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Ae Watan Mere Watan Review: सारा ने डुबोई कांग्रेस नेता की कहानी, करण की कोशिशों पर इन गलतियों से फिरा पानी

Thu, 21 Mar 2024 09:57 PM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Thu, 21 Mar 2024 09:57 PM IST
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Ae Watan Mere Watan Review by Pankaj Shukla Sara Ali Khan Kannan Iyer Sparsh Shrivastava Emraan Hashmi
ऐ वतन मेरे वतन - फोटो : अमर उजाला
Movie Review
ऐ वतन मेरे वतन
कलाकार
सारा अली खान , स्पर्श श्रीवास्तव , अभय वर्मा , गोदान कुमार , आनंद तिवारी , सचिन खेडेकर , मधु राजा और इमरान हाशमी
लेखक
कन्नन अय्यर और दाराब फारूकी
निर्देशक
कन्नन अय्यर
निर्माता
 करण जौहर , अपूर्व मेहता और सोमेन मिश्रा
रिलीज
21 मार्च 2024
रेटिंग
2/5

देश में चुनावी माहौल है। कांग्रेस अलग अलग सूबों में ढहते अपने किले सहेजने में लगी है और ऐसे में विदेशी ओटीटी प्राइम वीडियो पर प्रसारित हुई है एक ऐसी कहानी जो हमें बताती है कि देश की आजादी में सिर्फ गांधी, नेहरू और चंद दूसरे प्रसिद्ध लोगों का ही खून-पसीना शामिल नहीं है बल्कि ये आजादी मिली है उन तमाम ऐसे गुमनाम नायकों की भी हिम्मत और हौसलों से जिन्होंने अपने अपने इलाकों में डटे रहते हुए अंग्रेजी अत्याचार का मुकाबला किया। 24 साल पहले यह लोक छोड़ गईं गांधीवादी कांग्रेस नेता उषा मेहता की कहानी कहती फिल्म ‘ऐ वतन मेरे वतन’ शुरू से राम मनोहर लोहिया को नेहरू की नीतियों का विरोधी बताते हुए चलती है। जर्मनी से उनकी पढ़ाई को भी रेखांकित करती है और ये बताने की कोशिश करती है कि देश को आजादी असल में उन दिनों के संघर्ष से मिली, जब ये तमाम बड़े नेता तो जेल में थे। उषा मेहता को साल 1998 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया था।

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Ae Watan Mere Watan Review by Pankaj Shukla Sara Ali Khan Kannan Iyer Sparsh Shrivastava Emraan Hashmi
सारा अली खान और स्पर्श - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

जज की बेटी की बगावत
ब्रिटेन के उन दिनों के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल के दिन रात गुणगान करने वाले जज की बेटी की देशभक्त बेटी उषा मेहता की कहानी को फिल्म ‘ऐ वतन मेरे वतन’ उनके बचपन से पकड़ती है। स्कूल में अध्यापक बच्चों को नमक बांट रहे हैं। महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह के बारे में बता रहे हैं और पुलिस वहां आ धमकती है। जज शर्मिंदा है कि उनकी बेटी पुलिस से पिटकर आई है। बिटिया बड़ी होती है। अपने साथियों के साथ कांग्रेस की बैठकों में शामिल होती है। गांधीजी बंबई (अब मुंबई) आते हैं तो वह ब्रह्मचर्य की शपथ लेती है। ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के एलान के वक्त उषा ग्वालिया टैंक मैदान में दिखती है और कांग्रेस पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद रेडियो के जरिये कांग्रेस की बातें लोगों तक पहुंचाने के लिए कांग्रेस रेडियो शुरू करती है। उसके साथी युवा हैं। रील्स और रौला बनाने में लगे आज के युवाओं के लिए ये फिल्म बहुत कुछ बताती है। फिल्म वे देख न सकें तो इसकी मुख्य किरदार के बारे में उन्हें पढ़ना जरूर चाहिए। ये हर दौर के युवा ही हैं जिन्होंने किसी भी समाज को एक नई दिशा देने में सक्रिय भूमिका निभाई है।


 

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Ae Watan Mere Watan Review by Pankaj Shukla Sara Ali Khan Kannan Iyer Sparsh Shrivastava Emraan Hashmi
सारा अली खान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
प्राइम वीडियो के ‘सूटेबल बॉय’ की फिल्म
फिल्म ‘ऐ वतन मेरे वतन’ उन करण जौहर की डिजिटल कंपनी धर्माटिक एंटरटेनमेंट की बनाई फिल्म है जिनके घर बीती रात अमेजन प्राइम वीडियो के दिग्गजों का मेला लगा। करण ने ही प्राइम वीडियो के भारत में अगले दो साल के लिए प्रस्तावित कार्यक्रमों के एलान की मुंबई में मेजबानी भी की। कभी नेटफ्लिक्स के ‘सूटेबल बॉय’ रहे करण अब प्राइम वीडियो की आंख का तारा है। करण की फिल्म ‘ऐ वतन मेरे वतन’ जैसी फिल्म बनाने की कोशिश ही इस बात का सबूत है कि वह सिर्फ मसाला फिल्मों की तरफ आकर्षित नहीं होते हैं। बढ़ती उम्र के साथ करण में दिखने लगी संजीदगी इसके पहले इसी ओटीटी पर प्रसारित हुई ‘लव स्टोरियां’ में भी दिखी और अब फिल्म ‘ऐ वतन मेरे वतन’ बनाने के लिए भी वह साधुवाद के हकदार हैं। बस, उनका स्टार पुत्रों या कहें कि पुत्रियों से अतिरिक्त मोह, उनके इस सार्थक इरादों पर पहले भी पानी फेरता रहा है और यहां भी फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी अभिनेता सैफ अली खान की बेटी सारा अली खान ही हैं।

 
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सारा अली खान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
खतरे की घंटी से अनजान सारा
स्वतंत्रता सेनानी उषा मेहता के किरदार में सारा अली खान को चुना जाना फिल्म के एलान के दिन से ही शंका के घेरे में रहा है। सारा की अभिनय में रुचि बहुत है लेकिन पहली फिल्म ‘केदारनाथ’ से लेकर पिछली फिल्म ‘मर्डर मुबारक’ तक उनके अभिनय में खास प्रगति हुई नहीं है। अगर वह सोशल मीडिया पर खुद को एक स्टार के रूप में प्रस्तुत करने से थोड़ा समय निकालकर रंगमंच या अभिनय की कार्यशालाओं में थोड़ा समय निवेश करें तो उनके लिए आने वाले दिनों में संभावनाएं बन सकती हैं। नहीं तो उषा मेहता को जीने जैसी मिली बड़ी जिम्मेदारियां उनके हाथ से जल्द ही छूट भी सकती हैं। सारा अली खान के पास इस फिल्म में अपने अभिनय के भावनात्मक पहलू दिखाने के तमाम मौके रहे। ब्रह्मचर्य की शपथ लेने के बाद अपने मित्र कौशिक से उषा का संवाद फिल्म का टेंट पोल बन सकता था। रेडियो के लिए उषा की जद्दोजहद भी दर्शकों को साथ जोड़ नहीं पाती। बुआ बनीं मधु राजा के साथ उनके दृश्य कहानी को एक अलग स्तर तक ले जा सकते थे। सारा का अभिनय इतना सामान्य है कि अपने पिता के साथ उनके दृश्यों में भी दोनों का भावनात्मक संघर्ष उभरकर सामने नहीं आ पाता है। सारा अली खान बीते छह साल में सिर्फ नौ फिल्में कर सकी हैं और इनमें से भी ये पांचवीं फिल्म है जिसे निर्माता सिनेमाघरों तक लाने का साहस नहीं जुटा पाए और ये तथ्य समझना सारा के लिए बड़ी बात नहीं होनी चाहिए।

 

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इमराना हाशमी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
लोहिया का लोहा नहीं मनवा पाई फिल्म
फिल्म ‘ऐ वतन मेरे वतन’ की कहानी पहले फ्रेम से अपने अनुमानित ढर्रे पर चलती है। कहानी में ऐसा कुछ खास है नहीं जिसे लेकर दर्शकों में उत्तेजना का निर्माण हो सके। फिल्म के शुरू में ही पुलिस के छापे से तनाव बनाने की कोशिश जरूर की जाती है लेकिन बॉयलिंग पॉइंट तक आने से पहले ही कहानी की भाप अपना असर छोड़ देती है। राम मनोहर लोहिया के रूप में इमरान हाशमी कुछ साल बाद दर्शकों को याद भी रह पाएंगे, कन्नन अय्यर को सोचना चाहिए। लोहिया का किरदार उत्तर भारत में कांग्रेस से फूटकर अलग हुई एक अलग पार्टी के नेता के रूप में पहचाना जाता है। सामयिक होता अगर इस पहलू पर फिल्म लिखने वालों ने थोड़ी मेहनत और की होती। सारा के चयन, फिल्म की पटकथा के बाद फिल्म की तीसरी कमजोर कड़ी हैं इसके साथी कलाकार भी हैं।

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Ae Watan Mere Watan Review by Pankaj Shukla Sara Ali Khan Kannan Iyer Sparsh Shrivastava Emraan Hashmi
स्पर्श श्रीवास्तव - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
ये है अदाकारी का असली स्पर्श!
स्पर्श श्रीवास्तव को छोड़ दें तो बाकी कोई दूसरा कलाकार सारा अली खान के आभामंडल से अलग निखरकर सामने नहीं आ पाता है। ‘जामताड़ा’ से दर्शकों की नजरों में आए स्पर्श ने यहां भी अपना असर छोड़ा है। फिल्म ‘लापता लेडीज’ में भी वह खूब जमे थे और यहां भी फहाद का उनका किरदार हिंदुस्तान की गंगा जमनी तहजीब की मजबूत लाठी बनकर सामने आता है। फिल्म की शूटिंग अधिकतर सेट्स पर ही हुई है और ये सेट फिल्म को वास्तविकता के करीब रखने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं। फिल्म का संगीत औसत है और देशभक्ति पर बनी फिल्म में एक भी जोशीला गीत न होना, इसके निर्देशक के साथ साथ इसके निर्माताओं की भी नाकामी मानी जा सकती है। सिनेमैटोग्राफी में अमलेंदु चौधरी को प्रकाश और छाया के संयोजन से 1942 का कालखंड सजाना चाहिए था, पर ऐसा होता नहीं दिखता। संगीत वर्गीज का संपादन भी थोड़ा सुस्त है। हवा में घूमती फ्रॉक से कप में घूमते चम्मच का शॉट मर्ज करना इस औसत से कमतर संपादन का बड़ा सबूत है। फिल्म ‘राजी’ के लिए लिखे गुलजार के गाने की लाइन से फिल्म का नाम तो इसके मेकर्स ले आए हैं, लेकिन वैसी नफासत इस फिल्म से नदारद है।

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