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Hindi News ›   Entertainment ›   Movie Reviews ›   Chhello Show Review Pan Nalin Bhavin Rabari, Bhavesh Shrimali, Richa Meena, Dipen Raval

Chhello Show Review: सिनेमा के जरिये आशा और मासूमियत का मेल, नौ साल के बच्चे के सुनहरे सपनों की कहानी

Thu, 13 Oct 2022 02:22 PM IST
Virendra Mishra वीरेंद्र मिश्र
Updated Thu, 13 Oct 2022 02:22 PM IST
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Chhello Show Review Pan Nalin Bhavin Rabari, Bhavesh Shrimali, Richa Meena, Dipen Raval
छेलो शो - फोटो : अमर उजाला
Movie Review
छेलो शो 
कलाकार
भविन रबारी , भावेश श्रीमाली , ऋचा मीणा , दीपेन रावल ,  परेश मेहता , राहुल कोली और किशन परमार आदि 
लेखक
पैन नलिन 
निर्देशक
पैन नलिन 
निर्माता
धीर मोमय , मार्क ड्यूल , पैन नलिन और सिद्धार्थ रॉय कपूर 
रिलीज डेट
14 अक्टूबर 2022
रेटिंग
3/5

गुजराती में छेलो का मतलब अंतिम होता है इसलिए इसे 'छेलो शो: द लास्ट फिल्म' का नाम दिया गया है। ये कहानी एक नौ साल के ऐसे बच्चे की है जो यह जानना है कि आखिर थियेटर में प्रोजेक्टर से फिल्में चलती कैसे हैं? अपनी इसी सोच और जुनून के चलते वह गांव के बच्चों की मदद से साइकिल के पहिए, इलेक्ट्रिक बल्ब और भी तमाम तरह के सामान को इकट्ठा करके प्रोजेक्टर तैयार करने की कोशिश करता है। फिल्म को अगले वर्ष होने वाले ऑस्कर पुरस्कार समारोह में भारत की तरफ से आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में भेजा गया है। विवाद इस पर इस बात का कि ये फिल्म एक भारतीय निर्माता की बनाई फिल्म है ही नहीं। यही नहीं फिल्म पर एक विदेशी फिल्म से प्रेरित होने और बीते साल ही रिलीज हो चुके होने का भी गंभीर आरोप है। भारत सरकार से इस पूरी प्रक्रिया में दखल देने की शिकायतों के बीच फिल्म सिनेमाघरों तक पहुंच चुकी है।

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Chhello Show Review Pan Nalin Bhavin Rabari, Bhavesh Shrimali, Richa Meena, Dipen Raval
छेलो शो - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

सिनेमा की नई तकनीक से गई रोजी रोटी 
सिनेमा में तकनीकी रूप से काफी बदलाव आया है। इससे हजारों लोगों को रोजगार मिले हैं तो सिनेमा की तकनीक में आए बदलावों की वजह से कई लोगों ने अपनी रोजी रोटी खोई भी है। पहले सिनेमा हॉल में फिल्में प्रोजेक्टर के माध्यम से चलती थी और फिल्मों की रील हर सिनेमा हॉल में पहुंचाई जाती थीं। आज डिजिटल के माध्यम से एक ही जगह से हजारो सिनेमा हॉल में फिल्में पहुंच जाती हैं। फिल्म ‘छेलो शो’ में प्रोजेक्टर चलाने वाले फजल की नौकरी इसलिए चली जाती है कि उसने नई तकनीकी के हिसाब से खुद को अपडेट नहीं किया। उसे इस बात का मलाल है कि वह ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं है और अगर उसे अंग्रेजी आती तो शायद उसकी नौकरी नहीं जाती। नई तकनीकी आने से सारा काम अंग्रेजी में होता है। फिल्म ‘छेलो शो’  बताती है कि किसी काम में अगर हम अपनी आधी से ज्यादा जिंदगी सौंप दे और फिर दूसरे काम की शुरुआत शून्य से करें तो जिंदगी कितनी जटिल हो जाती है। 

 

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Chhello Show Review Pan Nalin Bhavin Rabari, Bhavesh Shrimali, Richa Meena, Dipen Raval
छेलो शो - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

कहानी प्रोजेक्टर बनाने की 
फिल्म ‘छेलो शो’ की कहानी गुजरात राज्य के सौराष्ट्र के एक गांव चलाला में रहने वाले एक नौ साल के बच्चे समय  के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे सिनेमा देखना बहुत पसंद है। कहानी जिस समय में सेट की गई है उस वक्त प्रोजेक्टर के जरिए सिनेमा देखा जाता था। यह छोटा सा बच्चा फजल नाम के एक सिनेमा प्रोजेक्टर तकनीशियन को रिश्वत देकर एक हॉल के प्रोजेक्शन बूथ में प्रवेश कर जाता है। इसी तरह से यह कई फिल्में देखता है। फिल्मे देखते देखते उसके मन में यह जानने की इच्छा होती है कि आखिर फिल्में प्रोजेक्टर के माध्यम से चलती कैसे है? वह अपने तरीके से गांव के बच्चों की मदद से प्रोजेक्टर तैयार करता है और रील चुरा कर खुद के द्वारा बनाए तकनीक से गांव के पास एक खंडहर में फिल्में देखता है। लेकिन, अभी भी वह ऐसी तकनीक की खोज में है जिससे फिल्म के दृश्य के साथ साथ आवाज भी सुनाई दे।  

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Chhello Show Review Pan Nalin Bhavin Rabari, Bhavesh Shrimali, Richa Meena, Dipen Raval
छेलो शो - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

नई तकनीक के साथ बहुत सारे मौके 
फिल्म ‘छेलो शो’ देश में तेजी से बदलते समय के हिसाब से जरूरी पीढ़ियों के आपसी भरोसे और संवाद व विश्वास की भी कहानी है। मां बाप चाहते हैं कि उसका बच्चा पढ़ लिखकर इस काबिल बन जाए। उनकी इच्छा के विपरीत चलने पर बालक की पिटाई भी खूब होती है, लेकिन जब वह देखते हैं कि उनका बेटा कबाड़ से सामान इकट्ठा करके प्रोजेक्टर बनाकर उसपर फिल्में चला रहा है तो, वह बहुत भावुक हो जाते है। वह इस बात को समझ जाते हैं कि उनका बेटा करना क्या चाहता है और, उसे पढ़ाई के लिए अहमदाबाद भेज देते हैं।  लेकिन, इससे पहले जब समय को पता चलता है कि डिजिटल तकनीकी के आने से सिनेमा हॉल के प्रोजेक्टर और रील्स कबाड़ में बेचे जा रहे हैं तो वह बहुत दुखी होता है। प्रोजेक्टर को गलाकर करके बर्तन बनाए जाते हैं और रील्स को गलाकर करके रंग बिरंगी चूडियां बन रही है। समय उन रंग बिरंगी चूड़ियों में बॉलीवुड के सभी बड़े सितारों को देखता है। उसको समझ में आ जाता है कि परिवर्तन ही संसार का नियम है। पुरानी  तकनीक खत्म होती है और नई तकनीक बहुत सारे नए मौके लेकर आती है।  

Chhello Show Review Pan Nalin Bhavin Rabari, Bhavesh Shrimali, Richa Meena, Dipen Raval
छेलो शो - फोटो : Social Media

आशा और मासूमियत का मेल 
निर्देशक पैन नलिन ने फिल्म को हद दरजे तक वास्तविकता के करीब रखने के लिए पुरानी सेल्युलाइड हिंदी फिल्में और प्रोजेक्टर चलाने वाले तकनीशियन भी हैं। फिल्म ‘छेलो शो’ की कहानी मासूमियत भरे बचपन के इर्द-गिर्द घूमती है। फिल्म में समय का किरदार भाविन  रबारी  ने निभाया है। भाविन के अलावा दूसरे बच्चों ने भी बहुत ही अच्छा काम किया है। इसके अलावा फिल्म के ज्यादातर कलाकार नए हैं।  लेकिन सबका  अभिनय एक मंझे हुए कलाकार की लगता है। फिल्म की कहानी आशा और मासूमियत के ऐसे मेल से बनी है जिसे देख कर कोई पसंद करेगा। निर्देशक के रूप में पैन नलिन ने अच्छा प्रयास किया है। स्वप्निल सोनवणे की सिनेमैटोग्राफी, श्रेयस बेलतंग्दय और प्रवीण भट्ट का संपादन ठीक है। सायरिल मॉरीन का संगीत उतना कुछ खास प्रभाव नहीं छोड़ता है लेकिन फिल्म के विजुअल इफेक्ट और बैकग्राउंड म्यूजिक प्रभावशाली हैं।  

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