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सिख विरोधी दंगों की सच्चाई बयां करती 31 अक्टूबर
रवि बुले/ अमर उजाला
Updated Mon, 24 Oct 2016 03:31 PM IST
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31 october
इतिहास हमेशा कोई बहुत दूर की चीज नहीं होता। वह कुछ ऐसा नहीं होता कि नजरों से ओझल हो गया हो। अक्सर इतिहास बहुत करीब भी होता है। इतने करीब कि जब याद आता है, तकलीफ से भर देता है। उसकी छाप ठंड के मौसम में उभर आने वाले पुराने दर्द की सी होती है। अपनी पहली फिल्म धग (धधकती अग्नि, 2012, मराठी) के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाले निर्देशक शिवाजी लोटन पाटिल की 31 अक्तूबर हमें कुछ इसी अंदाज में इतिहास से रू-ब-रू कराती है।
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तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए सिख विरोधी दंगों की तस्वीर पेश करती यह फिल्म सेंसर की ‘जरूरी काट-छांट’ के बाद सामने है। कुछ खास लोगों की ‘संवेदनाएं’ आहत न हो जाएं इसलिए फिल्म से हत्या के बाद हुई हिंसा में राजनीतिक नेतृत्व की भड़काऊ भूमिका को रफा-दफा कर दिया गया। अतः तस्वीर यह कि जो नरसंहार हुआ उसके जिम्मेदार सिर्फ समाज के पथभ्रष्ट-पतित लोग थे।
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फिल्म साधारण सिख पति-पत्नी की कहानी है। जिनके तीन छोटे-छोटे बच्चे हैं। दिल्ली सरकार के बिजली विभाग में काम करते सीधे-सरल, दूसरों की मदद को सदा तत्पर सरदारजी (वीर दास) के प्रति उनके करीबियों की नजरें अचानक बदल जाती हैं, जब इंदिरा गांधी की हत्या की खबर आती है। उनके नाते-रिश्तेदारों का भी जीवन यहां दिखता है, जो गुरुद्वारे में सेवाएं दे रहे हैं। वक्त करवट बदलता है और सभी एक-एक कर दंगाइयों के शिकार हो जाते हैं। मगर इसी हिंसक समय में उनके कुछ हिंदू मित्र उभरते हैं जो सरदारजी और उनके परिवार को अपनी जान जोखिम में डाल कर बचाते हैं। उन्हें दंगाग्रस्त इलाके से बाहर निकालते हैं।
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फिल्म में पुलिस का इस माहौल में आंखें मूंदे रहना और कहीं-कहीं दंगाइयों के समर्थन तथा सिखों के विरुद्ध होना भी दिखाया गया है। मगर वह कहानी की तरह ज्यादा आता है। हकीकत जैसा कम। फिल्म में पंजाब के तत्कालीन हालात का जिक्र है परंतु हल्के संदर्भ में। निर्देशक ने जितना संभव हुआ उतनी सच्चाई से हालात बयान किए। 31 अक्तूबर, 1984 के दृश्य विश्वसनीयता के साथ रचे गए हैं और असर रखते हैं। वीर दास और सोहा अपने किरदारों को जीते हुए नजर आते हैं।
फिल्म सवाल करती है कि जिन्होंने इस विपदा को भुगता, उन्हें 30 वर्षों से भी अधिक गुजरने के बाद क्या न्याय मिला? दोषियों को सजा मिली? ऐसा नहीं हुआ। आखिर में बात यही कि तूफान था, गुजर गया। बच्चे अपनी जगहों पर जीवन की राह में बढ़ गए। अब क्यों पीले पड़ चुके कागजों में दर्ज बयानों, तस्वीरों और जख्मों को सीने से लगा कर रखा जाए?
लेकिन क्या वह सब भूल पाना इतना आसान है? शायद ऐसी दहलाती यादों के लिए ही शायर निदा फाजली ने लिखा थाः बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता/जो बीत गया है वो गुजर क्यों नहीं जाता। इस साल फरवरी में हमसे विदा लेने वाले निदा का का जन्मदिन इसी महीने की 12 तारीख को गुजरा है।