Bhookhe Bhajan Na Hoye Gopala Review: रमेश तलवार का स्टैंडिग ओवेशन, सागर सरहदी ने छह दशक पहले लिखा आज का सच
मुंबई शहर वैसे तो सिनेमा का शहर है लेकिन नाटकों की जैसी प्रतिष्ठा इस शहर में है, वैसी शायद ही दुनिया के किसी शहर में देखी गई हो। दुनिया भर घूमने के बाद ये तो समझ आता है कि नाटक, ब्रॉडवे या म्यूजिकल शोज वीकएंड पर लोगों के दिल बहलाने का सबब बनते हैं। लेकिन, कार्य दिवसों पर भी नाटक हों और उनके शोज हाउसफुल हों, ऐसा शायद मुंबई में ही होता होगा। नामचीन लेखक सागर सरहदी जिनकी लिखीं ‘सिलसिला’, ‘नूरी’, ‘कभी कभी’ और ‘चांदनी’ जैसी फिल्मों ने पूरी एक पीढ़ी को सिनेमा देखना सिखाया है। ‘बाजार’ का निर्देशन करके वह हिंदी सिनेमा के नामचीन निर्देशकों में शुमार हुए और ‘भूखे भजन न होए गोपाला’ जैसे नाटक लिखकर रंगमंच की प्रतिष्ठित दुनिया में। सागर सरहदी ने कोई 10 बड़े नाटक और एक दर्जन एकांकी लिखे हैं लेकिन जितना लोकप्रिय उनका नाटक ‘भूखे भजन न होए गोपाला’ रहा है, उतना शायद दूसरा कोई नहीं।
और, इन सबके बीच एक अन्ना हजारे टाइप सबके आदरणीय गुरुजी भी हैं। नेता उनके साथ फोटो खिंचाकर धन्य होना चाहते हैं। वह सब कुछ भुलाकर अपने जीवन को धन्य करने की कोशिश करने में लगे हैं। खाना बंद कर चुके हैं। प्रायश्चित सा कर रहे हैं। नेताओं को उसमें भी मौका दिख रहा है। लालची कारोबारी उसमें भी गुणाभाग कर रहे हैं। नाटक ‘भूखे भजन न होए गोपाला’ दिखाता है कि साल 1966 से लेकर साल 2024 तक में कुछ नहीं बदला है। गरीब को मुफ्त का राशन भले मिल रहा हो, लेकिन उसकी सम्मान की भूख का कहीं कुछ नहीं हुआ। मुफ्त के राशन से गरीबी भले मिट सकती हो लेकिन गरीब की चिंता वैसी ही है। पिछड़ापन वैसा ही है। उसका दोहन वैसा ही है। व्यवस्था पर तीखा तंज कसता ये नाटक इतना सटीक है कि दर्शक शुरू से लेकर आखिर तक इसे बिना विचलित हुए देखता रह जाता है।
मुंबई के पृथ्वी थिएटर में हुए इसके मंचन में एम एस सथ्यू का बनाया सेट वैसा का वैसा दिखा। एक पेड़ उसके चौगिर्द चबूतरा और नेता की मूर्ति वाले चौराहे पर फूटती साजिशों की हांडी। कुलदीप सिंह का संगीत भी नाटक ‘भूखे भजन न होए गोपाला’ में अपनी पूरी लय में इस नाटक में हमेशा से रहता ही है। नाटक देखने का जो असली सुख होता है, वह भी यहां मिला यानी कि इसके अभिनेताओं का अपने किरदारों का जीवंत मंचन। रोमियो, प्रिंस और मामा यानी नाटक के तीनों मुख्य पात्रों के किरदार क्रमश: निभाए शिवकांत लखनपाल, विकास रावत और पुनेश त्रिपाठी ने। जो ये नाटक पहले देख चुके हैं उन्हें पता है कि रोमियो और मामा के किरदार इस नाटक के लिए क्या मायने रखते हैं।
हर समस्या का समाधान निकाल लेने वाले रोमियो के किरदार में शिवकांत लखनपाल का अभिनय पूरे नाटक में सबसे प्रभाव दिखा। वह हालात से भागने वाले या हालात से परेशान होने वाला इंसान नहीं है। रोमियो जिंदगी से इश्क करता है। उम्मीद उसकी महबूबा है। और, फुटपाथ पर साथ रहने वाला मामा उसका वह दोस्त है जिसकी आड़ी तिरछी जिंदगी को वह सीधा करने की कोशिश में लगा रहता है। अखबार बांचना उसे खूब भाता है। प्रिंस को भी वह बौद्धिक भोजन देता रहता है। और फिर एक दिन उनके इस चबूतरे पर आ विराजमान होते हैं महाभाव जी। यहां से नाटक ‘भूखे भजन न होए गोपाला’ अपने दूसरे खंड में प्रवेश करता है। महाभावजी, नेता और प्रेस रिपोर्टर मिलकर दर्शकों को वह सब दिखाते हैं जो अक्सर असल के बाबा, नेता और मीडिया जनता से छिपाये रखने की कोशिश में रहते हैं। नाटक बताता है कि बदलते वक्त में सब कुछ परदे के पीछे तय किया हुआ नाटक है, जिसे भोली जनता हकीकत समझ लेती है।
नाटक ‘भूखे भजन न होए गोपाला’ में मसूद सबसे वरिष्ठ अभिनेता हैं और उनकी मौजूदगी रंगमंच का तेज बढ़ाती है। महाभावजी का चरित्र उन पर बिल्कुल सटीक बैठता है। अनशन के विभिन्न चरणों में बिगड़ते स्वास्थ्य का वह अपनी देह भाषा और आवाज के स्पंदन से ऐसा असर पैदा करते हैं कि कई बार लगता है कि दर्शक दिल्ली के रामलीला मैदान में हैं और अनशन महाभावजी नहीं बल्कि अन्ना हजारे कर रहे हैं। वहां अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोध से जिस पार्टी का जन्म हुया, उसके नेता भ्रष्टाचार के आरोप में ही जेल जा रहे हैं, यहां महाभावजी का भाव मामा में आ गया है। पुनेश त्रिपाठी ने नाटक के अंतिम क्षणों में अपनी अभिनय प्रतिभा का नायाब नमूना पेश करते हुए खूब तालियां बटोरीं। और, रिपोर्टर के रोल में प्रियल घोरे भी याद रह जाने लायक अभिनय करने में सफल रहीं। नाटक लोगों को इतना पसंद आया कि देर तक इसके कलाकारों के लिए तालियां बजाईं और जब निर्देशक रमेश तलवार मंच पर आए तो लोगों ने खड़े होकर उनका तालियां बजाते हुए अभिनंदन किया।