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1922 Pratikar Chauri Chaura Review: गांधी और मालवीय के किरदारों ने बिठाया भट्ठा, रवि किशन की मेहनत गई बेकार

Fri, 30 Jun 2023 06:56 PM IST
साक्षी पांडेय अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई Published by: साक्षी पांडेय Updated Fri, 30 Jun 2023 06:56 PM IST
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1922 Pratirak Chauri Chaura Review The characters of Gandhi and ancestors played slaves role read here
1922 प्रतिकार चौरी चौरा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो , मुंबई
Movie Review
1922 प्रतिकार चौरी चौरा
कलाकार
रवि किशन , रविशंकर खरे , अनिल नागरथ , अशोक वोटिया और अनुराधा सिंह
लेखक
अभीक भानू
निर्देशक
अभीक भानू
निर्माता
सरयू विजन और अभीक भानू
रिलीज
30 जून 2023
रेटिंग
1.5/5

जलियांवाला बाग के बाद भारत के इतिहास में चौरी चौरा कांड ऐसी घटना थी, जिसमें पुलिस स्टेशन के सामने प्रदर्शन कर रहे चार हजार लोगों को पुलिस ने गोलियों से भून दिया। इसके जवाबी कार्यवाही में प्रदर्शनकारियों ने पुलिस स्टेशन में आग लगा ली, जिसमें 22 पुलिसकर्मियों की मृत्यु हो गई थी। इस घटना के बाद महात्मा गांधी ने 12 फरवरी 1922 को राष्ट्रीय स्तर पर असहयोग आंदोलन रोक दिया था। चौरी चौरा कांड के अभियुक्तों का मुकदमा पंडित मदन मोहन मालवीय ने लड़ा और उनमे से 151 लोगों को फांसी की सजा से बचा लिया और बाकी 19 लोगों को फांसी की सजा दे दी गई। फिल्म '1922 प्रतिकार चौरी चौरा' गोरखपुर के चौरी चौरा कांड की इसी घटना पर आधरित है।

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1922 Pratirak Chauri Chaura Review The characters of Gandhi and ancestors played slaves role read here
1922 प्रतिकार चौरी चौरा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो , मुंबई

फिल्म '1922 प्रतिकार चौरी चौरा' की कहानी भगवान अहीर के इर्द गिर्द घूमती है जो ब्रिटिश भारतीय सेना की नौकरी छोड़कर असहयोग आंदोलन में भाग लेने वाले स्वयंसेवकों के साथ गौरी बाजार में शराब और ताड़ी की ब्रिकी का विरोध करता है। प्रदर्शनकारियों को स्थानीय दरोगा गुप्तेश्वर सिंह ने गिरफ्तार करके चौरी चौरा थाने के हवालात में डाल दिया। इसके जवाब में पुलिस के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुआ और गौरी बाजार में शराब की दुकान पर धरना देने के लिए एकत्र हुए। स्थिति को नियंत्रित करके के लिए सशस्त्र पुलिस भेजी गई। इस दौरान दरोगा गुप्तेश्वर सिंह ने  भगवान अहीर  को थप्पड़ मार दिया। दूसरे दिन इसका विरोध करने के लिए भगवान अहीर चार हजार साथियों को इकट्ठा करके पुलिस स्टेशन का घेराव करता है और इस दौरान पुलिस की फायरिंग में कई लोग मारे जाते हैं और गुस्साई भीड़ पुलिस स्टेशन में आग लगा देती है, जिसमे 22 पुलिस कर्मी मारे जाते हैं। 

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1922 प्रतिकार चौरी चौरा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो , मुंबई

फिल्म '1922 प्रतिकार चौरी चौरा'  की शूटिंग इस घटना के 100 पूरे होने पर पिछले साल गोरखपुर और उसके आस पास स्थानों पर हुई, जहां पर उस तरह की घटना घटी थी। पीरियड फिल्म बनाने का सबसे बड़ा चैलेन्ज यह होता है कि उस दौर के परिदृश्य और वेशभूषा को पर्दे पर उतरना। फिल्म में 1922 के माहौल पर तो विशेष रूप से ध्यान तो दिया गया, लेकिन उस तरह से कलाकरों का चयन नहीं किया। फिल्म में रवि किशन ने भगवान अहीर की भूमिका निभाई है। रवि किशन के किरदार को छोड़ दे तो फिल्म में किसी की कलाकर की कास्टिंग उपयुक्त नहीं लगी। खासकर महात्मा गांधी और मदन मोहन मालवीय के  किरदार की कास्टिंग। गांधी और मदनमोहन मालवीय जैसे किरदार पर फिल्म के निर्देशक को थोड़ा सा और मेहनत करने की जरूरत थी।

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1922 प्रतिकार चौरी चौरा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो , मुंबई

हर किरदार का अपना एक टोन होता है, जिसको शुरू से लेकर अंत तक मेंटेन करना बहुत ही जरुरी होता है। इस मामले में लेखक - निर्देशक अभीक भानू की फिल्म '1922 प्रतिकार चौरी चौरा' में बहुत बड़ी चूक दिखती है। फिल्म में अंग्रेज अफसर दिखने दिखने वाला कोई भी किरदार नहीं नजर आता है, भरतीय लुक में दिखने वाले कलाकार को ही अंग्रेज के लुक में दिखया गया है। कम से कम अंग्रेज जैसे दिखने वाले कलाकारों को चयन किया गया होता तो तो फिल्म थोड़ी और वास्तविकता के करीब लगती है, उनके बोलने के अंदाज भी अंग्रेजी असेंट जैसे नहीं लगते हैं। फिल्म में रवि किशन शुरुआत में थोड़ी लाउड एक्टिंग करते नजर आए, लेकिन बाद में उन्होंने वह अपने किरदार अपना लिया और अंत तक अपने परफॉर्मेंस से दर्शकों को बांधे रखा, लेकिन फिल्म किसी एक कलाकार के परफॉर्मेंस के दम पर नहीं चलती।

1922 Pratirak Chauri Chaura Review The characters of Gandhi and ancestors played slaves role read here
1922 प्रतिकार चौरी चौरा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो , मुंबई

आम तौर पर इस तरह की फिल्मों में समस्या यह आती है कि कम बजट और समय को ध्यान में रखते हुए छोटे- छोटे कलाकरों की परफॉर्मेंस पर ध्यान नहीं दिया जाता है।  और,  यह कहकर सीन ओके कर दिया जाता है कि डबिंग में संभाल लेंगे, यही सबसे बड़ी चूक होती है जो बाद में फिल्म में नजर आती है। किसी भी कलाकार का भले ही एक ही सीन क्यों न हो, वह भी फिल्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है, इस बात का ख्याल फिल्म के निर्देशक को हमेशा रखना चाहिए। फिल्म '1922 प्रतिकार चौरी चौरा' की कहानी के हिसाब से मनोज गुप्ता की सिनेमैटोग्राफी ठीक है। फिल्म के एडिटर ए डी शेखरन से जितना हो सकता है फिल्म को संभालने की  कोशिश की है। फिल्म का गीत 'वीरों की धरती वीरों की वाणी, रुला देगी सबको चौरी चौरा की कहानी' भावुक कर देने वाला है। बिना किसी खास प्रमोशन के कम बजट और संसाधन में फिल्म को थियेटर तक पहुंचा देना किसी चुनौती से कम नहीं होता है। लेकिन इस सबके बावजूद अगर फिल्म के किरदार को लेकर पहले से ठीक से रिसर्च किया गया होता और उसी हिसाब से फिल्म की कास्टिंग की गई होती तो फिल्म का अपना एक अलग लेवल होता।   

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