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Baby Play Review: फिर बयां हुई फिल्म जगत में हाशिये के कलाकारों की हकीकत, पूजा और रवि चौहान का प्रभावी अभिनय

Sat, 08 Jun 2024 12:32 PM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Sat, 08 Jun 2024 12:32 PM IST
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Baby Play Hindi Adaptation Review by Pankaj Shukla Vijay Tendulkar Ravi Sharma Pooja Mishra Ravi Chauhan
बेबी (हिंदी नाटक) - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
Movie Review
बेबी (हिंदी नाटक)
कलाकार
पूजा मिश्रा , इंद्र सिंह राजपूत , रवि शर्मा , रवि चौहान और आदित्य सिंह
लेखक
विजय तेंदुलकर
निर्देशक
रवि शर्मा
निर्माता
द क्ले थियेटर कंपनी
मंचन
7 जून 2024
रेटिंग
3/5

कान फिल्म फेस्टिवल में इस साल जिस एक हिंदी फिल्म की सबसे ज्यादा चर्चा रही है, वह रही विजय तेंदुलकर लिखित फिल्म ‘मंथन’। फिल्म की पहली रिलीज के समय तेंदुलकर को इस फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ पटकथा लेखक का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला। ‘शांतता कोर्ट चालू आहे’, ‘घासीराम कोतवाल’ और ‘सखाराम बाइंडर’ जैसे चर्चित और कालजयी नाटकों के लेखक विजय तेंदुलकर को साल 1970 में ही साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिल चुका था। उनके नाटकों की अंतर्धारा इतनी मजबूत है कि सिनेमा के छात्रों के लिए उनके लिखे नाटकों का सामाजिक संदेश 21वीं सदी के 24वें साल में भी उतना ही सामयिक है, जितना आज से कोई पांच दशक पहले रहा होगा। मुंबई फिल्म नगरी की कड़वी सच्चाइयों को परत दर परत उधेड़ते विजय तेंदुलकर के नाटक ‘बेबी’ के हिंदी अनुकूलन का यहां मुंबई में शुक्रवार से शुरू हुए सृजन संगम नाट्य महोत्वस के पहले दिन मंचन हुआ। भीतर तक झकझोर देने वाले इस नाटक में नाट्यशास्त्र के वे सारे रस हैं, जो किसी नाटक को संपूर्ण बनाते हैं।

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Baby Play Hindi Adaptation Review by Pankaj Shukla Vijay Tendulkar Ravi Sharma Pooja Mishra Ravi Chauhan
बेबी (हिंदी नाटक) - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
वंचितो और शोषितों की कहानी

द क्ले थियेटर कंपनी के नाट्य महोत्सव सृजन संगम के तहत हुए नाटक ‘बेबी’ के मंचन का अहम पहलू ये रहा कि इसे बहुत सीमित संसाधनों के साथ जिस क्रिएटिव अड्डा नामक स्थान पर मंचित किया गया, वह आराम नगर का इलाका संघर्षशील कलाकारों का भी बरसों से अड्डा रहा है। नाटक में काम करने वाले कलाकार भी इस मंचन के जरिये अभिनय की विधा को साधने की कोशिश कर रहे हैं। जिन्होंने ये नाटक पढ़ रखा है, उनके लिए कहानी चिर परिचित है। और, जिन्होंने इसे नहीं पढ़ा है, वे भी मुंबई फिल्म जगत की कड़वी सच्चाइयों से वाकिफ तो होंगे ही। कहानी बेबी नामक एक युवती की है जिसका संघर्ष किसी की भी आत्मा को कचोट सकने में सक्षम है। ये सिनेमा के हाशिये पर पड़े बेसहारा, लाचार और शोषितों की कहानी है।

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Baby Play Hindi Adaptation Review by Pankaj Shukla Vijay Tendulkar Ravi Sharma Pooja Mishra Ravi Chauhan
बेबी (हिंदी नाटक) - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
झिलमिलाती दुनिया की दमघोंटू असलियत

नाटक ‘बेबी’ का मुख्य किरदार बेबी ही है। भले घर की वह एक ऐसी बेटी है जो अपना सब कुछ अभिनय को सौंप चुकी है। मन भी और तन भी। उसे पुरुष को प्रसन्न करने का बस एक ही जरिया पता है और वह है उसके सामने आते ही अपना सर्वस्व उस पर निछावर कर देना। एक ऐसी मानसिक उत्तेजना उसके भीतर समा चुकी है, जिसमें उसे पता भी नहीं होता कि ये उत्तेजना सुख की है, दुख की है, करुणा की है या फिर तिरस्कार, घृणा, उपेक्षा और तिरस्कार की। उसकी नीयत की आड़ नियति पर उसका बार बार दिखने वाला भरोसा है लेकिन, फिर उसके जीवन में एक बहार सी आती दिखती है। उसे लगता भी है कि वह आजाद हो सकती है। उसे सहारा मिलता है फिल्म जगत में काम करने वाले एक सहायक निर्देशक का जो उसे हीरोइन बनाने के सपने दिखाता है और उपन्यासों की काल्पनिक दुनिया में खोई रहने वाली बेबी उसे भी अपनी नियति समझकर सब कुछ निछावर करने को तैयार दिखती है।

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बेबी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
संसाधनों के दायरे में रवि शर्मा का निर्देशन  

निर्देशक रवि शर्मा ने विजय तेंदुलकर के मराठी नाटक ‘बेबी’ का जो हिंदी अनुकूलन नाट्य महोत्सव सृजन संगम के लिए तैयार किया है, उसके मंचन में स्थान और संसाधनों की सीमित व्यवस्थाएं भी किसी किरदार की तरह महसूस होती हैं। और, देखा जाए तो स्थान और संसाधन ही ‘बेबी’ के जीवन का प्रमुख आधार भी हैं। वह जहां रहती है, वह स्थान उस शिवप्पा का है जिसने उसका सात दिन, सात रात तक बलात्कार किया। कैद से छूटकर आया भाई पूछता भी है, ‘क्या तुमको किसी ने यहां रखा है?’ संभ्रांत परिवार की एक बेटी के साथ जुड़ा रखैल शब्द जब पहली बार भाई अपनी बहन के लिए बोलता है तो बेबी बनी पूजा मिश्रा के चेहरे पर दिखने वाली घुटन और त्रासदी दर्शक भी महसूस करते हैं।

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पूजा मिश्रा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
यही है राइट च्वाइस, बेबी!

नाटक का शीर्षक किरदार निभाने वाली पूजा मिश्रा के साहस की दाद देनी होगी जिन्होंने एक बेहद कसे हुए स्थान में अपनी अभिनय प्रतिभा को एक शोषित महिला के दर्द के साथ जीवंत बना दिया। हालांकि, इस नाटक में वर्णित दृश्यों में से कई दृश्यों में उन्हें साथी कलाकारों की शारीरिक हिंसा का भी सामना करना पड़ा और बदलते माहौल में किसी स्त्री पात्र को बिना शारीरिक पीड़ा पहुंचाए भी इस तरह के दृश्य सिर्फ अभिनय प्रतिभा के बल बूते किए जा सकते हैं, लेकिन इन दृश्यों में भी पूजा ने पूरे साहस और आत्मविश्वास के बल पर दर्शकों पर अपना प्रभाव छोड़ा। शिवप्पा की कैद में बुलबुल सी छटपटाती बेबी दूसरे ही पल में अपने भाव बदलकर एक मनमोहिनी जिस तरह से बनती है, उन दृश्यों में पूजा मिश्रा का अभिनय अपनी छाप छोड़ता है।

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बेबी (हिंदी नाटक) में रवि चौहान व पूजा मिश्रा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
रवि चौहान की बेहतरीन अदाकारी

नाटक ‘बेबी’ के राघव, बेबी, पिंटू और शिवप्पा जैसे पात्र जहां बेबी को अपना ही आलोचक और अपनी ही निंदा करने पर मजबूर कर देने वाली स्थितियों की तरफ धकेलते हैं, वहीं नाटक का एक पात्र कर्वे इस कथा को जीवन के दूसरे ही रंग दिखाता है। कर्वे फिल्म कंपनी में सहायक निर्देशक है। वह फिल्म के सेट पर मौजूद लोगों की पृष्ठभूमि, उनकी क्षेत्रीय पहचान और उनके काम करने के तरीकों पर तंज भी कसता है, लेकिन एक एक्स्ट्रा के तौर पर काम करने वाली बेबी को हीरोइन बनने के सपने भी दिखाता है। कर्वे के किरदार में रवि चौहान का अभिनय इस नाटक का दूसरा शीर्ष बिंदु है। बेबी और कर्वे जब एकांत में मिलने की योजना बनाते हैं और इस मिलन की रात के जो भी दृश्य हैं, वे पूजा शर्मा और रवि चौहान के आपसी सामंजस्य की ऐसी धुरी बनाते हैं जिस पर सुस्त चाल से चल रहा नाटक लट्टू की तरह नाच उठता है।

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बेबी (हिंदी नाटक) - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
नाटक जब हो, तब दरवाजे बंद रहने चाहिए

रवि शर्मा की संरचना और निर्देशन में हुए इस नाटक के मंचन का एक अहम पहलू रहा इसमें लाइव म्यूजिक का प्रयोग। वैभव और कौस्तुभ ने मंच के एक कोने पर ही बैठकर संगीत सृजन किया। और, कलाकारों के मनोभावों के अनुसार बदलते नाटक की गति को स्थापित करने में अच्छा सहयोग दिया। आयरा उपाध्याय की साउंड डिजाइन प्रभावशाली रही। प्रकाश संयोजन में बेहतरी की गुंजाइश ‘बेबी’ के मंचन के दौरान दिखी। नाटक के मंचन का सबसे कमजोर पहलू रहा मंचन शुरू होने के बाद भी नाट्यगृह में लोगों का आना जाना लगा रहना। इससे न सिर्फ दर्शकों का ध्यान बार बार भंग होता रहा, बल्कि नाटक में काम कर रहे कलाकारों का ध्यान भी भटका ही होगा।
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