह हिस्सा थोड़ा उबाऊ भी लग सकता है।

एक बार जैसे ही कहानी अपनी मुख्य धारा में पहुंच जाती है फिर फिल्म बिल्कुल जादुई लगनी शुरू हो जाती है। आंग ली ने कुछ कमाल संवादों से किया है, कुछ कमाल उनके फिल्मांकन में और बहुत सारा दृश्यों की सिनेमेटोग्राफी में। जहाज के डूबने का दृश्य जानबूझ कर बहुत लंबा नहीं फिल्माया गया। ऐसा करने से यह टाइटैनिक की नकल लग सकता था। निर्देशक के कारनामें इसके बाद शुरू होते हैं।

एक छोटी सी बोट में अलग-अलग मिजाज के चार जानवरों को एक साथ बैठाना। उन जानवरों के मनोविज्ञान और जरूरतों को पाई की जरूरतों व सोच के साथ जोड़ना वाकई एक कठिन और चुनौतीपूर्ण काम था। जिसे आंग ली सफलता के साथ दिखाया। समुद्व की आगे की यात्रा एक जैसी होनी थी इसलिए पाई के सामने कब कौन सी चुनौती आए, कितनी देर तक उसे परेशान करें और पाई कैसे उससे निकले इसका ताना-बाना भी मोहक अंदाज में बुना गया।

पाई का शेर के साथ पटरी बैठाने के दृश्यों को भी कुछ कॉमिक अंदाज से बुना गया। पाई और शेर की दोस्ती भी होती है पर 'हाथी मेरे साथी' वाले अंदाज में नहीं। निर्देशन ने दर्शक के दिमाग में हर समय बोझ नहीं डाला। उस खौफनाक सफर में भी आंग छिटपुट हास्य का छिड़काव करते रहे। फिल्म के आखिरी पांच मिनटों को थोड़ा और नाटकीय बनाया जा सकता था।

क्यों देखें
एक ऐसी फिल्म के लिए जो रोमांचित करने के साथ आपको जीवन की कई सारी फिलॉसिफी भी देती चलेगी। एक ऐसा दुनिया को देखने के लिए जहां से आप लौटकर आना नहीं चाहेंगे। बावजूद कि यह दुनिया खतरों से भरी है।


क्यों न देखें
यदि आप फिल्म का टिकट उसकी स्टारकॉस्ट को देखकर खरीदते हों। साथ ही यदि आपको फिल्म में थोड़ा नाच, थोड़ा गाना, थोड़ी फाइट, थोड़ा एक्शन, थोड़ा ड्रामा और थोड़ी ओवरएक्टिंग चाहिए ही।
विज्ञापन
विज्ञापन
सबसे विश्वसनीय Hindi News वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें Entertainment News से जुड़ी ब्रेकिंग अपडेट। मनोरंजन जगत की अन्य खबरें जैसे Bollywood News, लाइव टीवी न्यूज़, लेटेस्ट Hollywood News और Movie Reviews आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़।
 
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed