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Akelli Review: आईएसआईएस से जूझती ‘अकेली’ की रोमांचक कहानी, नुसरत भरूचा की अभिनय यात्रा का नया मील का पत्थर

Wed, 23 Aug 2023 12:06 PM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Wed, 23 Aug 2023 12:06 PM IST
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Akelli Review in Hindi by Pankaj Shukla Pranay Meshram Nushrratt Bharuccha Tzachi Halevy Tsahi Gunjan Saxena
अकेली रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
Movie Review
अकेली
कलाकार
नुसरत भरूचा , निशांत दहिया , साही हलेवी , राजेश जैस और आमिर बाउट्रॉस आदि
लेखक
गुंजन सक्सेना , आयुष तिवारी , असीम अहमद अब्बासी और प्रणय मेश्राम
निर्देशक
प्रणय मेश्राम
निर्माता
अपर्णा पडगांवकर , शशांत शाह और विकी सिडाना आदि
रिलीज:
25 अगस्त 2023
रेटिंग
3/5

‘प्यार का पंचनामा’ सीरीज, ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ और ‘ड्रीम गर्ल’ जैसी सुपरहिट फिल्मों का हिस्सा रहीं अभिनेत्री नुसरत भरूचा हिंदी सिनेमा में जो करने की कोशिश कर रही हैं, उसके लिए वह न सिर्फ तारीफ की हकदार हैं बल्कि वह एक मिसाल भी हैं, उन तमाम युवतियों के लिए जो बिना किसी गॉडफादर या बिनी किसी फिल्मी पृष्ठभूमि के बड़े परदे पर अपनी छाप छोड़ने के लिए अकेली कड़ी मेहनत कर रही हैं। नुसरत की नई फिल्म ‘अकेली’ की कहानी का गुणसूत्र विकट परिस्थितियों में एक युवती के अकेले ही संघर्ष करने की कहानी है। कुछ कुछ नुसरत के अपने व्यावसायिक संघर्ष जैसी। ‘क्वीन’ और ‘कमांडो 3’ जैसी फिल्मों में सहायक निर्देशक रहे प्रणय मेश्राम के लिए भी ये उनके करियर की पहली बतौर निर्देशक लंबी छलांग है। किसी बड़े स्टूडियो का साथ नहीं है और फिल्म फिर भी रिलीज होने जा रही है। हिंदी सिनेमा के मौजूदा परिवेश में यही एक बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है।

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Akelli Review in Hindi by Pankaj Shukla Pranay Meshram Nushrratt Bharuccha Tzachi Halevy Tsahi Gunjan Saxena
अकेली रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

सुषमा स्वराज के कालखंड की कहानी
फिल्म ‘अकेली’ की मूल कहानी का कालखंड तब का है जब बीजेपी की दिग्गज नेता सुषमा स्वराज ने विदेश मंत्री रहते हुए मुसीबत में फंसे तमाम भारतीयों की घर वापसी के लिए खुलकर मदद की थी। ऐसी ही एक कहानी फिल्म ‘मिसेज चटर्जी वर्सेस नार्वे’ में अपने बच्चों को वापस पाने के लिए लड़ती भारतीय महिला की रही है। इस बार कैमरा इराक के हालात की तरफ घूमा है। केदारनाथ हादसे में मारे गए लोगों के परिवारों की भी इसमें एक क्षेपक लेकिन महत्वपूर्ण कथा है, जिन्हें बीमा कंपनी इसलिए मुआवजा देने से इंकार कर देती है क्योंकि जो लोग मृत घोषित किए गए, उनके शव ही राहत एजेंसियां नहीं खोज सकीं। बहुत मार्मिक सूत्र है ये कहानी का और इस पर अलग से भी कभी कोई फिल्म बने तो अचरज नहीं होना चाहिए क्योंकि अदालत में भी यहां बीमा कंपनी ही जीतती है। इसी परिवार की एक युवती ज्योति कर्ज चुकाने और घर चलाने के लिए विदेश जाने का फैसला करती है। देश में लगी नौकरी वह एक बुजुर्ग की नौकरी बचाने के लिए कुर्बान कर चुकी है। घर वह मस्कट जाने की बात बताती है जबकि जाती है वह मोसुल (इराक)। अच्छे वेतन के लालच में। वह मोसुल पहुंच तो जाती है लेकिन कुछ ही दिनों बाद वहां आईएसआईएस का हमला होता है और तमाम दूसरी युवतियों के साथ वह भी बंधक बनाकर आतंकवादियों के ‘हरम’ में पहुंचा दी जाती है।

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Akelli Review in Hindi by Pankaj Shukla Pranay Meshram Nushrratt Bharuccha Tzachi Halevy Tsahi Gunjan Saxena
अकेली रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

क्या बीतती होगी उन 72 हूरों पर?
खाड़ी देशों में सक्रिय आतंकवादियों के युवतियों के अपहरण की कहानी इसके पहले ‘द केरल स्टोरी’ में भी दिख चुकी है। 72 हूरों वाला सपना ये आतंकवादी मरने के पहले ही पूरा कर लेना चाहते हैं। कहानी ये एक हूर के नजरिये से देखी जाए तो सिहरा देने वाली है। क्या एक हूर सिर्फ एक जिस्म है, उन आततायियों के भोग के लिए, जिन्होंने सैकड़ों मासूमों की नृशंस हत्या कर दी। फिल्म में एक दृश्य ऐसा भी है जहां आतंकवादी इस्लाम को मानने वालों को ही शिया और सुन्नी में बांटकर कत्लेआम करते दिखते हैं। फिल्म ‘अकेली’ ऐसे तमाम सवाल उठाते हुए चलती है। अकेली युवतियां यहां सिर्फ भोग के लिए अपहृत की जा रही हैं। कहानी का आधार अच्छा है लेकिन ज्योति यहां ज्वाला नहीं बनती है। वह मुश्किल परिस्थितियों में होने वाले सहायक हादसों के सहारे वापस अपने देश पहुंच पाती है। देखा जाए तो उसके पास करने को ऐसा कुछ नहीं है जो उसे ‘गदर 2’ का तारा सिंह जैसा आभामंडल दे सके। ये हालात की मारी और हालात से ही मदद पाने वाली ये एक साधारण युवती की कहानी है जिसमें लार्जर दैन लाइफ कुछ है तो वह है ज्योति की हिम्मत न हारने की जिद और किसी भी तरह अपनी मां के पास वापस लौटने की इच्छाशक्ति।

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अकेली रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

सिनेमा का साहसिक प्रयोग
अपने कथ्य के हिसाब से फिल्म ‘अकेली’ एक साहसिक प्रयोग है। प्रयोग सफल हों या विफल लेकिन प्रयोग करते रहने का भी अपना एक अलग आनंद है और इस लिहाज से नुसरत भरूचा और फिल्म के निर्देशक प्रणय मेश्राम दोनों तारीफ के हकदार हैं। दुबई के हवाई अड्डे पर प्रणय को मिली एक गुमनाम युवती की ये एक सच्ची दास्तां बताई जाती है। प्रणय और गुंजन सक्सेना ने मिलकर फिल्म की पटकथा लिखी है। एक दुर्दांत आतंकवादी को सोते में हथकड़ियां पहनाने और पूरे हवाई अड्डे की बिजली सिर्फ एक स्विच से बंद कर देने जैसे कुछ कमजोर दृश्यों को छोड़ दें तो बाकी फिल्म की पटकथा अपनी रफ्तार बनाए रखती है। हां, फिल्म को इसके संवादों से बिल्कुल मदद नहीं मिलती। इसी पटकथा पर अगर किसी भाषाई पकड़ रखने वाले लेखक ने बोलियों और मुहावरों से मदद पाने वाले संवाद लिखे होते तो फिल्म का असर ही कुछ और होता। उज्बेकिस्तान की लोकेशन में रचे गए मोसुल का फिल्मांकन पुष्कर सिंह ने काफी उम्दा तरीके से किया है। ड्रोन फोटोग्राफी से भी उन्हें काफी मदद मिली है। हां, फिल्म का संपादन और संगीत गड़बड़ है।

Akelli Review in Hindi by Pankaj Shukla Pranay Meshram Nushrratt Bharuccha Tzachi Halevy Tsahi Gunjan Saxena
अकेली रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

नुसरत की अभिनय यात्रा में मील का पत्थर
और, अब बात फिल्म की मुख्य नायक नुसरत भरूचा की। नायिका मैं इसलिए नहीं लिख रहा क्योंकि वह किसी हीरो की बगलगीर के किरदार में नहीं हैं। वह खुद ही कहानी की हीरो हैं। असल की भी वह हीरो हैं। नए निर्देशकों के साथ खूब काम करती हैं। ये अलग बात है कि हिट होने के बाद यही निर्देशक उन्हें छोड़ उन हीरोइनों के आगे पीछे डोलने लगते हैं जिनके काम हिंदी सिनेमा की दिग्गज ब्रांड कंपनियां संभालती हैं। लेकिन, जीवन का असली संघर्ष यही है। बार बार खुद को साबित करने की भी हालांकि एक सीमा होती है लेकिन जिनका कोई नहीं होता, उनका खुदा सिर्फ उनकी हिम्मत और मेहनत होती है। ‘छोरी’ और ‘जनहित में जारी’ जैसी फिल्मों में अपनी काबिलियत दिखा चुकीं नुसरत के करियर में फिल्म ‘अकेली’ भी एक मील का पत्थर है। बॉक्स ऑफिस पर फिल्म का क्या होगा, कहना मुश्किल है, लेकिन ‘गदर 2’ की आंधी में फिल्म का टिकट खिड़की तक पहुंचना ही अपने आप में नुसरत की पहचान की एक बड़ी जीत है।

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