Equalizer 3 Review: फिर देवदूत बनकर लौटे डेंजेल वाशिंगटन, फ्रेंचाइजी की आखिरी किस्त में फुलटू एक्शन धमाल
देवदूत किसी ने नहीं देखे। और, अगर देखे भी होंगे तो शायद ही कभी कोई उन्हें समय रहते पहचान पाता होगा। कभी किसी संकट में जब कोई राह नजर न आए और कोई अनजान शख्स आए, मदद करके लापता हो जाए, वही देवदूत है। ईश्वर में आस्था रखने वाला। इंसानियत का सम्मान करने वाला और दूसरों के दुख अपना समझने वाला। कुछ कुछ, अपने लिए जिये तो क्या जिये, तू जी ऐ दिल जमाने के लिए..., सरीखा। हॉलीवुड फिल्म सीरीज ‘इक्वलाइजर’ का नायक रॉबर्ट मैककॉल ऐसा ही तो है। यूएस मरीन और डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी में काम कर चुका रॉबर्ट यायावर है। वह सुकून की तलाश में हैं। हिंसा उसकी तलाश में कभी चैन नहीं लेती। वह कैवल्य पाना चाहता है। कायनात उसे पाना चाहती है। दोनों एक दूसरे से दूर रह ही नहीं पाते।
धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि...
कहते हैं कि हिंसा की पराकाष्ठा में ही धर्म की प्रतिध्वनि होती है। जीवन जीने का सबसे बड़ा संदेश श्रीमद्भगवतगीता भी तो महाभारत की ही उत्पत्ति है। न कौरव और पांडव लड़ते और न ही कृष्ण के सामने वह समय आता जब वह अर्जुन को गीता का उपदेश देते। योग और कर्म का संयोग ही धर्म का मूल है। फिल्म सीरीज ‘इक्वलाइजर’ का रॉबर्ट मैककॉल भी इसी का अनुसरण करते करते तीसरी किस्त में इटली आ पहुंचा है। फिल्म शुरू होती है इटली की उस जगह सिसली से जो मारियो पूजो के उपन्यास ‘गॉडफादर’ के जरिये दशकों से दुनिया भर को मालूम है। रॉबर्ट यहां एक मिशन पर है। खतरनाक अपराधियों को वह चुटकी बजाते ढेर कर सकता है लेकिन पीठ पर उसे गोली मारता है एक बच्चा, जिसे वह मासूम समझकर छोड़ देता है। नियति भी ऐसी ही है। सावधानी हटी। दुर्घटना घटी। होश आने पर वह खुद को एक गुमनाम से कस्बे अल्टामोंटे में पाता है जहां स्थानीय माफिया ने तबाही मचा रखी है। उसे एक और धर्मयुद्ध लड़ना है जिसकी परिणति वहां होती है जहां एक धर्म यात्रा निकल रही है।
...विनाशाय च दुष्कृताम्
फिल्म सीरीज ‘इक्वलाइजर’ की खासियत ये है कि इसकी कहानी दुनिया के किसी भी ऐसे शहर की हो सकती है जहां दुष्टों ने सीधे साधे लोगों को आतंकित कर रखा है। परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्, ही तो युग युग से देवदूत के आने का आधार रहा है। यहां भी कहानी वही है। इस संरचना के मूल से फिल्म ‘इक्वलाइजर 3’ भी अमृत पाती है। कहने को तो ये इस सीरीज की आखिरी कड़ी है लेकिन दर्शकों को अगर कभी ये बताया जा सके कि रॉबर्ट मैककॉल की अपनी कहानी क्या है? उसकी अंगूठी की दास्तान क्या है? क्यों वह टी बैग वाली चाय पीने से पहले मेज पर नैपकिन को करीने से सजाता है? क्यों चम्मच वह एक तय स्थान पर रखना पसंद करता है? तो ये कहानी और दिलचस्प हो सकती है। इस सीरीज की प्रीक्वल की संभावना इस सीरीज की हर फिल्म जगाती है, लेकिन अभी तक ये बस संभावना ही है।
डेंजेल वाशिंगटन का सम्मोहन
रॉबर्ट मैककॉल के रूप में डेंजेल वाशिंगटन पांच साल बाद बड़े परदे पर लौटे हैं। उनका निश्छल चेहरा और आंखों में एक अलग तरह की विरक्तता इस किरदार का सम्मोहन जगाती है। निहत्थे होकर भी कद्दावर दुश्मनों को चारों खाने चित करने देने की कला उसके प्रशिक्षण से भले आती हो लेकिन एक उम्रदराज शख्स को हिंसा का जवाब हिंसा देने का गुणसूत्र सिनेमा में भौगोलिक सीमाओं को मिटाता पूरी दुनिया में राज कर रहा है। भारतीय सिनेमा ने ये सूत्र अब फिर से पकड़ा है। ‘पठान’, ‘जवान’, ‘गदर 2’, ‘जेलर’, ‘टाइगर’ सब इसी सूत्र को ही तो आगे बढ़ाती फिल्में हैं। बस ‘इक्वलाइजर’ सीरीज में अनावश्यक बिल्डअप नहीं है। कानफाड़ू पार्श्वसंगीत नहीं है और न ही यहां हीरो को जवान दिखाने के लिए डी एजिंग तकनीक का प्रयोग है। ‘इक्वलाइजर 3’ सीधा सच्चा और अपने मूल रूप का एक्शन है। और, यही इस फिल्म सीरीज की जान है।
प्रीक्वल का रहेगा इंतजार!
निर्देशक एन्ट्वान फ्युकुआ बीते 15 साल से एक्शन सिनेमा आगे बढ़ा रहे हैं। 1998 में रिलीज अपनी पहली फिल्म ‘रिप्लेसमेंट किलर्स’ से उन्होंने अपना ब्रांड बनाया और ‘इक्वलाइजर’ सीरीज की तीनों फिल्मों के नायाब निर्देशन से इसे मजबूत किया है। बीच बीच में वह ‘द बुलेट ट्रेन’ जैसी मेगा बजट फिल्में भी अपना बैंक बैलेंस मजबूत करने के लिए करते रहे हैं लेकिन फ्युकुआ और वाशिंगटन की जोड़ी का जवाब नहीं है। जैसा कि फ्युकुआ चाहते भी रहे हैं, अगर इन दोनों ने मिलकर इस सीरीज की कोई प्रीक्वल बनाई तो उसे देखने का आनंद ही कुछ और होगा। इधर, फिल्म ‘इक्वलाइजर 3’ में डॉक्टर बने रेमो गिरोनी कथा विस्तार को मानवीय स्पर्श देते हैं तो गाया के जिम्मे फिल्म का रूमानी पहलू विकसित करने की जिम्मेदारी है। रॉबर्ट और अमीना के बीच ऐसा कुछ विस्तार में तो नहीं होने पाता, लेकिन दोनों के बीच पनपता रिश्ता दर्शकों को कुछ पल का सुकून जरूर देता है। सीआईए एजेंट के तौर पर डकोटा फैनिंग आवश्यक तनाव बनाने में कामयाब होती हैं। फिल्म में इटली के कई स्थानीय कलाकारो को भी मौका मिला है जिनमें इयूजेनियो मास्ट्रान्ड्रिया का काम प्रभावी है। तकनीकी रूप से भी फिल्म औसत से बेहतर है। खासतौर से रॉबर्ट रिचर्डसन की सिनेमैटोग्राफी और कोनराड बफ का संकलन व संपादन फिल्म को खासी मजबूती देता है।