420 IPC Movie Review: जी5 की क्रिएटिव टीम ने फिर लगाया गोता, ग्राहकों को परोसी ‘जॉली एलएलबी’ की घटिया कॉपी
हिंदी के दर्शक फॉर्मूला फिल्ममेकिंग दशकों से उलझे हुए हैं। ओटीटी के आने से उम्मीद बंधी थी कि अब बॉक्स ऑफिस का दबाव झेले बिना हिंदी सिनेमा के निर्माता निर्देशक कुछ ओरीजनल फिल्में डिजिटल के लिए बना पाएंगे। लेकिन, मामला यहां कुछ और ही हो गया है। बीते तीन चार साल से ये एक अजीब सा ढर्रा बन गया है कि जो फिल्म बाजार में सिनेमाघरों के लिए बिक न सके, उसे ओटीटी के ग्राहकों को टिका दो। ओटीटी मुफ्त का मीडियम नहीं है। इसके लिए दर्शक एक तयशुदा रकम देता है और ये बात सबसे पहले जिस ओटीटी को भारत में समझनी है वह जी5 है। वैसे तो इसका भविष्य ही सोनी कंपनी के साथ जी कंपनी की हुई डील के बाद अनिश्चित ही है लेकिन सोनी लिव और जी5 दोनों अगर मिल भी जाएंगे तो एक ‘गुल्लक’, एक ‘स्कैम’ या एक ‘राधे’ से उनका भला होने वाला नहीं अगर इनकी क्रिएटिव टीम ‘420 आईपीसी’ जैसी फिल्में अपने ग्राहकों को परोसती रही।
फिल्म ‘420 आईपीसी’ एक टैम्पलेट फिल्म है। यानी कि एक ऐसी फिल्म जिसे चेकलिस्ट के बक्से टिक करके बनाया गया हो। हर ओटीटी को अपनी सामग्री में कुछ कहानियां कानून से जुड़ी चाहिए होती हैं। वूट पर हिट हुए ‘इललीगल’ के सीजन 2 के बाद इनकी मांग और बढ़ने वाली है और जी5 को भी कुछ नहीं सूझा तो वह इस टैम्पलेट की सीरीज की बजाय फिल्म ही ले आए। एक धुरंधर नामी वकील, उसके सामने एक बच्चा सा वकील। बीच में किसी मोटे आसामी का केस और गुनाह का इशारा एक ऐसे शख्स पर जो पहली नजर में निर्दोष ही दिखता हो। कानून पर बन रही सीरीज और फिल्मों का ये मोटा मोटा तयशुदा फॉर्मूला है।
विनय पाठक की वजह से देखी गई फिल्म ‘420 आईपीसी’ की भी यही कहानी है। यहां उनका किरदार संदेहों के घेरे में हैं। सरकारी वकील सावक जमशेदजी के किरदार में रणवीर शौरी हैं। नौसिखिया वकील का किरदार रोहन मेहरा को मिला है। और, कुछ कुछ हिंदी फिल्म ‘जॉली एलएलबी’ जैसा मामला सजाने की कोशिश इसके लेखक निर्देशक मनीष गुप्ता करते हैं। फिल्म ‘420 आईपीसी’ की सबसे कमजोर कड़ी भी फिल्म की कथा, पटकथा और निर्देशन ही है। संवाद कहीं से भी किसी कानून पर आधारित फिल्म जैसे चुस्त, चुटीले और चंट नहीं दिखते और कहानी शुरू होती ही भरभरा कर गिर जाती है जब रणवीर शौरी पूरी तरह से ‘जॉली एलएलबी’ के बोमन ईरानी बनने की कोशिश करते नजर आते हैं।
फिल्म अभिनय के लिहाज से भी काफी कमजोर फिल्म कही जा सकती है क्योंकि इसमें विनय पाठक को छोड़कर किसी ने भी खास दिलचस्पी के साथ काम किया भी नहीं है। विनय पाठक से पिछली मुलाकात उनकी ही वेब सीरीज ‘स्पेशल ऑप्स’ के दौरान हुई। उनका चीजों को परखने, समझने का अपना एक अलग अंदाज है। टिप्पणियां भी वह यही सोचकर करते हैं कि इससे सामने बैठा शख्स उनको एक पढ़ा लिखा और कढ़ा हुआ अभिनेता समझे। जो कि वह हैं भी, बस कहानियों को चुनने में उनका ये अनुभव काम क्यों नहीं आता, गूढ़ प्रश्न है। अपनी तरफ से विनय पाठक ने अपने किरदार में पूरा जोर लगाया है लेकिन उनके बरसों पुराने साथी रणवीर शौरी फिल्म में तो हैं, पर इस बार उनकी टीम में नहीं हैं।
फिल्म ‘420 आईपीसी’ तकनीकी रूप से भी काफी कमजोर फिल्म है। एक कोर्ट रूम ड्रामा के लिए जिस तरह का शॉट डिवीजन और कैमरा मूवमेंट जरूरी होता है। राज चक्रवर्ती वैसा करने से चूक गए हैं। कानून पर आधारित फिल्मों में कैमरा दरअसल दर्शक की आंख बनना चाहता है। दर्शक चाहता है कि वह खुद कहानी की तफ्तीश करे और कैमरा यहां उसकी मदद करता है। लेकिन, फिल्म ‘420 आईपीसी’ में सिर्फ कैमरा ही नहीं बल्कि, इसका संपादन और इसका संगीत विभाग भी फिल्म के साथ न्याय नहीं कर पाता है। ये फिल्म देखना विशुद्ध रूप से समय की बर्बादी है। अगर आपको घर बैठे ही सिनेमा देखना है तो इंतजार कीजिए तीन हफ्तों को नेटफ्लिक्स पर जल्द ही ‘चंडीगढ करे आशिकी’ रिलीज होने वाली है।